Bhagwat Geeta 17 adhyay, and mahatmy - MANTRAMOL

Bhagwat Geeta 17 adhyay, and mahatmy

श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय का माहात्म्य || Bhagwat Geeta 17 adhyay

साधकों आप सब के लिए प्रस्तुत है। “Bhagwat Geeta 17 adhyay”  श्रीमद्भगवद्गीता का 17 अध्याय व माहात्म्य हिन्दी व संस्कृत मे।

श्रीमहादेव जी कहते हैं-पार्वती! सोलहवें अध्याय का माहात्म्य बतलाया गया। अब सत्रहवें अध्याय की अनन्त महिमा श्रवण करो। राजा खड्ग बाहु के पुत्र का दुःशासन नामक एक नौकर था। वह बड़ी खोटी बुद्धि का मनुष्य था। एक बार वह माण्डलीक राजकुमारों के साथ बहुत धन की बाजी लगा कर हाथी पर चढ़ा और कुछ ही कदम आगे जाने पर लोगों के मना करने पर भी वह मूढ़ हाथी के प्रति जोर-जोर से कठोर शब्द करने लगा। उसकी आवाज सुनकर हाथी क्रोध से अंधा हो गया और दुःशासन पैर फिसल जाने के कारण पृथ्वी पर गिर पड़ा। दुःशासन को गिरकर कुछ-कुछ उच्छ्वास लेते देख काल के समान निरंकुश हाथी ने क्रोध में भरकर उसे ऊपर फेंक दिया।

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

ऊपर से गिरते ही उसके प्राण निकल गये। इस प्रकार काल वश मृत्यु को प्राप्त होने के बाद उसे हाथी की योनि मिली और सिंहल द्वीप के महाराज के यहाँ उसने अपना बहुत समय व्यतीत किया। सिंहल द्वीप के राजा की महाराज खड्ग बाहु से बड़ी मैत्री थी, अतः उन्होंने जल के मार्ग से उस हाथी को मित्र की प्रसन्नता के लिये भेज दिया। एक दिन राजा ने श्लोक की समस्यापूर्ति से संतुष्ट होकर किसी कवि को पुरस्कार रूप में वह हाथी दे दिया और उन्होंने सौ स्वर्ण-मुद्राएँ लेकर उसे मालव नरेश के हाथ बेच दिया । कुछ काल व्यतीत होने पर वह हाथी यत्न- पूर्वक पालित होने पर भी असाध्य ज्वर से ग्रस्त होकर मरणासन्न हो गया।

Bhagwat Geeta 17 adhyay, and mahatmy

हाथी वानों ने जब उसे ऐसी शोचनीय-अवस्था में देखा तो राजा के पास जाकर हाथी के हित के लिये शीघ्र ही सारा हाल कह सुनाया। ‘महाराज ! आपका हाथी अस्वस्थ जान पड़ता है। उसका खाना, पीना और सोना सब छूट गया है। हमारी समझ में नहीं आता इसका क्या कारण है। हाथी वानों का बताया हुआ समाचार सुनकर राजा ने हाथी के रोग को पहचान ने वाले चिकित्सा कुशल मन्त्रियों के साथ उस स्थान पर पदार्पण किया, जहाँ हाथी ज्वरग्रस्त होकर पड़ा था।

राजा को देखते ही उसने ज्वरजनित वेदना को भूल कर संसार को आश्चर्य में डालने वाली वाणी में कहा-‘सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता, राजनीति के समुद्र, शत्रु-समुदाय को परास्त करने वाले तथा भगवान् विष्णु के चरणों में अनुराग रखने वाले महाराज ! इन औषधों से क्या लेना है ? वैद्यों से भी कुछ लाभ होने वाला नहीं है, दान और जप से भी क्या सिद्ध होगा ? आप कृपा करके गीता के सत्रहवें अध्याय का पाठ करने वाले किसी ब्राह्मण को बुलवाइ ये।’ हाथी के कथनानुसार राजा ने सब कुछ वैसा ही किया।

Bhagwat Geeta 17 adhyay, and mahatmy

तदनन्तर गीता-पाठ करने वाले ब्राह्मण ने जब उत्तम जल को अभिमन्त्रित करके उसके ऊपर डाला, तब दुःशासन गजयोनि का परित्याग करके मुक्त हो गया। राजा ने दुःशासन को दिव्य विमान पर आरूढ़ एवं इन्द्र के समान तेजस्वी देखकर पूछा-‘तुम्हारी पूर्व-जन्म में क्या जाति थी? क्या स्वरूप था ? कैसे आचरण थे? और किस कर्म से तुम यहाँ हाथी होकर आये थे? ये सारी बातें मुझे बताओ।’ राजा के इस प्रकार पूछने पर संकट से छूटे हुए दुःशासन ने विमान पर बैठे-ही-बैठे स्थिरता के साथ अपना पूर्वजन्म का उपर्युक्त समाचार यथावत् कह सुनाया। तत्पश्चात् नरश्रेष्ठ भालव नरेश भी गीता के सत्रहवें अध्याय का पाठ करने लगे। इससे थोड़े ही समय में उनकी मुक्ति हो गयी।

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

अथ सप्तदशोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः । १ ।

श्रीभगवानुवाच

त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा । सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु। २ ।
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत । श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः। ३ ।
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः । प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः। ४ ।
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः । दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः। ५ ।
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः । मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विङ्ख्यासुरनिश्चयान्। ६ ।
आहारस्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः । यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु। ७ ।
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः । रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः। ८ ।

श्रीभगवानुवाच


कट्वाललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः । आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः। ९ ।
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्। उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्। १०।
अफलाकाङ्गिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते । यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः । ११ ।
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् । इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्। १२ ।
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्। श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते। १३ ।
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजन शौचमार्जवम् । ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते । १४ ।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते । १५ ।

Bhagwat Geeta 17 adhyay


मन:प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते। १६।
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्रिविधं नरैः । अफलाकाङ्गिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते । १७ ।
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् । क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्। १८।
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः । परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्। १९ ।
दातव्यमिति यहानं दीयतेऽनुपकारिणे । देशे काले च पाने च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्। २० ।
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः । दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्। २१ ।
अदेशकाले यहानमपात्रेभ्यश्च दीयते । असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्। २२ ।


ॐतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः । ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा । २३ ।
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः । प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्। २४ ।
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः । दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाटिभिः । २५।
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते । प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते । २६ ।
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते । कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते। २७ ।
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् । असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह । २८ ।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७॥

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

सत्रहवाँ अध्याय

इस प्रकार भगवानके वचन सुनकर अर्जुन बोले, हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्रविधि को त्यागकर केवल श्रद्धा से युक्त हुए देवादिकों का पूजन करते हैं उनकी स्थिति फिर कौन-सी है? क्या सात्त्विकी है ? अथवा राजसी किंवा तामसी है ? । १।


इस प्रकार अर्जुन के पूछने पर श्रीकृष्णभगवान् बोले, अर्जुन ! मनुष्यों की वह बिना शास्त्रीय संस्कारों के केवल स्वभाव से उत्पन्न हुई श्रद्धा* सात्त्विकी और राजसी तथा तामसी ऐसे तीनों प्रकार की ही होती है, उसको तू मेरे से सुन । २ । हे


भारत ! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है तथा यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिये जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है अर्थात् जैसी जिसकी श्रद्धा है, वैसा ही उसका स्वरूप है। ३ ।


उनमें सात्त्विक पुरुष तो देवों को पूजते हैं और राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को पूजते हैं तथा अन्य जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं। ४ ।


हे अर्जुन ! जो मनुष्य शास्त्रविधि से रहित केवल मनःकल्पित घोर तप को तपते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त एवं कामना, आसक्ति और बलके अभिमान से भी युक्त हैं। ५ ।


तथा जो शरीररूप से स्थित भूतसमुदाय को अर्थात् शरीर, मन और इन्द्रियादिकों के रूप में परिणत हुए आकाशादि पाँच भूतों को और अन्तःकरण में स्थित मुझ अन्तर्यामी को भी कृश करने वाले हैं, उन अज्ञानियोंको तू आसुरी स्वभाव वाले जान । ६।

सत्रहवाँ अध्याय

हे अर्जुन ! जैसे श्रद्धा तीन प्रकार की होती है, वैसे ही भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस न्यारे-न्यारे भेदको तू मेरेसे सुन । ७।


आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले एवं रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले* तथा स्वभाव से ही मनको प्रिय ऐसे आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ तो सात्त्विक पुरुषको प्रिय होते हैं। ८ ।

कडुवे, खट्टे, लवणयुक्त और अति गरम तथा तीक्ष्ण, रूखे और दाहकारक एवं दुःख-चिन्ता और रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ राजस पुरुषको प्रिय होते हैं। ९ ।


तथा जो भोजन अधपका, रसरहित और दुर्गन्धयुक्त और उच्छिष है तथा जो अपवित्र भी है वह भोजन तापम पुरुषको प्रिय होता है। १०।

Bhagwat Geeta 17 adhyay


हे अर्जुन ! जो यज्ञ शास्त्रविधि से नियत किया हुआ है तथा करना ही कर्तव्य है ऐसे मन को समाधान करके फल को न चाहने वाले पुरुषों- द्वारा किया जाता है, वह यज्ञ तो सात्त्विक है। ११ ।


और हे अर्जुन ! जो यज्ञ केवल दम्भा चरण के ही लिये अथवा फल को भी उद्देश्य रखकर किया जाता है, उस यज्ञ को तू राजस जान । १२ ।


तथा शास्त्रविधि से हीन और अन्नदान से रहित एवं बिना मन्त्रों के, बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किये हुए यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं। १३ ।


साय हे अर्जुन ! देवता, ब्राह्मण, गुरु* और ज्ञानीजनों का पूजन एवं पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा, यह शरीर सम्बन्धी तप कहा जाता है। १४ ।

तथा जो उद्वेगको न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है* और जो वेदशास्त्रों के पढ़ने का एवं परमेश्वर के नाम जपने का अभ्यास है, वह निःसन्देह वाणीसम्बन्धी तप कहा जाता है। १५।

सत्रहवाँ अध्याय


तथा मन की प्रसन्नता और शान्तभाव एवं भगवत्-चिन्तन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण की पवित्रता ऐसे यह मनसम्बन्धी तप कहा जाता है। १६।

परंतु हे अर्जुन ! फल को न चाहने वाले निष्कामी योगी पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा से किये हुए उस पूर्वोक्त तीन प्रकार के तपको सात्त्विक कहते हैं। १७।


और जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिये अथवा केवल पाखण्ड से ही किया जाता है, वह अनिश्चित और क्षणिक फल वाला तप यहाँ राजस कहा गया है। १८ ।


जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से मन, वाणी और शरीर की पीड़ा के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिये किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है। १९ ।


और हे अर्जुन ! दान देना ही कर्तव्य है, ऐसे भाव से जो दान देश*, काल और पात्रको प्राप्त होने पर प्रत्युपकार न करने वाले के लिये दिया जाता है, वह दान तो सात्त्विक कहा गया है। २०।

Bhagwat Geeta 17 adhyay


और जो दान क्लेश पूर्वक तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से अर्थात् बदले में अपना सांसारिक कार्य सिद्ध करने की आशा से अथवा फल को उद्देश्य रख कर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है। २१ ।


और जो दान बिना सत्कार किये अथवा तिरस्कार पूर्वक, अयोग्य देश-काल में, कुपात्रों के लिये अर्थात् मद्य, मांसादि अभक्ष्य वस्तुओं के खाने वालों एवं चोरी, जारी आदि नीच कर्म करने वालों के लिये दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है। २२ ।

हे अर्जुन ! ॐ, तत्, सत्-ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानन्दघन ब्रह्म का नाम कहा है, उसीसे सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादिक रचे गये हैं। २३।

Bhagwat Geeta 15 adhyay, or mahatmy in hindi


इसलिये वेद को कथन करने वाले श्रेष्ठ पुरुषों की शास्त्रविधि से नियत की हुई यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा ‘ॐ’ ऐसे इस परमात्माके नामको उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं। २४ ।

तत् अर्थात् तत् नाम से कहे जाने वाले परमात्मा का ही यह सब है, ऐसे इस भाव से फल को न चाहकर, नाना प्रकार की यज्ञ, तपरूप क्रियाएँ तथा दानरूप क्रियाएँ कल्याण की इच्छा वाले पुरुषों द्वारा की जाती हैं। २५ ।

सत्रहवाँ अध्याय


सत् ऐसे यह परमात्मा का नाम सत्यभाव में और श्रेष्ठ- भाव में प्रयोग किया जाता है तथा हे पार्थ ! उत्तम कर्म में भी सत्-शब्द प्रयोग किया जाता है। २६।

तथा यज्ञ, तप और दान में जो स्थिति है, वह भी सत् है, ऐसे कही जाती है और उस परमात्मा के अर्थ किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत् है, ऐसे कहा जाता है। २७ ।

Bhagwat Geeta 16 adhyay, or mahatmy


हे अर्जुन ! बिना श्रद्धा के होमा हुआ हवन तथा दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ कर्म है, वह समस्त असत् ऐसे कहा जाता है, इसलिये वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न मरने के पीछे ही लाभदायक है, इसलिये मनुष्य को चाहिये कि सच्चिदानन्दघन परमात्मा के
नाम का निरन्तर चिन्तन करता हुआ निष्कामभाव से, केवल परमेश्वर के लिये, शास्त्रविधि से नियत किये कर्मों का परम श्रद्धा और उत्साहके सहित आचरण करे। २८ ।

इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवाद में “श्रद्धात्रयविभागयोग” नामक सत्रहवाँ अध्याय ॥ १७॥

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