मां बगलामुखी का मंत्र | जाप की सम्पूर्ण विधि, लाभ और महत्व
महत्व:-
बगलामुखी देवी दश महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या के नाम से उल्लेखित है। | वेदिक शब्द वल्गा कहा है जिसका अर्थ कृत्या संबंध है जो
बाद में अपभ्रंश होकर बगला नाम से प्रचारित हो गया । बगलामुखी शत्रुसंहारक विशेष है, इन्हें स्तम्भन की देवी भी कहा जाता है। आगे पढ़े मां बगलामुखी साधना
मां बगलामुखी परिचय
भगवती बगला सुधा – समुद्र के मध्य में स्थित मणिमय मण्डप में रत्नवेदी पर रत्नमय सिहांसन पर विराजती हैं । पीतवर्णा होने के कारण ये
पीत रंग के ही वस्त्र, आभूषण व माला धारण किये हुए हैं। इनके एक हाथ में शत्रु की जिह्वा और दूसरे हाथ में मुद्गर है । व्यष्टि रूप में शत्रुओं
का नाश करने वाली और समष्टि रूप में परम ईश्वरकी संहार- इच्छा की | अधिष्ठात्री शक्ति बगला हैं ।
प्रकटन
एक बार समुद्र में राक्षस ने बहुत बड़ा प्रलय मचाया, विष्णु उसका संहार नहीं कर सके तो उन्होने सौराष्ट्र देश में हरिद्रा सरोवर के समीप
महात्रिपुरसुन्दरी की आराधना की तो श्रीविद्या | ने ही बगला रूप में प्रकट होकर राक्षस का वध किया। मंगलवार युक्त चतुर्दशी, मकरकुल
नक्षत्रों से युक्त वीररात्रि कही जाती है। इसी अर्धरात्रि में श्रीबगला का आविर्भाव हुआ था ।
मां बगलामुखी का मंत्र साधना
लकड़ी की चौकी पर मां बगलामुखी की मूर्ति व सिद्ध यंत्र स्थापित कर पूजन करें।
मंत्र
“ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं ।
स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा।।”
विधि
बगलामुखी उपासना पीलेवस्त्र पहनकर, पीले आसन पर बैठकर करें। गंधार्चन में केसर हल्दी का प्रयोग करें, स्वयं के पीला तिलक लगायें ।
दीपवर्तिका पीली बनायें । पीतपुष्प चढायें, पीला नैवेद्य चढावें । हल्दी से बनी हुई माला से जप करें। अभाव में रुद्राक्ष माला से जप करें।
या सफेद चंदन की माला को पीली कर लेवें । तुलसी की माला पर जप नहीं करें। यह साधना आपको 21 दिन करनी है।
बगलामुखी मंत्र का आपको रोजाना 5 माला जाप करना है। साधना का समय रात्रि 10 बजे के बाद कभी भी करें।
पूजन सामग्री
- माँ बगलामुखी की तस्वीर या मूर्ति
- पीले रंग का आसन
- पीला वस्त्र साधक के लिए
- हल्दी की माला
- बगलामुखी सिद्ध यंत्र
- लकड़ी की चौकी पूजा के लिए
- हल्दी की गांठें (पूजा व हवन के लिए)
- पीले रंग के फूल (गेंदे या चंपा आदि)
- अक्षत (चावल खंडित न हो)
- जल से भरा कलश (तांबे या पित्तल)
- आम के पत्ते (कलश के लिए)
- नारियल (कलश पर रखने हेतु)
- दीपक (घी का या सरसों तेल का)
- साबुत सूखी लाल मिर्च
- धूप – अगरबत्ती
- कपूर
- हल्दी या चंदन (तिलक के लिए)
- एक कटौरी मे घी, लाल मिर्च, व साबुत हल्दी (हवन के लिए)
- कुमकुम
- सुपारी (5 या 11 नग)
- पान के पत्ते (5 या 11 नग)
- मिठाई (भोग के लिए, जैसे बूंदी या बेसन के लड्डू)
- फल (भोग के लिए)
- जल, दूध, शहद, घी, दही (पंचामृत हेतु)
- थाली, कटोरी, चम्मच ( पूजा उपयोग हेतु)
- पीली सरसों दाने वाली
सर्वप्रथम गुरुदेव का ध्यान करें-
(अक्षत व पुष्प हाथ में लें)
“अखण्ड मण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
देवताया दर्शनं च करुणा वरुणालयं ।
सर्व सिद्धि प्रदातारं श्री गुरुं प्रणमाम्यहम् ॥
वराभय करं नित्यं श्वेत पद्म निवासिनम् ।
महाभय निहन्तारं गुरुदेवं नमाम्यहम् ” ॥
तदुपरान्त अक्षत व पुष्प गुरुचरणों में अर्पित कर कार्य सिद्धि हेतु पूजन संकल्प लें

संकल्प :-
(हाथ में अक्षत, पुष्प, द्रव्य व जल लेकर)
ॐ विष्णवे नमः, ॐ विष्णवे नमः, ॐ विष्णवे नमः । ॐ अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे बौद्धावतारे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे….क्षेत्रे नगरे ग्रामे ….नाम संवत्सरे ४….मासे’ (शुक्ल/कृष्ण) पक्षे….तिथौ….वासरे’….गोत्र: शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहम् प्रातः (मध्याह्ने, सायं) सर्वकर्मसु शुद्ध्यर्थं श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं
श्रीभगवत्प्रीत्यर्थं च अमुक कर्म करिष्ये ।
अब आप हाथ में लिये हुए पुष्प, अक्षत आदि भूमि पर छोड़े।
फिर हाथ में पीतपुष्प लेकर बगलामुखी का ध्यान करें-
ध्यान :-
सौवर्णासन-सस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लासिनीं,
हेमाभाङ्गरुचिं शशांङ्क मुकुटां सच्चम्पक-स्रग्युताम्,
हस्तैर्मुद्गर-पाशबद्ध – रसनां संबिभ्रतीं भूषणै-
र्व्याप्ताङ्गीं बगलामुखीं त्रिजगतां संस्तम्भिनीं चिन्तये ॥
हाथ में लिये गये पुष्प माता को अर्पण करें-
आह्वान :-
पीत पुष्पों से माँ का आह्वान करते हुए उनका स्वागत करें-
आगच्छ त्वं महादेवि! स्थाने चात्र स्थिरा भव ।
यावत् पूजां करिष्यामि, तावत् त्वं सन्निधो भव ॥
श्री पीताम्बरायै नमः। बगलामुखिदेवीमावाह्यामि।
आवाहनार्थे पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि।
| पुष्पांजलि समर्पित करें |
आसन :-
मां बगलामुखी के बैठने के लिए एक आसन लगाएँ । आसन लगाते समय ये मंत्र का जाप करें।
अनेक रत्नसंयुक्तं नानामणिगणान्वितम् ।
इदं हेममयं दिव्यमासनम् प्रतिग्रह्यताम्॥
ह्रीं बगलायै नमः। आसनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि।
देह रक्षा
कोई भी साधना करने से पहले स्वयं की रक्षा बहुत जरुरी है इसी लिए पहले आप कोई भी देह रक्षा मंत्र को सिद्ध कर लिजिए।
मैं आपको देह रक्षा मंत्र निचे दे रहा हूँ ।
- ॐ वज्र क सीकड़, वज्र क किवाड़, वज्र बांधे दसो द्वार।
वज्र क सीकड़ से पी बोल, गहे दोष हाथ न लगे ।
आगे वज्र किवाड़ भैरो बाबा, पसारी
चौसठ सौ योगिनि रक्षाकारी ।
दोहाई ईश्वर महादेव, गौरा पार्वती की ।। - ॐ नमो गुरु जी चुटकी दाये चुटकी बाये, चुटकी रक्षा करे हर थाएं |
बजर का कोठा अजर कबाड़, चुटकी बांधे दसो दुयार ||
जो कोई घाले मुझ पे घाल उलटत देव वही पर जाए |
हनुमान जी चुटकी बजाए , राम चंदर पछताये,
सीता माता भोग बनाया हनुमान मुसकाये |
माता अंजनी की आन , चुटकी रक्षा करो तमाम |
जय हनुमान, जय हनुमान, जय हनुमान ||” - “ॐ नमो वज्र का कोठा, जिसमें पिंड हमारा पैठा,
ईश्वर कुंजी ब्रम्हा ताला, मेरे आठो याम का यति
हनुमंत रखवाला।”
सर्व यत्र मन्त्र तत्रोतकीलन स्तोत्रम्
॥ अथ विघ्नविनाशक “शान्ति स्तोत्रम्” ॥
इस विघ्न विनाशक शान्ति स्तोत्र का पाठ तान्त्रिक प्रयोग के मध्य उपस्थित हो जाने वाले विघ्न आदि का नाश कर देता है ।
अत: जब भी अनुष्ठान करते समय किसी भी प्रकार का विघ्न आ पड़े तो इस विघ्न विनाशक शान्ति स्तोत्र के ग्यारह पाठ अवश्य करें।
इस स्तोत्र का एक बार भी पढ़ा जाना अत्यन्त लाभप्रद सिद्ध होता है । प्रयोग के चलते समय किसी | भी प्रकार की गड़बड़ी, भूल-चूक,
भ्रम आदि के होते ही इस स्तोत्र का पाठ लाभप्रद प्रमाणित हुआ है । इसके जप करने मात्र से ही सभी विघ्न नाश होकर शान्ति हो जाती है।
शान्ति स्तोत्रम्
नश्यन्तु प्रेतकूष्माण्डा नश्यन्तु दूषका नराः ।
साधकानां शिवाः सन्तु आम्नायपरिपातिनाम ॥1॥
जयन्ति मातरः सर्वा जयन्ति योगिनीगणाः ।
जयन्ति सिद्धडाकिन्यो जयन्ति गुरुपङ्कयः ॥2॥
जयन्ति साधकाः सर्वे विशुद्धाः साधकाश्च ये ।
समयाचारसम्पन्ना जयन्ति पूजका नराः ॥3॥
नन्दन्तु चाणिमासिद्धाः नन्दन्तु कुलपालकाः ।
इन्द्राद्या देवताः सर्वे तृप्यन्तु वास्तुदेवताः ॥4॥
चन्द्रसूर्यादयो देवास्तृप्यन्तु मम भक्तितः ।
नक्षत्राणि ग्रहा योगाः करणा राशयच ये ॥ 5 ॥
सर्वे ते सुखिनो यान्तु सर्पा नश्यन्तु पक्षिणः ।
पशवस्तुरगाश्चैव पर्वताः कन्दरा गुहाः ॥6॥
ऋषयोब्राह्मणास्सर्वे शान्तिकुर्वन्तु सर्वदा ।
स्तुता मे विदिताः सन्तु सिद्धास्तिष्ठन्तु पूजकाः ॥7॥
ये ये पापधियस्सुदूषणरता मन्निन्दकाः।
पूजने श्री माता बगलामुखी साधना।
वेदाचारविमर्दनेष्टहृदया भ्रष्टाच ये साधकाः।
दृष्ट्वा चक्रमपूर्वमन्दहृदया ये कोलिका दूषकाः।
ते ते यान्तु विनाशमत्र समय श्री भैरवस्याज्ञया ॥8॥
द्वेष्टारः साधकानां च सदैवाम्नायदूषकाः।
डाकिनीनां मुखे यान्तु तृप्तास्तत्पिशितैः स्तुताः॥9॥
ये वा शक्तिपरायणा: शिवपरा ये वैष्णवाः साधवः ।
सर्वस्मादखिले सुराधिपमजं सेव्यं सुरैः सन्ततम् ॥10 ॥
शक्तिं विष्णुधिया शिवं च सुधिया श्री कृष्णबुद्ध्या च ये।
सेवन्ते त्रिपुरं त्वभेदमतयो गच्छन्तु मोक्षन्तु ते ॥11॥
शत्रवो नाशमायान्तु मम निन्दाकराश्च ये ।
द्वेष्टारः साधकानां च ते नश्यन्तु शिवाज्ञया ॥12 ॥
ततःपरं पठेत स्तोत्रमानन्दस्तोत्रमुत्तमम्॥
॥ इति शान्ति स्तोत्रम् ॥
सर्व यत्र-मन्त्र-तत्रोत्कीलन स्तोत्रम्
जिन मन्त्रों की उत्कीलन विधि ज्ञात नहीं हो उन मन्त्रों को इस स्तोत्र के पठन से उत्कीलित किया जा सकता है।
॥ पार्वत्युवाच॥
देवेश परमानन्द भक्तानामभयं प्रद !
आगमाः निगमाश्चैव, वीजं वीजोदयस्तथा ॥
समुदायेन वीजानां, मत्रो मन्त्रस्य संहिता।
ऋषिच्छन्दादिकं भेदो वैदिकं यामलादिकम्॥
धर्मोऽधर्मस्तथा ज्ञानं विज्ञानं च विकल्पन।
निर्विकल्प विभागेन तथा षट्कर्म सिद्धये॥
भुक्ति-मुक्ति-प्रकारश्च सर्वं प्राप्तं प्रसादतः ।
कीलनं सर्वमत्राणां शंसयद् हृदये वचः ॥
इति श्रुत्वा शिवानाथः, पार्वत्यावचनं शुभं ।
उवाच परया प्रीत्या मन्रोत्कीलनकं शिवाम् ॥
॥ शिव उवाच ॥
वरानने! हि सर्वस्य व्यक्ताव्यक्तस्य वस्तुनः ।
साक्षी भूय त्वमेवासि जगतस्तु मनोस्तथा ॥
त्वया पृष्टं वरारोहे! तद् वक्ष्याम्युत्कीलनं ।
उद्दीपनं हि मन्त्रस्य सर्वस्योत्कीलनं भवेत् ॥
पुरा तव मया भद्रे ! समाकर्षण वश्यजा ।
मन्त्राणां कीलिता सिद्धिः सर्वे ते सप्तकोटयः ॥
तवानुग्रह प्रीतस्त्वात् सिद्धिस्तेषां फलप्रदा ।
येनोपायेन भवति तं स्तोत्रं कथयाम्यहम्॥
शृणु भद्रेऽत्र सततमावाभ्यामखिलं जगत् ।
तस्य सिद्धिर्भवेत्तिष्ठे माया येषां प्रभावकम् ॥
अन्नं पानं हि सौभाग्यं दत्तं तुभ्यं मया शिवे !
सञ्जीवनं च मत्राणां तथा दत्तुं पुनर्ध्रुवम् ॥
यस्य स्मरण मात्रेण पाठेन जपतोऽपि वा ।
अकीला अखिला मन्त्राः सत्यं सत्यं न संशयः ॥
नियम
- पूर्ण साधना काल में अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन अवश्य ही करें।
- मंत्र जप करते समय दृष्टि सदैव यंत्र पर ही टिकी रहे।
- किसी भी इस्त्री को बुरी दृष्टि से न देखे।माता-पिता के रोज चरण स्पर्श करे।
- मांस मदिरा वह इसका सेवन करने वालो से दूर रहे।
- साधना काल मे घर मे प्याज लहसुन का इस्तेमाल न करे।
- अभद्र भाषा का इस्तेमाल न करें।
- साधना के समय घर से बाहर न जाए।
- साधना काल मे बाल न कटवाए।
लाभ
- शत्रुओं का नाश होता है, और विजय प्राप्त होती है।
- अगर आप पर कोई कोट केश चल रहा है, उसमे विजय की प्राप्ति होती है।
- आपके घर पर किसी भी प्रकार की प्रेत बाधा या तंत्र क्रिया हो तो नष्ट हो जाती है।
सर्व कार्य सिद्ध होते है। - आपके परिवार मे कोई भी बिमार रहता हो माता की पूजा मात्र से स्वस्थ हो जाता है।


