MANTRAMOL https://mantramol.com welcome to my website Fri, 27 Aug 2021 15:37:21 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=5.8.1 176510677 Shree Krishna Janmashtami 2021- Date, vrat, Pujan vidhi https://mantramol.com/shree-krishna-janmashtami-2021/ https://mantramol.com/shree-krishna-janmashtami-2021/#respond Fri, 27 Aug 2021 15:04:23 +0000 https://mantramol.com/?p=2998 2021श्री कृष्ण जन्माष्टमी पूजन विधि, पूजन समय और इतिहास ।। Shree Krishna Janmashtami 2021 Shree Krishna janmashtami 2021, हर वर्ष भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष तिथि को बनाई जाती है। ...

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2021श्री कृष्ण जन्माष्टमी पूजन विधि, पूजन समय और इतिहास ।। Shree Krishna Janmashtami 2021

Shree Krishna janmashtami 2021, हर वर्ष भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष तिथि को बनाई जाती है। भारत वर्ष मे जन्माष्टमी को त्यौहार रूप मे बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है। इस दिन श्री कृष्ण भगवान मे श्रद्धा रखने वाले सब श्रद्धालु व्रत रखते है। और उनका पूजन करते है।  जन्माष्टमी के दिन सब भक्तजन श्री कृष्ण जी के मंदिर जाते है। और श्रीकृष्ण जी के बाल स्वरूप के दर्शन करते है।

Shree Krishna Janmashtami 2021

इस वर्ष जन्माष्टमी 30 अगस्त 2021 दिन सोमवार को मनाया जायगा। इस दिन भगवान कृष्ण आधी रात्रि 12:15 am जन्म लिया था। इस लिए जन्माष्टमी का त्यौहार रात्रि मे मनाया जाता है। और जगरात्रे होते है। इस बार की जन्माष्टमी बहुत खास भी है। क्योंकि शात्रो के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र मे हुआ था। और इस बार की जन्माष्टमी रोहिणी नक्षत्र मे ही आ रही है। इस कारण जन्माष्टमी को बहुत विशेष सयोंग बन रहा है।

जन्माष्टमी पूजन, व्रत व शुभ मुहूर्त

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पूजन शुभ मुहूर्त 30 अगस्त 2021 दिन सोमवार सुबह 11:56 से रात्रि 12:47 मिनट तक रहेगा। जन्माष्टमी व्रत 30 अगस्त को रखा जाएगा।

Shree Krishna Janmashtami 2021- Date, vrat, Pujan vidhi

श्रीकृष्ण पूजन मंत्र 

  1. ओम श्री कृष्णयं नम: ।
  2. ॐ श्री माधवायं नम: ।
  3. ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:।
  4. ओम श्री नारायणाये नम:।
  5. ॐ श्री लक्ष्मीनारायणाये नम:।
  6. ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।। प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः।
  7. ओम नमः भगवते वासुदेवाय कृष्णाय क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः।
  8. हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण-कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम, राम-राम हरे हरे।
  9. ओम क्लीम कृष्णाय नमः।
  10. ॐ श्रीं नमः श्रीकृष्णाय परिपूर्णतमाय स्वाहा।
  11. ॐ देविकानन्दनाय विधमहे वासुदेवाय धीमहि तन्नो कृष्ण:प्रचोदयात
  12. ओम कृं कृष्णाय नमः

Kali Mata kavach path ।। कीलकम स्त्रोतं ।

पूजन विधि Shree Krishna Janmashtami 2021

1. सुबहा स्नान करके शुध्द वस्त्र धारण करे।

2. पूजन की सारी सामग्री एकत्रित कर ले।

3. श्रीकृष्ण जी की प्रतिमा के संमुख ज्योत व धूप लगाए।

4. फिर व्रत का संकल्प करके पूजन करें संकल्प कैसे करते हैं। यहां देखे। 👇

Sankalp kya hota hai ।। संकल्प कैसे करते है।

5. सूर्य देव को जल चढ़ाए।

6. दोपहर 12:00 के बाद श्रीकृष्ण मंदिर जाय।। और बाल गोपाल को झूला झूलाए, फल का भोग लगाए।

7. शिवलिंग पर जल चढ़ाए।

8. मंदिर जा आने के‌ पश्चात जल, फल व चाय, दूध का सेवन करें।

9. जन्माष्टमी के व्रत के दिन बार बार पानी या फल ग्रहण न करे।

10. रात्रि चंद्र देव के दर्शन व जल चढ़ा कर भोजन ग्रहण करे। भोजन बिना प्याज, लहसुन के हो।

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Sawan shivratri 2021 date – shiv poojan murhat https://mantramol.com/sawan-shivratri-2021-date/ https://mantramol.com/sawan-shivratri-2021-date/#respond Wed, 04 Aug 2021 14:50:28 +0000 https://mantramol.com/?p=2954 शिवरात्रि जल चढ़ाने का समय Sawan shivratri 2021 date।। सावन महीने की शिवरात्रि कब है? जाने डेट, पूजन का समय, और पूजन विधि।   Sawan shivratri 2021 date : 24 ...

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शिवरात्रि जल चढ़ाने का समय Sawan shivratri 2021 date।। सावन महीने की शिवरात्रि कब है? जाने डेट, पूजन का समय, और पूजन विधि।

 

Sawan shivratri 2021 date : 24 जुलाई से सावन का महीना शुरू हुआ था। 22 अगस्त को समाप्त होगा। इस बीच आने वाली सावन की “शिवरात्रि” का बहुत महत्व है। इस दिन सब लोग भगवान शिव का पूजन करते है। शिवलिंग पर पाँच पहर जल चढाते है। शिवरात्रि के दिन जगह जगह जगराते होते है। शिवरात्रि का पर्व भगवान शिव को बहुत प्रिय है।

सावन शिवरात्रि कब है। { Sawan shivratri 2021 date }

इस बार सावन की शिवरात्रि 6 अगस्त 2021 को मनाई जायेगी। भगवान शिव के श्रद्धालु ! इस दिन व्रत व पूजन करते है। शिवरात्रि का त्योहार भारत मे बड़ी धूम धाम से बनाया जाता है।

सावन शिवरात्रि पंचाग अनुसार

पंचाग के अनुसार शिवरात्रि मास की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। चतुर्दशी तिथि का आरम्भ 6 अगस्त दिन शुक्रवार शाम 6:28 से होकर 7 अगस्त शाम 7:11 तक होगा।

Bhagwat Geeta 17 adhyay, and mahatmy

शिवरात्रि पूजन का समय

सावन की “शिवरात्रि” का पूजन का समय सुबहा 3 बजे से आरम्भ होकर दोपहर के 12 बजे तक होगा। 3am से 12pm के बीच कभी भी पूजन कर सकते है।

सावन शिवरात्रि पूजन विधि

शिवलिंग पर जल, दूध, दही, शहद, धतूरा व बिल्वपत्र चढ़ा कर भगवान शिव की आरती करे।

सिंदूर तिलक वशीकरण मंत्र साधना सम्पूर्ण विधि के साथ |

सावन शिवरात्रि पूजन मंत्र

1. ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् |
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ||

2 ॐ घोराय नम:।

3. ॐ तत्पुरुषाय विद्धमेह महादेवाय तन्नो रुद्र प्रचोदयात।

4. ॐ नम : शिवाय।

5. ह्री ॐ नम: शिवाय ह्रीं।

6.ॐ महादेवाय नम:।

7. ॐ महेश्वराय नम:।

8. ॐ नमो भगवते रुद्राय ।

9. ॐ ह्रौं ह्रीं जूं स: महेश्वराय नम:।

10. ह्रौं ह्रीं जूं स: पशुपतये नम:।

11. ॐ नीलकण्ठाय नम:।

12. ॐ सदाशिवाय नम:।

13. ॐ शिवतराय नम:

14. ॐ नम: शिवाय मृत्युंजय महादेवाय नमोस्तुते

15. ओम ह्रौं ह्रीं जूं स: शिवाय नमः।

16.  प्रौं ह्रीं ठ:।

17. रं क्षं मं यं औं ॐ।

18. ॐ ह्रीं ग्लौं नम: शिवाय ।

19. ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्तये महां मेधां प्रयच्छ स्वाहा।

20. ॐ ऎं ह्रीं ॐ क्रीं ह्रीं क्लीं ह्रीं ह्रीं

Date confirm in aaj tuk

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सिंदूर तिलक वशीकरण मंत्र साधना सम्पूर्ण विधि के साथ | https://mantramol.com/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%82%e0%a4%b0-%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%b6%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a3-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/ https://mantramol.com/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%82%e0%a4%b0-%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%b6%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a3-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/#respond Sun, 30 May 2021 10:45:57 +0000 https://mantramol.com/?p=2809 सिंदूर वशीकरण मंत्र से सिंदूर वशीकरण सिर्फ एक सिंदूर के तिलक से करे अपनी मन चाही स्त्री का वशीकरण।।   साधनों आज मैं आपको सिंदूर तिलक वशीकरण मंत्र साधना के ...

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सिंदूर वशीकरण मंत्र से सिंदूर वशीकरण सिर्फ एक सिंदूर के तिलक से करे अपनी मन चाही स्त्री का वशीकरण।।

 

साधनों आज मैं आपको सिंदूर तिलक वशीकरण मंत्र साधना के बारे मैं बताने जा रहा हूँ। कि आप कैसे सिर्फ एक सिंदूर के तिलक से वशीकरण कर सकते है। बिना किसी के पता लगे, और बिना कुछ कुछ खिलाय पिलाये। मैं आप सब को संपूर्ण विधि के साथ बताने वाला‌ हूँ।

सिंदूर का परिचय

साधकों सिंदूर का हमारी संस्कृति मे बहुत महत्व है। सिंदूर हमारे सनातन धर्म की हर पूजा-पाठ मे इस्तमाल होता है। यह दिखने मे “लाल‌‌ रंग” का होता है। सिंदूर को हिन्दू धर्म की विवाहित स्त्रियाँ अपनी मांग मे धारण करती है। यह विवाहित स्त्री की पहचान है।

सिंदूर तिलक वशीकरण मंत्र साधना

मित्रो आप सिंदूर वशीकरण साधना ! होली, दीपावली, व ग्रहण मे कर सकते है। यह साधना आप दो विधि से कर सकते है। वह दोनो विधि मै आपको‌ आज बताने जा‌‌ रहा हूँ। कि कैसे आप यह साधना सिद्ध कर सकते है।

सिंदूर तिलक वशीकरण साधना मंत्र

ॐ नमो आदेश गुरु का।
सिंदूर की माया।
सिंदूर नाम तेरी पत्ती।
कामाख्या सिर पर तेरी उत्पत्ति।
सिंदूर पढ़ि मैं लगाऊँ बिन्दी।
वश अमुख होके रहे निर्बुध्दी।
महादेव की शक्ति। गुरु की भक्ति।
न वशी हो तो कामरु कामाख्या को दुहाई।
आदेश हाड़ी दासी चण्डी का।
अमुक का मन लाओ निकाल।
नहीं तो महादेव पिता का वाम पढ़ जाये लाग।
आदेश आदेश आदेश

महत्वपूर्ण जानकारी

इस मंत्र मे जहां भी अमुख, या अमुक शब्द इस्तमाल किया गया है। उसके स्थान पर आप‌ जिस भी व्यक्ति को वश मे करना चाहते है। उनका नाम ले। पर जब यह मंत्र आप सिद्ध कर रहे है। तब आप को अमुख और अमुक ही बोलना है। जब आप इस मंत्र का‌ किसी व्यक्ति पर इस्तमाल करना चाहते है। तो अमुख और अमुक के‌ स्थान पर उस व्यक्ति का नाम लेना है।

अधिक जानकारी के लिए यहा क्लिक करे |

पहली विधि

विधि-सर्वप्रथम एक चाँदी की डिब्बी में असली सिन्दूर लेकर छत पर या
किसी खुले स्थान में पूर्णमासी की सारी रात्रि में छोड़ दें। यह इस प्रकार से डिब्बी को
खुली रखें कि इस पर सारी रात चाँदनी पड़ती रहें। सूर्योदय से पूर्व ही इसे उठा लायें
और सिरहाने रखें। सोमवार की रात्रि में दूध में थोड़ी-सी ब्रांडी मिला कर सम्पूर्ण शरीर में
मालिश करें। बालों में भी और चाँद पर भी इसके बाद स्नान कके नैऋत्य कोण की
ओर मुख करके बैठे और दाहिने हाथ की हथेली पर वह डिबिया रखकर 1008
मंत्र का जाप करें। यह आसन र्निवस्त्र होकर लगाया जाता है । तत्पश्चात् आवश्यकता
पड़ने पर इस सिन्दूर का टीका माथे पर लगा जहां भी जाएंगें वहां पर सभी लोग प्रभावित होंगे।

Madanan Mata Sadhana ।। मदानन माता साधना।

दूसरी विधि

आप इस मंत्र को होली, दीपावली, व ग्रहण मे सिद्ध कर सकते है। अगर यह मंत्र आप होली या दीपावली मे सिद्ध करते है। तो आपको रात के 11:00 बजे से लेकर सुबहा के 4:00 तक करना है। देसी घी का दिपक व धूप लगाकर जाप करना है। यदि यह मंत्र आप ग्रहण मे सिद्ध करते है। तो ग्रहण वाले दिन पानी मे नाभि तक खड़े होकर। खुला जाप करना‌ है। जब तक ग्रहण काल समाप्त न हो जाए।

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Bhagwat Geeta 18 adhyay, or mahatmy in hindi https://mantramol.com/bhagwat-geeta-18-adhyay/ https://mantramol.com/bhagwat-geeta-18-adhyay/#respond Mon, 24 May 2021 12:02:05 +0000 https://mantramol.com/?p=2786 साधकों आप के लिए प्रस्तुत "Bhagwat Geeta 15 adhyay" श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 15 व माहात्म्य हिन्दी व संस्कृत सहित

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श्रीमद्भगवद्गीताके अठारहवें अध्यायका माहात्म्य || Bhagwat Geeta 18 adhyay

साधकों आप के लिए प्रस्तुत “Bhagwat Geeta 18 adhyay” श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 व माहात्म्य हिन्दी व संस्कृत सहित

श्रीपार्वतीजी ने कहा-भगवन् ! आपने सत्रहवें अध्याय का माहात्म्य बतलाया। अब अठारहवें अध्याय के माहात्म्य का वर्णन कीजिये। श्रीमहादेवजी ने कहा-गिरिनन्दिनि ! चिन्मय आनन्द की धारा बहाने वाले अठारहवें अध्याय के पावन माहात्म्य को जो वेद से भी उत्तम है, श्रवण करो। यह सम्पूर्ण शास्त्रों का सर्वस्व, कानों में पड़ा हुआ रसायन के समान तथा संसार के यातना-जाल को छिन्न-भिन्न करने वाला है। सिद्ध पुरुषों के लिये यह परम रहस्य की वस्तु है। इसमें अविद्या का नाश करने की पूर्ण क्षमता है। यह भगवान् विष्णु की चेतना तथा सर्वश्रेष्ठ परम पद है। इतना ही नहीं, यह विवेकमयी लताका मूल, काम-क्रोध और मदको नष्ट करने वाला, इन्द्र आदि देवताओं के चित्त का विश्राम-मन्दिर तथा सनक- सनन्दन आदि महायोगियों का मनोरञ्जन करने वाला है।

इसके पाठ मात्र से यमदूतों की गर्जना बंद हो जाती है। पार्वती ! इससे बढ़कर कोई ऐसा रहस्यमय उपदेश नहीं है, जो संतप्त मानवों के त्रिविध तापको हरने वाला और बड़े-बड़े पातकों का नाश करने वाला हो । अठारहवें अध्याय का लोकोत्तर माहात्म्य । इसके सम्बन्ध में जो पवित्र उपाख्यान है, उसे भक्तिपूर्वक सुनो। उसके श्रवण मात्र से जीव समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। मेरुगिरि के शिखर पर अमरावती नाम वाली एक रमणीय पुरी है। उसे पूर्वकाल में विश्वकर्मा ने बनाया था। उस पुरीमें देवताओं द्वारा सेवित इन्द्र शचीके साथ निवास करते थे। एक दिन वे सुखपूर्वक बैठे हुए थे, इतने ही में उन्होंने देखा कि भगवान् विष्णु के दूतों से सेवित एक अन्य पुरुष वहाँ आ रहा है।

Bhagwat Geeta 18 adhyay

इन्द्र उस नवागत पुरुष के तेज से तिरस्कृत होकर तुरंत ही अपने मणिमय सिंहासन से मण्डप में गिर पड़े। तब इन्द्र के सेवकों ने देवलोक के साम्राज्य का मुकुट इस नूतन इन्द्र के मस्तक पर रख दिया। फिर तो दिव्य गीत गाती हुई देवाङ्गनाओंके साथ सब देवता उनकी आरती उतारने लगे। ऋषियों ने वेदमन्त्रों का उच्चारण करके उन्हें अनेक आशीर्वाद दिये। गन्धर्वो का ललित स्वर में मङ्गलमय गान होने लगा। इस प्रकार इस नवीन इन्द्र को सौ यज्ञों का अनुष्ठान किये बिना ही नाना प्रकारके उत्सवों से सेवित देख कर पुराने इन्द्र को बड़ा विस्मय हुआ। वे सोचने लगे ‘इसने तो मार्ग में न कभी पौंसले बनवाये हैं, न पोखरे खुदवाये हैं और न पथिकों को विश्राम देने वाले बड़े-बड़े वृक्ष ही लगवाये हैं। अकाल पड़नेपर अन्नदान के द्वारा इसने प्राणियों का सत्कार भी नहीं किया है।

इसके द्वारा तीर्थों में सत्र और गाँवोंमें यज्ञका अनुष्ठान भी नहीं हुआ है। फिर इसने यहाँ भाग्य की दी हुई ये सारी वस्तुएँ कैसे प्राप्त की हैं ?’ इस चिन्तासे व्याकुल होकर इन्द्र भगवान् विष्णु से पूछने के लिये प्रेम पूर्वक क्षीरसागर के तटपर गये और वहाँ अकस्मात् अपने साम्राज्य से भ्रष्ट होने का दुःख निवेदन करते हुए बोले-‘लक्ष्मीकान्त ! मैंने पूर्वकाल में आपकी प्रसन्नताके लिये सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। उसी के पुण्य से मुझे इन्द्र पद की प्राप्ति हुई थी; किंतु इस समय स्वर्ग में कोई दूसरा ही इन्द्र अधिकार जमाये बैठा है। उसने तो न कभी धर्म का अनुष्ठान किया है और न यज्ञों का। फिर उसने मेरे दिव्य सिंहासन पर कैसे अधिकार जमाया है?’

Bhagwat Geeta 18 adhyay

श्रीभगवान् बोले-इन्द्र ! वह गीता के अठारहवें अध्यायमें से पाँच श्लोकों का प्रतिदिन पाठ करता है। उसी के पुण्य से उसने तुम्हारे उत्तम साम्राज्य को प्राप्त कर लिया है। गीता के अठारहवें अध्याय का पाठ सब पुण्यों का शिरोमणि है। उसी का आश्रय लेकर तुम भी अपने पदपर स्थिर हो सकते हो। भगवान् विष्णु के ये वचन सुनकर और उस उत्तम उपाय को जानकर इन्द्र ब्राह्मण का वेष बनाये गोदावरी के तटपर गये। वहाँ उन्होंने कालिका ग्राम नामक उत्तम और पवित्र नगर देखा, जहाँ काल का भी मर्दन करने वाले भगवान् कालेश्वर विराजमान हैं। वहीं गोदावरी-तटपर एक परम धर्मात्मा ब्राह्मण बैठे थे, जो बड़े ही दयालु और वेदोंके पारङ्गत विद्वान् थे।

वे अपने मन को वश में करके प्रतिदिन गीताके अठारहवें अध्याय का स्वाध्याय किया करते थे। उन्हें देखकर इन्द्रने बड़ी प्रसन्नता के साथ उनके दोनों चरणों में मस्तक झुकाया और उन्हीं से अठारहवें अध्याय को पढ़ा। फिर उसीके पुण्य से उन्होंने श्रीविष्णु का सायुज्य प्राप्त करलिया। इन्द्र आदि देवताओं का पद बहुत ही छोटा है, यह जानकर वे परम हर्ष के साथ उत्तम वैकुण्ठधाम को गये। अतः यह अध्याय मुनियों के लिये श्रेष्ठ परम तत्त्व है। पार्वती ! अठारहवें अध्याय के इस दिव्य माहात्म्य का वर्णन समाप्त हुआ। इसके श्रवणमात्रसे मनुष्य सब पापों से छुटकारा पा जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण गीता का पाप नाशक माहात्म्य बतलाया गया। महाभागे ! जो पुरुष श्रद्धायुक्त होकर इसका श्रवण करता है, वह समस्त यज्ञों का फल पाकर अन्त में श्रीविष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेता है।

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

अथाष्टादशोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

सत्र्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन। १ ।

श्रीभगवानुवाच

काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः। २ ।
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः । यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे। ३ ।
निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम । त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः। ४ ।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्। ५ ।
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च । कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्। ६ ।
नियतस्य तु सन्यासः कर्मणो नोपपद्यते। मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः। ७ ।
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्। स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्। ८ ।
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन । सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः। ९
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषजते । त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः । १० ।

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते । ११ ।
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् । भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्यासिनां क्वचित्। १२ ।
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे। साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्। १३ ।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्वेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्। १४ ।
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः । न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः । १५ ।
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः । पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः । १६ ।
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते । १७ ।
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना । करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः । १८।
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः । प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि । १९ ।
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् । २० ।

श्रीभगवानुवाच

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्। २१ ।
कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् । अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्। २२ ।
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् । अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते । २३ ।
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः । क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्। २४ ।
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम् । मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते। २५।
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते । २६ ।
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः । हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः । २७ ।
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः । विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते । २८ ।
बुद्धे/दं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु। प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय। २९।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये । बन्धं मोक्षंच या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थसात्त्विकी। ३०।

यया धर्ममधर्म च कार्य चाकार्यमेव च । अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी । ३१ ।
अधर्म धर्ममिति या मन्यते तमसावृता । सर्वार्थाविपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी । ३२ ।
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः । योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी । ३३ ।
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन । प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी । ३४ ।
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च । न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी । ३५ ।
सुखं त्विदानी त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ । अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति । ३६ ।
यत्तदने विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् । तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् । ३७ ।
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् । परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्। ३८।
यदने चानुबन्ये च सुखं मोहनमात्मनः । निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्। ३९।
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्रिभिर्गुणैः । ४०।

श्रीभगवानुवाच

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप । कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः । ४१ ।
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् । ४२ ।
शौर्य तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् । ४३ ।
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् । परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्। ४४ ।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः । स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु। ४५ ।
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः । ४६ ।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् । ४७ ।
सहज कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः । ४८।
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति । ४९ ।
सिद्धि प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे। समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा । ५० ।

बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च । शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च । ५१ ।
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः । ५२ ।
अहङ्कारं बलं दर्प कामं क्रोधं परिग्रहम् । विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते । ५३ ।
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्गति । समः सर्वेषु भूतेषु मद्धक्तिं लभते पराम्। ५४ ।
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्। ५५।
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्यपाश्रयः । मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्। ५६ ।
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सत्र्यस्य मत्परः । बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव । ५७ ।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि । अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनश्यसि । ५८।
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति । ५९।
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्। ६० ।

श्रीभगवानुवाच

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया। ६१ ।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । तत्प्रसादात्परां शान्ति स्थान प्राप्स्यसि शाश्वतम्। ६२ ।
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया। विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु । ६३ ।
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः । इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्। ६४।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे। ६५।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः । ६६ ।
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति । ६७।
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति । भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः । ६८।
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः । भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि । ६९।
अध्येष्यते च य इमं धयं संवादमावयोः । ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः । ७० ।
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः । सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् । ७१ ।
कश्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा । कञ्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय। ७२ ।

अर्जुन उवाच

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव । ७३ ।

सञ्जय उवाच

इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः । संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् । ७४।
व्यासप्रसादाच्छुतवानेतद्गुह्यमहंगा परम् । योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् । ७५ ।
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् । केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः । ७६ ।
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः । विस्मयो मे महान् राजन्हष्यामि च पुनः पुनः । ७७ ।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्भुवा नीतिर्मतिर्मम । ७८ ।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्याया योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
मोक्षसत्र्यासयोगो नामाष्टादशोऽध्यायः ॥१८॥

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

अठारहवाँ अध्याय

उसके उपरान्त अर्जुन बोले, हे महाबाहो ! हे अन्तर्यामिन् ! हे वासुदेव ! मैं संन्यास और त्यागके तत्त्वको पृथक्-पृथक् जानना चाहता
हूँ। १ ।

इस प्रकार अर्जुनके पूछनेपर श्रीकृष्ण भगवान् बोले, हे अर्जुन ! कितने ही पण्डितजन तो काम्य कर्मो के त्याग को संन्यास जानते हैं और कितने ही विचार कुशल पुरुष सब कर्मो के फल के त्याग को त्याग कहते हैं। २ ।

तथा कई एक विद्वान् ऐसे कहते हैं कि कर्म सभी दोषयुक्त हैं, इसलिये त्यागनेके योग्य हैं और दूसरे विद्वान् ऐसे कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं। ३ ।

परन्तु हे अर्जुन ! उस त्यागके विषय में तू मेरे निश्चय को सुन, हे पुरुषश्रेष्ठ ! वह त्याग सात्त्विक, राजस और तामस ऐसे तीनों प्रकार का ही कहा गया है। ४ ।

तथा यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागने के योग्य नहीं है, किन्तु वह निःसन्देह करना कर्तव्य है; क्योंकि यज्ञ, दान और तप यह तीनों ही बुद्धिमान् पुरुषों को पवित्र करने वाले हैं। ५।

इसलिये हे पार्थ ! यह यज्ञ, दान, और तपरूप कर्म तथा और भी सम्पूर्ण श्रेष्ठ कर्म, आसक्ति को और फलों को त्यागकर, अवश्य करने चाहिये, ऐसा मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है। ६ ।

और हे अर्जुन ! नियत कर्मका। त्याग करना योग्य नहीं है, इसलिये मोह से उसका त्याग करना तामस त्याग कहा गया है। ७ ।

यदि कोई मनुष्य जो कुछ कर्म है, वह सब ही दुःखरूप है ऐसे समझ कर, शारीरिक क्लेश के भय से कर्मों का त्याग कर दे, तो वह पुरुष उस राजस त्याग को करके भी त्याग के फल को प्राप्त नहीं होता है, अर्थात् उसका वह त्याग करना व्यर्थ ही होता है। ८।

हे अर्जुन ! करना कर्तव्य है ऐसे समझ कर ही जो शास्त्रविधि से नियत किया हुआ कर्तव्य कर्म आसक्ति को और फल को त्यागकर किया जाता है, वह ही सात्त्विक त्याग माना गया है अर्थात् कर्तव्यकर्मो को स्वरूप से न त्याग कर उनमें जो आसक्ति और फल का त्यागना है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है। ९ ।

Bhagwat Geeta 18 adhyay

हे अर्जुन ! जो पुरुष अकल्याणकारक कर्म से तो द्वेष नहीं करता है और कल्याण कारक कर्म में आसक्त नहीं होता है, वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त हुआ पुरुष संशय रहित, ज्ञानवान् और त्यागी
है। १० ।

क्योंकि देहधारी पुरुषके द्वारा सम्पूर्णता से सब कर्म त्यागे जाने को शक्य नहीं हैं, इससे जो पुरुष कर्मो के फल का त्यागी है, वही त्यागी है ऐसे कहा जाता है। ११ ।

सकामी पुरुषों के कर्म का ही अच्छा, बुरा और मिला हुआ ऐसे तीन प्रकार का फल मरने के पश्चात् भी होता है और त्यागी * पुरुषों के कर्मों का फल किसी काल में भी नहीं होता; क्योंकि उनके द्वारा होने वाले कर्म वास्तव में कर्म नहीं हैं। १२ ।

हे महाबाहो ! सम्पूर्ण कर्मो की सिद्धि के लिये अर्थात् सम्पूर्ण कर्मो के सिद्ध होने में यह पाँच हेतु सांख्यसिद्धान्त में कहे गये हैं, उनको तू मेरे से भली प्रकार जान । १३ ।

हे अर्जुन ! इस विषय में आधार’ और कर्ता तथा न्यारे-न्यारे करण और नाना प्रकार की न्यारी-न्यारी चेष्टा एवं वैसे ही पाँचवाँ हेतु दैव कहा गया है। १४ । क्योंकि मनुष्य मन, वाणी और शरीर से शास्त्र के अनुसार अथवा विपरीत भी जो कुछ कर्म आरम्भ करता है, उसके यह पाँचों ही कारण हैं। १५।

परंतु ऐसा होनेपर भी जो पुरुष अशुद्धबुद्धि’ होने के कारण उस विषय में केवल शुद्धस्वरूप आत्मा को कर्ता देखता है, वह मलिन बुद्धिवाला अज्ञानी यथार्थ नहीं देखता है। १६ ।

हे अर्जुन ! जिस पुरुषके अन्तःकरणमें मैं कर्ता हूँ, ऐसा भाव नहीं है तथा जिस की बुद्धि सांसारिक पदार्थों में और सम्पूर्ण कर्मो में लिपाय मान नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मार कर भी वास्तव में न तो मारता है और न पापसे बँधता है।।१७।

हे भारत ! ज्ञाता*, ज्ञान, और ज्ञेय यह तीनों तो कर्म के प्रेरक हैं अर्थात् इन तीनों के संयोग से कर्म में प्रवृत्त होने की इच्छा उत्पन्न होती है और कर्ता, करण और क्रियाझ यह तीनों कर्म के संग्रह हैं अर्थात् इन तीनों के संयोग से कर्म बनता है। १८ ।

Bhagwat Geeta 18 adhyay

उन सबमें ज्ञान और कर्म तथा कर्ता भी गुणोंके भेदसे सांख्य- शास्त्र में तीन-तीन प्रकार से कहे गये हैं, उन को भी तू मेरे से भली प्रकार सुन । १९ ।

हे अर्जुन ! जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक्-पृथक् सब भूतों में एक अविनाशी परमात्मभाव को विभागरहित समभाव से स्थित देखता है, उस ज्ञान को तो तू सात्त्विक जान । २०।

और जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के अनेक भावों को न्यारा- न्यारा करके जानता है, उस ज्ञान को तू राजस जान । २१ ।

और जो ज्ञान एक कार्य रूप शरीर में ही सम्पूर्णता के सदृश आसक्त है अर्थात् जिस विपरीत ज्ञान के द्वारा मनुष्य एक क्षणभङ्गुर नाशवान् शरीर को ही आत्मा मान कर उस में सर्वस्व की भाँति आसक्त रहता है तथा जो बिना युक्ति वाला, तत्त्व-अर्थसे रहित और तुच्छ है, वह ज्ञान तामस कहा गया है। २२ ।

हे अर्जुन ! जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित, फल को न चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना रागद्वेष से किया हुआ है, वह कर्म सात्त्विक कहा जाता है। २३ ।

और जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त है तथा फल को चाहने वाले और अहंकार युक्त पुरुषद्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है। २४ ।

तथा जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को न विचार कर केवल अज्ञान से आरम्भ किया जाता है, वह कर्म तामस कहा जाता है। २५ ।

हे अर्जुन ! जो कर्ता आसक्ति से रहित और अहंकार के वचन बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त, कार्य के सिद्ध होने और न होने हर्ष-शोकादि विकारों से रहित है, वह कर्ता तो सात्त्विक कहा जात है। २६ ।

जो आसक्ति से युक्त कर्मो के फल को चाहने वाला और लोभ है तथा दूसरों को कष्ट देने के स्वभाव वाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोक से लिपायमान है, वह कर्ता राजस कहा गया है। २७ ।

Bhagwat Geeta 18 adhyay

विक्षेपयुक्त-चित्तवाला, शिक्षा से रहित, घमंडी, धूर्त और दूसरे की आजीविकाका नाशक एवं शोक करने के स्वभाव वाला, आलसी और दीर्घसूत्री* है, वह कर्ता तामस कहा जाता है। २८।

हे अर्जुन ! तू बुद्धि का और धारणशक्ति का भी गुणों के कारण तीन प्रकार का भेद सम्पूर्णता से विभाग पूर्वक मेरे से कहा हुआ सुन । २९ ।

हे पार्थ ! प्रवृत्तिमार्ग* और निवृत्तिमार्ग को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को एवं भय और अभय को तथा बन्धन और मोक्ष को जो जिस बुद्धि तत्त्व से जानती है, वह बुद्धि तो सात्त्विकी है। ३०।

हे पार्थ ! जिस बुद्धि के द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता है, वह बुद्धि राजसी है। ३१ ।

और हे अर्जुन ! जो तमोगुण से आवृत हुई बुद्धि अधर्म को धर्म ऐसा मानती है तथा और भी सम्पूर्ण अर्थोंको विपरीत ही मानती है, वह बुद्धि तामसी है। ३२ ।

हे पार्थ ! ध्यानयोग के द्वारा जिस अव्यभिचारिणी धारणा से* मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करता है वह धारणा तो सात्त्विकी है। ३३ ।

और हे पृथापुत्र अर्जुन ! फल की इच्छा वाला मनुष्य अति आसक्ति से जिस धारणा के द्वारा धर्म, अर्थ और कामों को धारण करता है, वह धारणा राजसी है। ३४ ।

तथा हे पार्थ ! दुष्टबुद्धि वाला मनुष्य जिस धारणा के द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता और दुःख को एवं उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता है अर्थात् धारण किये रहता है, वह धारणा तामसी है। ३५ ।

Bhagwat Geeta 18 adhyay

हे अर्जुन ! अब सुख भी तू तीन प्रकार का मेरे से सुन, हे भरतश्रेष्ठ ! जिस सुख में साधक पुरुष भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और दुःखोंके अन्तको प्राप्त होता है। ३६ ।

वह सुख प्रथम साधन के आरम्भ काल में यद्यपि विषके सदृश भासता है परन्तु परिणाम में अमृतके तुल्य है, इसलिये जो भगवत्-विषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न हुआ सुख है, वह सात्त्विक कहा गया है। ३७।

जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से होता है, वह यद्यपि भोग काल में अमृत के सदृश भासता है, परन्तु परिणाम में विषके सदृश है, इसलिये वह सुख राजस कहा गया है। ३८ ।

तथा जो सुख भोगकाल में और परिणाम में भी आत्मा को मोहने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न हुआ सुख तामस कहा गया है। ३९ ।

और हे अर्जुन ! पृथ्वी में या स्वर्ग में अथवा देवताओं में ऐसा वह कोई भी प्राणी नहीं है कि जो इन प्रकृति से उत्पन्न हुए तीनों गुणोंसे रहित हो, क्योंकि यावन्मात्र सर्व जगत् त्रिगुणमयी माया का ही विकार है। ४० ।

इसलिये हे परंतप ! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के भी कर्म स्वभाव से उत्पन्न हुए गुणों करके विभक्त किये गये हैं अर्थात् पूर्वकृत कर्मोके संस्कार रूप स्वभाव से उत्पन्न हुए गुणों के अनुसार विभक्त किये गये हैं। ४१ ।

Bhagwat Geeta 18 adhyay

उनमें अन्तःकरण का निग्रह, इन्द्रियों का दमन, बाहर-भीतर की शुद्धि*, धर्म के लिये कष्ट सहन करना और क्षमाभाव एवं मन, इन्द्रियाँ और शरीर की सरलता, आस्तिक बुद्धि, शास्त्रविषयक ज्ञान और परमात्मतत्त्वका अनुभव भी, ये तो ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं। ४२ ।

शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में भी न भागने का स्वभाव एवं दान और स्वामीभाव अर्थात् निःस्वार्थ भाव से सब का हित सोचकर शास्त्राज्ञानुसार शासन द्वारा प्रेमके सहित पुत्रतुल्य प्रजा को पालन करने का भाव-ये सब क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं। ४३।

खेती, गोपालन और क्रय-विक्रयरूप सत्य व्यवहार*, ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं और सब वर्गों की सेवा करना-यह शूद्रका भी स्वाभाविक कर्म है। ४४ ।

एवं इस अपने-अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य भगवत्-प्राप्तिरूप परमसिद्धि को प्राप्त होता है, परंतु जिस प्रकार से अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य परमसिद्धिको प्राप्त होता है, उस विधि को तू मेरे से सुन । ४५ ।

हे अर्जुन ! जिस परमात्मा से सर्वभूतों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सर्वजगत् व्याप्त है* उस परमेश्वर को अपने स्वाभाविक कर्म द्वारा पूज कर मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त होता है। ४६।

इसलिये अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है; क्योंकि स्वभाव से नियत किये हुए स्वधर्म रूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता । ४७ ।

अतएव हे कुन्तीपुत्र ! दोषयुक्त भी स्वाभाविक कर्म को नहीं त्यागना चाहिये; क्योंकि धुएँ से अग्नि के सदृश सब ही कर्म किसी-न-किसी दोष से आवृत हैं। ४८।

Bhagwat Geeta 18 adhyay

हे अर्जुन ! सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धि वाला, स्पृहा रहित और जीते अन्तःकरण वाला पुरुष सांख्य योग के द्वारा भी परम नैष्कर्म्य सिद्धि को प्राप्त होता है अर्थात् क्रियारहित शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्मा की प्राप्ति रूप परमसिद्धि को प्राप्त होता है। ४९।

इसलिये हे कुन्तीपुत्र ! अन्तःकरण की शुद्धि रूप सिद्धि को प्राप्त हुआ पुरुष जैसे सांख्ययोग के द्वारा सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त होता है तथा जो तत्त्वज्ञान की परानिष्ठा है, उसको भी तू मेरे से संक्षेप से जान । ५० ।

हे अर्जुन ! विशुद्ध बुद्धि से युक्त, एकान्त और शुद्ध देश का सेवन करने वाला तथा मिताहारी*, जीते हुए मन, वाणी, शरीर वाला और दृढ़ वैराग्य को भली प्रकार प्राप्त हुआ पुरुष निरन्तर ध्यानयोग के परायण हुआ, सात्त्विक धारणा से* अन्तःकरण को वश में करके तथा शब्दादिक विषयों को त्याग कर और राग-द्वेषों को नष्ट करके। ५१-५२।

तथा अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और संग्रह को त्यागकर ममता रहित और शान्त अन्तःकरण हुआ, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव होने के लिये योग्य होता है। ५३ ।

फिर वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित हुआ प्रसन्न चित्तवाला पुरुष न तो किसी वस्तु के लिये शोक करता है और न किसी की आकाङ्क्षा ही करता है एवं सब भूतों में समभाव हुआ। मेरी पराभक्तिको प्राप्त होता है। ५४ ।

उस पराभक्ति के द्वारा मेरे को तत्त्व से भली प्रकार जानता है कि मैं जो और जिस प्रभाव वाला हूँ तथा उस भक्ति से मेरे को तत्त्व से जानकर तत्काल ही मेरे में प्रवेश हो जाता है अर्थात् अनन्य भाव से मेरे को प्राप्त हो जाता है, फिर उसकी दृष्टि में मुझ वासुदेव के सिवा और कुछ भी नहीं रहता। ५५ ।

Bhagwat Geeta 18 adhyay

मेरे परायण हुआ निष्काम कर्मयोगी तो सम्पूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परम पद को प्राप्त हो जाता है । ५६ ।

इसलिये हे अर्जुन ! तू सब कर्मों को मन से मेरे में अर्पण करके*, मेरे परायण हुआ समत्वबुद्धिरूप निष्काम कर्मयोग का
अवलम्बन करके निरन्तर मेरे में चित्तवाला हो । ५७ ।

इस प्रकार तू मेरे में निरन्तर मनवाला हुआ मेरी कृपा से जन्म-मृत्यु आदि सब संकटों को अनायास ही तर जायगा और यदि अहंकारके कारण मेरे वचनों को नहीं सुनेगा तो नष्ट हो जायगा अर्थात् परमार्थ से भ्रष्ट हो जायगा। ५८।

जो तू अहंकार को अवलम्बन करके ऐसा मानता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा तो यह तेरा निश्चय मिथ्या है; क्योंकि क्षत्रियपन का स्वभाव तेरे को जबरदस्ती युद्धमें लगा देगा। ५९ ।

हे अर्जुन ! जिस कर्म को तू मोह से नहीं करना चाहता है, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बँधा हुआ पर वश होकर करेगा। ६० ।

क्योंकि हे अर्जुन ! शरीर रूप यन्त्र में आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मो के अनुसार भ्रमाता हुआ
सब भूत प्राणियों के हृदयमें स्थित है। ६१ ।

इसलिये हे भारत ! सब प्रकार से उस परमेश्वरकी ही अनन्य शरण को* प्राप्त हो । उस परमात्मा की कृपासे ही परमशान्ति को और सनातन परमधाम को प्राप्त होगा। ६२ ।

इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तेरे लिये कहा इस रहस्य युक्त ज्ञान को सम्पूर्णता से अच्छी प्रकार विचार के फिर जैसे चाहता है वैसे ही कर अर्थात् जैसी तेरी इच्छा हो वैसे ही कर । ६३ ।

इतना कहने पर भी अर्जुन का कोई उत्तर नहीं मिलने के कारण श्रीकृष्णभगवान् फिर बोले कि हे अर्जुन ! सम्पूर्ण गोपनीयों से भी अति गोपनीय मेरे परम रहस्य युक्त वचन को तू फिर भी सुन; क्योंकि तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हित कारक वचन मैं तेरे लिये
कहूँगा । ६४।

Bhagwat Geeta 18 adhyay

हे अर्जुन ! तू केवल मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेव परमात्मा में ही अनन्य प्रेम से नित्य-निरन्तर अचल मनवाला हो और मुझ परमेश्वर को ही अतिशय श्रद्धा भक्ति सहित, निष्काम भाव से नाम, गुण और प्रभाव के श्रवण, कीर्तन, मनन और पठन-पाठन द्वारा निरन्तर भजने वाला हो तथा मेरा (शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म और किरीट, कुण्डल आदि भूषणों से युक्त, पीताम्बर, वनमाला और कौस्तुभ मणिधारी विष्णुका ) मन, वाणी और शरीर के द्वारा सर्वस्व अर्पण करके अतिशय श्रद्धा, भक्ति और प्रेम से विह्वलता पूर्वक पूजन करने वाला हो और मुझ सर्वशक्तिमान, विभूति, बल, ऐश्वर्य, माधुर्य, गम्भीरता, उदारता, वात्सल्य और सुहृदता आदि गुणों से सम्पन्न सबके आश्रय रूप वासुदेव को विनयभावपूर्वक भक्तिसहित साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम कर । ऐसा करने से तू मेरे को ही प्राप्त होगा, यह मैं तेरे लिये सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय सखा है। ६५ ।

इसलिये सर्व धर्मोको अर्थात् सम्पूर्ण कर्मो के आश्रय‌ को त्याग कर केवल एक मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेव परमात्मा की ही अनन्य शरण को* प्राप्त हो; मैं तेरे को सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा, तू शोक मत कर । ६६।

हे अर्जुन ! इस प्रकार तेरे हित के लिये कहे हुए इस गीता रूप परम रहस्य को किसी काल में भी न तो तपरहित मनुष्य के प्रति कहना चाहिये और न भक्ति रहित के प्रति तथा न बिना सुनने की इच्छा वाले के ही प्रति कहना चाहिये एवं जो मेरी निन्दा करता है, उसके प्रति भी नहीं कहना चाहिये, परंतु जिनमें यह सब दोष नहीं हों, ऐसे भक्तों के प्रति प्रेम पूर्वक, उत्साह के सहित कहना चाहिये। ६७।

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

क्योंकि जो पुरुष मेरे में परम प्रेम कर के इस परम रहस्ययुक्त गीता शास्त्र को मेरे भक्तोंमें कहेगा अर्थात् निष्काम भाव से प्रेम पूर्वक मेरे भक्तों को पढ़ावेगा या अर्थ की व्याख्या द्वारा इसका प्रचार करेगा, वह निःसन्देह मेरे को ही प्राप्त होगा। ६८।

और न तो उससे बढ़कर मेरा अतिशय प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई है और न उससे बढ़कर मेरा अत्यन्त प्यारा पृथ्वी में दूसरा कोई होवेगा। ६९। तथा हे अर्जुन ! जो पुरुष इस धर्म मय हम दोनों के संवादरूप गीताशास्त्र को पढ़ेगा अर्थात् नित्य पाठ करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञान यज्ञ से पूजित होऊँगा, ऐसा मेरा मत है। ७० ।

Bhagwat Geeta 17 adhyay, and mahatmy

जो पुरुष श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित हुआ इस गीता शास्त्र का श्रवण मात्र भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त हुआ उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होवेगा। ७१।

इस प्रकार गीता का माहात्म्य कहकर भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्दने अर्जुन से पूछा, हे पार्थ ! क्या यह मेरा वचन तैंने एकाग्रचित्त से श्रवण किया? और हे धनञ्जय ! क्या तेरा अज्ञानसे उत्पन्न हुआ मोह नष्ट हुआ ? । ७२ ।

इस प्रकार भगवान के पूछने पर अर्जुन बोले, हे अच्युत ! आप‌ की कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे स्मृति प्राप्त हुई है, इसलि ये मैं संशय रहित हुआ स्थित हूँ और आप की आज्ञा पालन करूँगा। ७३ ।

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

इसके उपरान्त सञ्जय बोले, हे राजन् ! इस प्रकार मैंने श्रीवासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत रहस्ययुक्त और रोमाञ्च कारक संवादको सुना । ७४ ।

कैसे कि श्रीव्यासजीकी कृपा से दिव्यदृष्टिद्वारा मैंने इस परम रहस्य युक्त गोपनीय योग को साक्षात् कहते हुए स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण भगवान से सुना है। ७५।

इसलिये हे राजन् ! श्रीकृष्णभगवान् और अर्जुन के इस रहस्ययुक्त, कल्याण‌ कारक और अद्भुत संवाद को पुनः-पुनः स्मरण करके मैं बारंबार हर्षित होता हूँ। ७६ ।

तथा हे राजन् ! श्रीहरि के * उस अति अद्भुत रूप को भी पुनः पुनः स्मरण करके मेरे चित्त में महान् आश्चर्य होता है और मैं बारंबार हर्षित होता हूँ। ७७ ।

हे राजन् ! विशेष क्या कहूँ, जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण भगवान हैं और जहाँ गाण्डीव धनुष धारी अर्जुन हैं, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है, ऐसा मेरा मत है। ७८ ।

इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “मोक्षसंन्यासयोग” नामक अठारहवाँ अध्याय ॥ १८ ॥

 

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Bhagwat Geeta 17 adhyay, and mahatmy https://mantramol.com/bhagwat-geeta-17-adhyay/ https://mantramol.com/bhagwat-geeta-17-adhyay/#respond Mon, 10 May 2021 14:35:35 +0000 https://mantramol.com/?p=2733 श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय का माहात्म्य || Bhagwat Geeta 17 adhyay साधकों आप सब के लिए प्रस्तुत है। “Bhagwat Geeta 17 adhyay”  श्रीमद्भगवद्गीता का 17 अध्याय व माहात्म्य हिन्दी व ...

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श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय का माहात्म्य || Bhagwat Geeta 17 adhyay

साधकों आप सब के लिए प्रस्तुत है। “Bhagwat Geeta 17 adhyay”  श्रीमद्भगवद्गीता का 17 अध्याय व माहात्म्य हिन्दी व संस्कृत मे।

श्रीमहादेव जी कहते हैं-पार्वती! सोलहवें अध्याय का माहात्म्य बतलाया गया। अब सत्रहवें अध्याय की अनन्त महिमा श्रवण करो। राजा खड्ग बाहु के पुत्र का दुःशासन नामक एक नौकर था। वह बड़ी खोटी बुद्धि का मनुष्य था। एक बार वह माण्डलीक राजकुमारों के साथ बहुत धन की बाजी लगा कर हाथी पर चढ़ा और कुछ ही कदम आगे जाने पर लोगों के मना करने पर भी वह मूढ़ हाथी के प्रति जोर-जोर से कठोर शब्द करने लगा। उसकी आवाज सुनकर हाथी क्रोध से अंधा हो गया और दुःशासन पैर फिसल जाने के कारण पृथ्वी पर गिर पड़ा। दुःशासन को गिरकर कुछ-कुछ उच्छ्वास लेते देख काल के समान निरंकुश हाथी ने क्रोध में भरकर उसे ऊपर फेंक दिया।

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

ऊपर से गिरते ही उसके प्राण निकल गये। इस प्रकार काल वश मृत्यु को प्राप्त होने के बाद उसे हाथी की योनि मिली और सिंहल द्वीप के महाराज के यहाँ उसने अपना बहुत समय व्यतीत किया। सिंहल द्वीप के राजा की महाराज खड्ग बाहु से बड़ी मैत्री थी, अतः उन्होंने जल के मार्ग से उस हाथी को मित्र की प्रसन्नता के लिये भेज दिया। एक दिन राजा ने श्लोक की समस्यापूर्ति से संतुष्ट होकर किसी कवि को पुरस्कार रूप में वह हाथी दे दिया और उन्होंने सौ स्वर्ण-मुद्राएँ लेकर उसे मालव नरेश के हाथ बेच दिया । कुछ काल व्यतीत होने पर वह हाथी यत्न- पूर्वक पालित होने पर भी असाध्य ज्वर से ग्रस्त होकर मरणासन्न हो गया।

Bhagwat Geeta 17 adhyay, and mahatmy

हाथी वानों ने जब उसे ऐसी शोचनीय-अवस्था में देखा तो राजा के पास जाकर हाथी के हित के लिये शीघ्र ही सारा हाल कह सुनाया। ‘महाराज ! आपका हाथी अस्वस्थ जान पड़ता है। उसका खाना, पीना और सोना सब छूट गया है। हमारी समझ में नहीं आता इसका क्या कारण है। हाथी वानों का बताया हुआ समाचार सुनकर राजा ने हाथी के रोग को पहचान ने वाले चिकित्सा कुशल मन्त्रियों के साथ उस स्थान पर पदार्पण किया, जहाँ हाथी ज्वरग्रस्त होकर पड़ा था।

राजा को देखते ही उसने ज्वरजनित वेदना को भूल कर संसार को आश्चर्य में डालने वाली वाणी में कहा-‘सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता, राजनीति के समुद्र, शत्रु-समुदाय को परास्त करने वाले तथा भगवान् विष्णु के चरणों में अनुराग रखने वाले महाराज ! इन औषधों से क्या लेना है ? वैद्यों से भी कुछ लाभ होने वाला नहीं है, दान और जप से भी क्या सिद्ध होगा ? आप कृपा करके गीता के सत्रहवें अध्याय का पाठ करने वाले किसी ब्राह्मण को बुलवाइ ये।’ हाथी के कथनानुसार राजा ने सब कुछ वैसा ही किया।

Bhagwat Geeta 17 adhyay, and mahatmy

तदनन्तर गीता-पाठ करने वाले ब्राह्मण ने जब उत्तम जल को अभिमन्त्रित करके उसके ऊपर डाला, तब दुःशासन गजयोनि का परित्याग करके मुक्त हो गया। राजा ने दुःशासन को दिव्य विमान पर आरूढ़ एवं इन्द्र के समान तेजस्वी देखकर पूछा-‘तुम्हारी पूर्व-जन्म में क्या जाति थी? क्या स्वरूप था ? कैसे आचरण थे? और किस कर्म से तुम यहाँ हाथी होकर आये थे? ये सारी बातें मुझे बताओ।’ राजा के इस प्रकार पूछने पर संकट से छूटे हुए दुःशासन ने विमान पर बैठे-ही-बैठे स्थिरता के साथ अपना पूर्वजन्म का उपर्युक्त समाचार यथावत् कह सुनाया। तत्पश्चात् नरश्रेष्ठ भालव नरेश भी गीता के सत्रहवें अध्याय का पाठ करने लगे। इससे थोड़े ही समय में उनकी मुक्ति हो गयी।

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

अथ सप्तदशोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः । १ ।

श्रीभगवानुवाच

त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा । सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु। २ ।
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत । श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः। ३ ।
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः । प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः। ४ ।
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः । दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः। ५ ।
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः । मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विङ्ख्यासुरनिश्चयान्। ६ ।
आहारस्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः । यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु। ७ ।
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः । रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः। ८ ।

श्रीभगवानुवाच


कट्वाललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः । आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः। ९ ।
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्। उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्। १०।
अफलाकाङ्गिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते । यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः । ११ ।
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् । इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्। १२ ।
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्। श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते। १३ ।
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजन शौचमार्जवम् । ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते । १४ ।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते । १५ ।

Bhagwat Geeta 17 adhyay


मन:प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते। १६।
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्रिविधं नरैः । अफलाकाङ्गिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते । १७ ।
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् । क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्। १८।
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः । परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्। १९ ।
दातव्यमिति यहानं दीयतेऽनुपकारिणे । देशे काले च पाने च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्। २० ।
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः । दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्। २१ ।
अदेशकाले यहानमपात्रेभ्यश्च दीयते । असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्। २२ ।


ॐतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः । ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा । २३ ।
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः । प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्। २४ ।
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः । दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाटिभिः । २५।
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते । प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते । २६ ।
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते । कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते। २७ ।
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् । असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह । २८ ।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७॥

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

सत्रहवाँ अध्याय

इस प्रकार भगवानके वचन सुनकर अर्जुन बोले, हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्रविधि को त्यागकर केवल श्रद्धा से युक्त हुए देवादिकों का पूजन करते हैं उनकी स्थिति फिर कौन-सी है? क्या सात्त्विकी है ? अथवा राजसी किंवा तामसी है ? । १।


इस प्रकार अर्जुन के पूछने पर श्रीकृष्णभगवान् बोले, अर्जुन ! मनुष्यों की वह बिना शास्त्रीय संस्कारों के केवल स्वभाव से उत्पन्न हुई श्रद्धा* सात्त्विकी और राजसी तथा तामसी ऐसे तीनों प्रकार की ही होती है, उसको तू मेरे से सुन । २ । हे


भारत ! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है तथा यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिये जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है अर्थात् जैसी जिसकी श्रद्धा है, वैसा ही उसका स्वरूप है। ३ ।


उनमें सात्त्विक पुरुष तो देवों को पूजते हैं और राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को पूजते हैं तथा अन्य जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं। ४ ।


हे अर्जुन ! जो मनुष्य शास्त्रविधि से रहित केवल मनःकल्पित घोर तप को तपते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त एवं कामना, आसक्ति और बलके अभिमान से भी युक्त हैं। ५ ।


तथा जो शरीररूप से स्थित भूतसमुदाय को अर्थात् शरीर, मन और इन्द्रियादिकों के रूप में परिणत हुए आकाशादि पाँच भूतों को और अन्तःकरण में स्थित मुझ अन्तर्यामी को भी कृश करने वाले हैं, उन अज्ञानियोंको तू आसुरी स्वभाव वाले जान । ६।

सत्रहवाँ अध्याय

हे अर्जुन ! जैसे श्रद्धा तीन प्रकार की होती है, वैसे ही भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस न्यारे-न्यारे भेदको तू मेरेसे सुन । ७।


आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले एवं रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले* तथा स्वभाव से ही मनको प्रिय ऐसे आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ तो सात्त्विक पुरुषको प्रिय होते हैं। ८ ।

कडुवे, खट्टे, लवणयुक्त और अति गरम तथा तीक्ष्ण, रूखे और दाहकारक एवं दुःख-चिन्ता और रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ राजस पुरुषको प्रिय होते हैं। ९ ।


तथा जो भोजन अधपका, रसरहित और दुर्गन्धयुक्त और उच्छिष है तथा जो अपवित्र भी है वह भोजन तापम पुरुषको प्रिय होता है। १०।

Bhagwat Geeta 17 adhyay


हे अर्जुन ! जो यज्ञ शास्त्रविधि से नियत किया हुआ है तथा करना ही कर्तव्य है ऐसे मन को समाधान करके फल को न चाहने वाले पुरुषों- द्वारा किया जाता है, वह यज्ञ तो सात्त्विक है। ११ ।


और हे अर्जुन ! जो यज्ञ केवल दम्भा चरण के ही लिये अथवा फल को भी उद्देश्य रखकर किया जाता है, उस यज्ञ को तू राजस जान । १२ ।


तथा शास्त्रविधि से हीन और अन्नदान से रहित एवं बिना मन्त्रों के, बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किये हुए यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं। १३ ।


साय हे अर्जुन ! देवता, ब्राह्मण, गुरु* और ज्ञानीजनों का पूजन एवं पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा, यह शरीर सम्बन्धी तप कहा जाता है। १४ ।

तथा जो उद्वेगको न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है* और जो वेदशास्त्रों के पढ़ने का एवं परमेश्वर के नाम जपने का अभ्यास है, वह निःसन्देह वाणीसम्बन्धी तप कहा जाता है। १५।

सत्रहवाँ अध्याय


तथा मन की प्रसन्नता और शान्तभाव एवं भगवत्-चिन्तन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण की पवित्रता ऐसे यह मनसम्बन्धी तप कहा जाता है। १६।

परंतु हे अर्जुन ! फल को न चाहने वाले निष्कामी योगी पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा से किये हुए उस पूर्वोक्त तीन प्रकार के तपको सात्त्विक कहते हैं। १७।


और जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिये अथवा केवल पाखण्ड से ही किया जाता है, वह अनिश्चित और क्षणिक फल वाला तप यहाँ राजस कहा गया है। १८ ।


जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से मन, वाणी और शरीर की पीड़ा के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिये किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है। १९ ।


और हे अर्जुन ! दान देना ही कर्तव्य है, ऐसे भाव से जो दान देश*, काल और पात्रको प्राप्त होने पर प्रत्युपकार न करने वाले के लिये दिया जाता है, वह दान तो सात्त्विक कहा गया है। २०।

Bhagwat Geeta 17 adhyay


और जो दान क्लेश पूर्वक तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से अर्थात् बदले में अपना सांसारिक कार्य सिद्ध करने की आशा से अथवा फल को उद्देश्य रख कर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है। २१ ।


और जो दान बिना सत्कार किये अथवा तिरस्कार पूर्वक, अयोग्य देश-काल में, कुपात्रों के लिये अर्थात् मद्य, मांसादि अभक्ष्य वस्तुओं के खाने वालों एवं चोरी, जारी आदि नीच कर्म करने वालों के लिये दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है। २२ ।

हे अर्जुन ! ॐ, तत्, सत्-ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानन्दघन ब्रह्म का नाम कहा है, उसीसे सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादिक रचे गये हैं। २३।

Bhagwat Geeta 15 adhyay, or mahatmy in hindi


इसलिये वेद को कथन करने वाले श्रेष्ठ पुरुषों की शास्त्रविधि से नियत की हुई यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा ‘ॐ’ ऐसे इस परमात्माके नामको उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं। २४ ।

तत् अर्थात् तत् नाम से कहे जाने वाले परमात्मा का ही यह सब है, ऐसे इस भाव से फल को न चाहकर, नाना प्रकार की यज्ञ, तपरूप क्रियाएँ तथा दानरूप क्रियाएँ कल्याण की इच्छा वाले पुरुषों द्वारा की जाती हैं। २५ ।

सत्रहवाँ अध्याय


सत् ऐसे यह परमात्मा का नाम सत्यभाव में और श्रेष्ठ- भाव में प्रयोग किया जाता है तथा हे पार्थ ! उत्तम कर्म में भी सत्-शब्द प्रयोग किया जाता है। २६।

तथा यज्ञ, तप और दान में जो स्थिति है, वह भी सत् है, ऐसे कही जाती है और उस परमात्मा के अर्थ किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत् है, ऐसे कहा जाता है। २७ ।

Bhagwat Geeta 16 adhyay, or mahatmy


हे अर्जुन ! बिना श्रद्धा के होमा हुआ हवन तथा दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ कर्म है, वह समस्त असत् ऐसे कहा जाता है, इसलिये वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न मरने के पीछे ही लाभदायक है, इसलिये मनुष्य को चाहिये कि सच्चिदानन्दघन परमात्मा के
नाम का निरन्तर चिन्तन करता हुआ निष्कामभाव से, केवल परमेश्वर के लिये, शास्त्रविधि से नियत किये कर्मों का परम श्रद्धा और उत्साहके सहित आचरण करे। २८ ।

इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवाद में “श्रद्धात्रयविभागयोग” नामक सत्रहवाँ अध्याय ॥ १७॥

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श्रीमद्भगवद्गीता का 16 अध्याय व माहात्म्य ।। Bhagwat Geeta 16 adhyay,

 

साधकों आप सब के लिए प्रस्तुत है। “Bhagwat Geeta 16 adhyay”  श्रीमद्भगवद्गीता का 16 अध्याय व माहात्म्य हिन्दी व संस्कृत मे।

 

श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय का माहात्म्य

श्रीमहादेवजी कहते हैं-पार्वती ! अब मैं गीता के सोलहवें अध्याय का
माहात्म्य बताऊँगा, सुनो । गुजरात में सौराष्ट्र नामक एक नगर है। वहाँ
खड्गबाहु नाम के राजा राज्य करते थे, जो दूसरे इन्द्र के समान प्रतापी
थे। उनके एक हाथी था, जो मद बहाया करता और सदा मद से उन्मत्त
रहता था। उस हाथी का नाम अरिमर्दन था। एक दिन रात में वह हठात्
साँकलों और लोहे के खम्भों को तोड़-फोड़कर बाहर निकला। हाथीवान्
उसके दोनों ओर अङ्कुश लेकर डरा रहे थे। किंतु क्रोधवश उन सबकी
अवहेलना करके उसने अपने रहने के स्थान-हथिसार को ढहा दिया।
उसपर चारों ओर से भालों की मार पड़ रही थी; फिर भी हाथीवान् ही डरे
हुए थे, हाथी को तनिक भी भय नहीं होता था। इस कौतूहलपूर्ण घटना
को सुनकर राजा स्वयं हाथी को मनाने की कला में निपुण

राजकुमारों के साथ वहाँ आये। आकर उन्होंने उस बलवान् दैतैले
हाथी को देखा । नगर के निवासी अन्य काम-धंधों की चिन्ता छोड़ अपने
बालकों को भयसे बचाते हुए बहुत दूर खड़े होकर उस महाभयंकर
गजराज को देखते रहे। इसी समय कोई ब्राह्मण तालाब से नहाकर उसी
मार्ग से लौटे। वे गीताके सोलहवें अध्याय के ‘अभयम्’ आदि कुछ
श्लोकों का जप कर रहे थे। पुरवासियों और पीलवानों (महावतों) ने
उन्हें बहुत मना किया, किंतु उन्होंने किसी की न मानी । उन्हें हाथी से भय
नहीं था, इसीलिये वे विचलित नहीं हुए। उधर हाथी अपने फूत्कारसे
चारों दिशाओं को व्याप्त करता हुआ लोगों को कुचल रहा था। वे ब्राह्मण
उसके बहते हुए मद को हाथ से छूकर कुशलपूर्वक (निर्भयता)से निकल
गये । इससे वहाँ राजा तथा देखने वाले पुरवासियों के मन में इतना विस्मय
हुआ कि उसका वर्णन नहीं हो सकता। राजा के कमल नेत्र चकित हो उठे

Bhagwat Geeta 16 adhyay, or mahatmy

थे। उन्होंने ब्राह्मण को बुला सवारी से उतर कर उन्हें प्रणाम किया और
पूछा-‘ब्रह्मन् ! आज आपने यह महान् अलौकिक कार्य किया है;
क्योंकि इस काल के समान भयंकर गजराज के सामने से आप सकुशल
लौट आये हैं। प्रभो! आप किस देवता का पूजन तथा किस मन्त्र का
जप करते हैं ? बताइये, आपने कौन-सी सिद्धि प्राप्त की है ?
ब्राह्मण ने कहा-राजन् ! मैं प्रतिदिन गीता के सोलहवें अध्याय के कुछ
श्लोकों का जप किया करता हूँ, इसी से ये सारी सिद्धियाँ प्राप्त हुई हैं।
श्रीमहादेवजी कहते हैं तब हाथी का कौतूहल देखने की इच्छा छोड़कर
राजा ब्राह्मण देवता को साथ ले अपने महल में आये। वहाँ शुभ मुहूर्त
देखकर एक लाख स्वर्णमुद्राओं की दक्षिणा दे उन्होंने ब्राह्मण को संतुष्ट
किया और उनसे गीता-मन्त्र की दीक्षा ली। गीता के सोलहवें अध्याय के
‘अभयम्’ आदि कुछ श्लोकों का अभ्यास कर लेने के बाद उनके मन में

सुख- हाथी को छोड़कर उसके कौतुक देखने की इच्छा जाग्रत् हुई। फिर तो
दिन सैनिकों के साथ बाहर निकलकर राजाने हाथी वानों से उसी मत्त
गजराज का बन्धन खुलवाया। वे निर्भय हो गये। राज्य के
विलास के प्रति आदर का भाव नहीं रहा। वे अपना जीवन तृणवत्
समझकर हाथी के सामने चले गये। साहसी मनुष्यों में अग्रगण्य राजा
खड्गबाहु मन्त्र पर विश्वास करके हाथी के समीप गये और मदकी
अनवरत धारा बहते हुए उसके गण्डस्थल को हाथ से छूकर सकुशल लौट
आये । काल के मुख से धार्मिक और खलके मुख से साधु पुरुष की भाँति
राजा उस गजराज के मुख से बचकर निकल आये। नगर में आने पर
उन्होंने अपने राजकुमार को राज्यपर अभिषिक्त कर दिया तथा स्वयं
गीताके सोलहवें अध्याय का पाठ करके परमगति प्राप्त की।

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

अथ षोडशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः । दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्। १ ।
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् । दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्। २ ।
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता । भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत। ३ ।
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च । अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्। ४ ।
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता । मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव। ५ ।
द्वौ भूतसौँ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च । दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु। ६ ।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः । न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते। ७ ।
असत्यमप्रतिष्ठं तेजगदाहुरनीश्वरम्। अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्। ८।
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः । प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः। ९ ।
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः । मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः । १० ।
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः । कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः । ११ ।
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः । ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्। १२ ।

श्रीभगवानुवाच

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् । इदमस्तीदमपि मे  भविष्यति पुनर्धनम् ॥१३॥
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि । ईश्वरोऽहमहं भोगी  सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥१४॥
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।  यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥१५॥
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः । प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥१६॥
आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः । यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥१७॥
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः । मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥१८॥
तानहं द्विषतः क्रुरान्- संसारेषु नराधमान् । क्षिपाम्यजस्रमशुभाना-सुरीष्वेव योनिषु ॥१९॥
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि । मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥२०॥

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्-तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥२१॥
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः। आचरत्यात्मनः श्रेयस्-ततो याति परां गतिम्॥२२॥
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥२३॥
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ||२४॥

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
दैवासुरसंपद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः ॥१६॥

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

सोलहवाँ अध्याय

उसके उपरान्त श्रीकृष्ण भगवान् फिर बोले, हे अर्जुन ! दैवी सम्पदा जिन पुरुषों को प्राप्त है तथा जिनको आसुरी सम्पदा प्राप्त है, उनके लक्षण
पृथक्-पृथक कहता हूँ, उनमें से सर्वथा भय का अभाव, अन्तःकरण की अच्छी प्रकार से स्वच्छता, तत्त्वज्ञान के लिये ध्यानयोग में निरन्तर दृढ़
स्थिति और सात्त्विक दान तथा इन्द्रियों का दमन, भगवत्पूजा और अग्निहोत्रादि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेद-शास्त्रों के पठन-पाठन पूर्वक
भगवान के नाम और गुणों का कीर्तन तथा स्वधर्म-पालन के लिये कष्ट सहन करना एवं शरीर और इन्द्रियों के सहित अन्तःकरण की सरलता। १।

तथा मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना तथा यथार्थ और प्रिय भाषण*, अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध का न होना, कर्मो में कर्तापन के अभिमान का त्याग एवं अन्तःकरण की उपरामता अर्थात् चित्तकी चञ्चलता का अभाव और किसी की भी निन्दादि न करना तथा सब भूत-प्राणियों में हेतु रहित दया; इन्द्रियों‌ का विषयों के साथ संयोग होने पर भी आसक्ति का न होना और कोमलता तथा लोक और शास्त्र से विरुद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव। २ ।

तथा तेजा, क्षमा, धैर्य और बाहर-भीतर की शुद्धि* एवं किसी में भी शत्रुभाव का न होना और अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव, यह सब तो हे अर्जुन ! दैवी सम्पदा को प्राप्त हुए पुरुष के लक्षण हैं। ३।

हे पार्थ ! पाखण्ड, घमण्ड और अभिमान तथा क्रोध और कठोर वाणी एवं अज्ञान भी, यह सब आसुरी सम्पदा को प्राप्त हुए पुरुष के लक्षण हैं। ४ ।

Bhagwat Geeta 16 adhyay

उन दोनों प्रकार की सम्पदाओं में दैवी सम्पदा तो मुक्ति के लिये और आसुरी सम्पदा बाँधने के लिये मानी गयी है, इसलिये हे अर्जुन ! तू शोक मत कर; क्योंकि तू दैवी सम्पदा को प्राप्त हुआ है। ५ ।

हे अर्जुन ! इस लोक में भूतों के स्वभाव दो प्रकार के माने गये हैं। एक तो देवों के जैसा और दूसरा असुरों के जैसा, उनमें देवों का स्वभाव
ही विस्तारपूर्वक कहा गया है, इसलिये अब असुरों के स्वभाव को भी विस्तारपूर्वक मेरे से सुन । ६ ।

हे अर्जुन ! आसुरी स्वभाव वाले मनुष्य कर्तव्यकार्य में प्रवृत्त होने को और अकर्तव्यकार्य से निवृत्त होने को भी नहीं जानते हैं, इसलिये उनमें न तो बाहर-भीतर की शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण और न सत्यभाषण ही है। ७ ।

Bhagwat Geeta 13 adhyay, or mahatmy

वे आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य कहते हैं कि जगत् आश्रयरहित और सर्वथा झूठा एवं बिना ईश्वर के अपने-आप स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुआ है; इसलिये केवल भोगों को भोगने के लिये ही है, इसके सिवा और क्या है। ८।

इस प्रकार इस मिथ्या ज्ञान को अवलम्बन करके नष्ट हो गया है स्वभाव जिनका तथा मन्द है बुद्धि जिनकी, ऐसे वे सबका अपकार करने वाले क्रूरकर्मी मनुष्य केवल जगत्का नाश करने के लिये ही उत्पन्न होते हैं। ९ ।

वे मनुष्य दम्भ, मान और मद से युक्त हुए किसी प्रकार भी न पूर्ण होने वाली कामनाओं का आसरा लेकर तथा अज्ञान से मिथ्या सिद्धान्तों को ग्रहण करके भ्रष्ट आचरणों से युक्त हुए संसार में बर्तते हैं। १०।

Bhagwat Geeta 16 adhyay

वे मरणपर्यन्त रहने वाली अनन्त चिन्ताओं को आश्रय किये और विषयभोगों के भोगने में तत्पर हुए एवं इतनामात्र ही आनन्द है, ऐसे मानने वाले हैं। ११ ।

इसलिये आशा रूप सैकड़ों फाँसियों से बँधे हुए और काम-क्रोध के परायण हुए विषय-भोगों की पूर्ति के लिये अन्यायपूर्वक धनादिक बहुत-से पदार्थों को संग्रह करनेकी चेष्टा करते हैं। १२ ।

उन पुरुषों के विचार इस प्रकार के होते हैं कि मैंने आज यह तो पाया है और इस मनोरथ को प्राप्त होऊँगा तथा मेरे पास यह इतना धन है और फिर भी यह होवेगा। १३ ।

Bhagwat Geeta 14 adhyay, or mahatmy || हिन्दी व संस्कृत सहित

वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और दूसरे शत्रुओं को भी मैं मारूँगा तथा मैं ईश्वर और ऐश्वर्यको भोगने वाला हूँ और मैं सब सिद्धियों से युक्त एवं बलवान् और सुखी हूँ। १४ ।

मैं बड़ा धनवान् और बड़े कुटुम्ब वाला हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है, मैं यज्ञ करूँगा, दान दूंगा, हर्षको प्राप्त होऊँगा, इस प्रकार के अज्ञान से मोहित हैं। १५ ।

इसलिये वे अनेक प्रकार से भ्रमित हुए चित्त वाले अज्ञानीजन मोहरूप जाल में फँसे हुए एवं विषयभोगों में अत्यन्त आसक्त हुए महान् अपवित्र नरक में गिरते हैं। १६ ।

वे अपने-आपको ही श्रेष्ठ मानने वाले घमण्डी पुरुष धन और मानके मद से युक्त हुए, शास्त्रविधि से रहित केवल नाममात्र के यज्ञोंद्वारा पाखण्ड से यजन करते हैं । १७ ।

Bhagwat Geeta 16 adhyay

वे अहंकार, बल, घमण्ड, कामना और क्रोधादि के परायण हुए एवं दूसरों की निन्दा करने वाले पुरुष अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ अन्तर्यामी से द्वेष करने वाले हैं। १८ ।

ऐसे उन द्वेष करने वाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बारंबार आसुरी योनियों में ही गिराता हूँ अर्थात् शूकर, कूकर आदि नीच योनियों में ही उत्पन्न करता हूँ। १९ ।

इसलिये हे अर्जुन ! वे मूढ पुरुष जन्म-जन्म में आसुरीयोनि को प्राप्त हुए मेरे को न प्राप्त होकर उससे भी अति नीच गतिको ही प्राप्त होते हैं अर्थात् घोर नरकों में पड़ते हैं। २० ।

हे अर्जुन ! काम, क्रोध तथा लोभ यह तीन प्रकारके नरक के द्वार* आत्माका नाश करने वाले हैं अर्थात् अधोगति में ले जाने वाले हैं, इससे इन
तीनों को त्याग देना चाहिये । २१ ।

क्योंकि हे अर्जुन ! इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त हुआ अर्थात् काम, क्रोध और लोभादि विकारों से छूटा हुआ पुरुष अपने कल्याण का आचरण करता है । इससे वह परम गतिको जाता है अर्थात् मेरे को प्राप्त होता है। २२ ।

जो पुरुष शास्त्र की विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से बर्तता है, वह न तो सिद्धि को प्राप्त होता है और न परमगति को तथा न सुख को ही प्राप्त होता है। २३ ।

इससे तेरे लिये इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है, ऐसा जानकर तू शास्त्रविधि से नियत किये हुए कर्मको ही करने के लिये योग्य है । २४ ।

इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें “दैवासुरसम्पद्विभागयोग” नामक सोलहवाँ अध्याय ।। १६॥

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Bhagwat Geeta 15 adhyay, or mahatmy in hindi https://mantramol.com/bhagwat-geeta-15-adhyay-or-mahatmy/ https://mantramol.com/bhagwat-geeta-15-adhyay-or-mahatmy/#respond Fri, 08 Jan 2021 15:01:52 +0000 https://mantramol.com/?p=2529 श्रीमद्भगवद्गीता 15 अध्याय व माहात्म्य ।। Bhagwat Geeta 15 adhyay   साधकों आप के लिए प्रस्तुत “Bhagwat Geeta 15 adhyay” श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 15 व माहात्म्य हिन्दी व संस्कृत सहित   ...

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श्रीमद्भगवद्गीता 15 अध्याय व माहात्म्य ।। Bhagwat Geeta 15 adhyay

 

साधकों आप के लिए प्रस्तुत “Bhagwat Geeta 15 adhyay” श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 15 व माहात्म्य हिन्दी व संस्कृत सहित

 

श्रीमद्भगवद्गीताके पंद्रहवें अध्यायका माहात्म्य

श्रीमहादेवजी कहते हैं पार्वती ! अब गीता के पंद्रहवें अध्याय का माहात्म्य सुनो। गौड़देश में कृपाण-नरसिंह नामक एक राजा थे, जिनकी तलवार की धार से युद्ध में देवता भी परास्त हो जाते थे। उनका बुद्धिमान् सेनापति शस्त्र और शास्त्र की कलाओं का भण्डार था। उसका नाम था सरभ मेरुण्ड। उसकी भुजाओं में प्रचण्ड बल था। एक समय उस पापी ने राजकुमारों सहित महाराज का वध करके स्वयं ही राज्य करने का विचार किया। इस निश्चय के कुछ ही दिनों बाद वह हैजे का शिकार होकर मर गया। थोड़े समय में वह पापात्मा अपने पूर्वकर्म के कारण सिन्धुदेश में एक तेजस्वी घोड़ा हुआ। उसका पेट सटा हुआ था। घोड़े के लक्षणों का ठीक-ठीक ज्ञान रखने वाले किसी वैश्य के पुत्र ने बहुत-सा मूल्य देकर उस अश्वको खरीद लिया और यत्न के साथ उसे राजधानीतक वह ले आया ।

वैश्य कुमार वह अश्व राजा को देने को लाया था । यद्यपि राजा उस वैश्यकुमार से परिचित थे, तथापि द्वारपाल ने जाकर उसके आगमन की
सूचना दी। राजाने पूछा- ‘किस लिये आये हो?’ तब उसने स्पष्ट शब्दों में उत्तर दिया-‘देव ! सिन्धुदेश में एक उत्तम लक्षणों से सम्पन्न अश्व था, जिसे तीनों लोकों का एक रत्न समझ कर मैंने बहुत-सा मूल्य देकर खरीद लिया है।’ राजा ने आज्ञा दी-‘उस अश्वको यहाँ ले आओ।’ वास्तव में वह घोड़ा गुणों में उच्चैःश्रवा के समान था । सुन्दर रूप का तो मानो घर ही था। शुभ लक्षणों का समुद्र जान पड़ता था। वैश्य घोड़ा ले आया और राजाने उसे देखा। अश्व का लक्षण जानने वाले अमात्यों ने इसकी बड़ी प्रशंसा की। सुनकर राजा अपार आनन्द में निमग्न हो गये और उन्होंने वैश्य को मुँह माँगा सुवर्ण देकर तुरंत ही उस अश्व को खरीद लिया।

Bhagwat Geeta 15 adhyay mahatmy

कुछ दिनों के बाद एक समय राजा शिकार खेलने के लिये उत्सुक हो उसी घोड़े पर चढ़कर वन में गये । वहाँ मृगों के पीछे इन्होंने अपना घोड़ा बढ़ाया। पीछे-पीछे सब ओरसे दौड़कर आते हुए समस्त सैनिकों का‌ साथ छूट गया। वे हिरनों द्वारा आकृष्ट होकर बहुत दूर निकल गये।
प्यास‌ ने उन्हें व्याकुल कर दिया। तब वे घोड़े से उतर कर जल की खोज करने लगे। घोड़े को तो उन्होंने वृक्ष की डाली में बाँध दिया और स्वयं एक चट्टान पर चढ़ने लगे। कुछ दूर जाने पर उन्होंने देखा कि एक पत्ते का‌ टुकड़ा हवा से उड़कर शिलाखण्ड पर गिरा है। उसमें गीताके पंद्रहवें अध्याय का आधा श्लोक लिखा हुआ था। राजा उसे बाँचने लगे। उनके मुख से गीता के अक्षर सुनकर घोड़ा तुरंत गिर पड़ा और अश्व-शरीर को छोड़कर तुरंत ही दिव्य विमानपर बैठकर वह स्वर्गलोक को चला गया।

तत्पश्चात् राजा‌ ने पहाड़ पर चढ़कर एक उत्तम आश्रम देखा, जहाँ नागकेशर, केले, आम और नारियल के वृक्ष लहरा रहे थे। आश्रम के भीतर एक ब्राह्मण बैठे हुए थे, जो संसार की वासनाओं से मुक्त थे। राजा ने उन्हें प्रणाम करके बड़ी भक्ति के साथ पूछा-‘ब्रह्मन् ! मेरा अश्व जो अभी-अभी स्वर्ग को चला गया है, उसमें क्या कारण है ?’ राजा की बात सुनकर त्रिकालदर्शी, मन्त्रवेत्ता एवं महापुरुषों में श्रेष्ठ विष्णु शर्मा नामक ब्राह्मण ने कहा-‘राजन् ! पूर्वकाल में तुम्हारे यहाँ जो ‘सरभमेरुण्ड’ नामक सेनापति था, वह तुम्हें पुत्रों सहित मार कर स्वयं राज्य हड़प लेने को तैयार था। इसी बीचमें हैजे का शिकार होकर वह मृत्यु को प्राप्त हो गया। उसके बाद वह उसी पाप से घोड़ा हुआ था।

Bhagwat Geeta 15 adhyay mahatmy

यहाँ कहीं गीता के पंद्रहवें अध्याय का आधा श्लोक लिखा मिल गया था, उसे ही तुम बाँचने लगे। उसी को तुम्हारे मुख से सुनकर वह अश्व स्वर्ग को प्राप्त हुआ है। तदनन्तर राजा के पार्श्ववर्ती सैनिक उन्हें ढूँढ़ते हुए वहाँ आ पहुँचे। उन सबके साथ ब्राह्मण को प्रणाम करके राजा प्रसन्नता पूर्वक वहाँ से चले और गीता के पंद्रहवें अध्याय के श्लोकाक्षरों से अङ्कित उसी पत्र को बाँच-बाँचकर प्रसन्न होने लगे। उनके नेत्र हर्ष से खिल उठे थे। घर आकर उन्होंने मन्त्रवेत्ता मन्त्रियों के साथ अपने पुत्र सिंहबल को राज्यसिंहासन पर अभिषिक्त किया और स्वयं पंद्रहवें अध्याय के जपसे विशुद्धचित्त होकर मोक्ष प्राप्त कर लिया।

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

अथ पञ्चदशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्। १।
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः। अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके । २।
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा । अश्वस्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा । ३।
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः। तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी। ४।
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः। द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसर्गिच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्।५।
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम । ६।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति । ७।

श्रीभगवानुवाच

शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्। ८।
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च। अधिष्ठाय मनश्चार्य विषयानुपसेवते । ९॥
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्। विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः । १०।
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् । यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः । ११ ।
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्। १२ ।
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः। १३ ।
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् । १४ ।

श्रीभगवानुवाच

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च। वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्। १५ ।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते । १६ ।
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः । १७ ।
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः । १८।
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्धजति मां सर्वभावेन भारत । १९ ।
इति गुह्यतम शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ । एतदबुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत । २० ।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५॥

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

पंद्रहवाँ अध्याय

उसके उपरान्त श्रीकृष्णभगवान् फिर बोले कि हे अर्जुन ! आदि पुरुष परमेश्वर रूप मूल वाले और ब्रह्मारूप मुख्य शाखा वाले जिस संसार रूप पीपल के वृक्ष को अविनाशी कहते हैं तथा जिसके वेद पत्ते कहे गये हैं; उस संसार रूप वृक्षको जो पुरुष मूलसहि तत्त्व से जानता है, वह वेदके तात्पर्य को जाननेवाला है । १ ।

हे अर्जुन ! उस संसार-वृक्ष की तीनों गुणरूप जल के द्वारा बढ़ी हुई एवं विषय- भोग रूप कोंपलों वाली देव, मनुष्य और तिर्यक् आदि योनि रूप शाखाएँ। नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं तथा मनुष्ययोनि में 8 कर्मोक अनुसार बाँधने वाली अहंता, ममता और वासना रूप जड़ें भी नीचे और ऊपर सभी लोकों में व्याप्त हो रही हैं। २ ।

परंतु इस संसार वृक्ष का स्वरूप जैसा कहा है, वैसा यहाँ विचारकाल में नहीं पाया जाता है; क्योंकि न तो इसका आदि है। और न अन्त है तथा न अच्छी प्रकार से स्थिति ही है; इसलिये इस अहंता, ममता और वासना रूप अति दृढ़ मूलों वाले संसार रूप पीपल के वृक्ष को दृढ़ वैराग्य रूप शस्त्र-द्वारा काट कर । ३ ।

उसके उपरान्त उस परमपद रूप परमेश्वरको अच्छी प्रकार खोजना चाहिये। कि जिस में गये हुए पुरुष फिर पीछे संसार में नहीं आते हैं और जिस परमेश्वरसे यह पुरातन संसार-वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है, उस ही आदि पुरुष नारायण के मैं शरण हूँ, इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके। ४।

नष्ट हो गया है मान और मोह जिन का तथा जीत लिया है आसक्ति रूप दोष जिन ने और परमात्मा के स्वरूप में है निरन्तर स्थिति जिनकी तथा अच्छी प्रकार से नष्ट हो गयी है कामना जिनकी, ऐसे वे सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से ज्ञानी जन, उस अविनाशी परमपद को प्राप्त होते हैं। ५ ।

Bhagwat Geeta 15 adhyay

उस स्वयं प्रकाशमय परमपद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकता है तथा जिस परमपद को प्राप्त होकर मनुष्य पीछे संसार में नहीं आते हैं, वही मेरा विमुक्त हुए परमधाम है * ।। हे अर्जुन ! इस देह में यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है और वही इन त्रिगुण मयी माया में स्थित हुई मनसहित पाँचों इन्द्रियों को आकर्षण करता है। ७।

कैसे कि वायु गन्ध‌ के स्थान से गन्ध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादि कों का स्वामी जीवात्मा भी जिस पहले शरीर को त्यागता है, उससे इन मनसहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है, उसमें जाता है। ८ ।

उस शरीर में स्थित हुआ यह जीवात्मा श्रोत्र, चक्षु और त्वचा को तथा रसना, घ्राण और मन को आश्रय करके अर्थात् इन सबके सहारे से ही विषयों को सेवन करता है। ९ ।

परंतु शरीर छोड़कर जाते हुए को अथवा शरीर में स्थित हुए को और विषयों को भोगते हुएको अथवा तीनों गुणों से युक्त हुए को भी अज्ञानी जन नहीं जानते हैं, केवल ज्ञान रूप नेत्रों वाले ज्ञानी जन ही तत्त्व से जानते हैं। १० ।

क्योंकि योगीजन भी अपने हृदय में स्थित हुए इस आत्मा को यत्न करते हुए ही तत्त्व से जानते हैं और जिन्होंने अपने अन्तःकरण को शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अज्ञानी जन तो यत्न करते भी इस आत्माको नहीं जानते हैं। ११ ।

Bhagwat Geeta 15 adhyay

हे अर्जुन ! जो तेज सूर्य में स्थित हुआ सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में स्थित है और जो तेज अग्नि में स्थित है उसको तू मेरा ही तेज जान । १२ ।

और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूँ और रसस्व रूप अर्थात् अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण ओषधियों को अर्थात् वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ। १३ ।

तथा मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित हुआ वैश्वानर अग्नि रूप होकर प्राण और अपान से युक्त हुआ चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ। १४ ।

और मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामीरूप से स्थित हूँ तथा मेरे से ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन में होता है और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने के योग्य हूँ तथा वेदान्त का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ। १५।

हे अर्जुन ! इस संसार में नाशवान् और अविनाशी भी यह दो प्रकार के पुरुष हैं। उनमें सम्पूर्ण भूतप्राणियों के शरीर तो नाशवान् और जीवात्मा अविनाशी कहा जाता है। १६ ।

Bhagwat Geeta 15 adhyay

तथा उन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है कि जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सब का धारण-पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर और परमात्मा ऐसे कहा गया है। १७ ।

क्योंकि मैं नाशवान्, जडवर्ग क्षेत्र से तो सर्वथा अतीत और माया में स्थित अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूँ, इसलिये लोक में और वेद में भी पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ। १८ ।

Bhagwat Geeta 13 adhyay, or mahatmy

हे भारत ! इस प्रकार तत्त्व से जो ज्ञानी पुरुष मेरे को पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार से निरन्तर मुझ वासुदेव परमेश्वर को ही भजता है। १९ ।

हे निष्पाप अर्जुन ! ऐसे यह अति रहस्य युक्त गोपनीय शास्त्र मेरेद्वारा कहा गया, इसको तत्त्व से जानकर मनुष्य ज्ञानवान् और कृतार्थ हो जाता है अर्थात् उसको और कुछ भी करना शेष नहीं रहता। २० ।

इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “पुरुषोत्तमयोग” नामक पंद्रहवाँ अध्याय ।। १५ ।।

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Bhagwat Geeta 14 adhyay, or mahatmy || हिन्दी व संस्कृत सहित https://mantramol.com/bhagwat-geeta-14-adhyay-or-mahatmy/ https://mantramol.com/bhagwat-geeta-14-adhyay-or-mahatmy/#respond Wed, 06 Jan 2021 13:06:13 +0000 https://mantramol.com/?p=2516 श्रीमद्भगवद्गीता का 14 अध्याय व माहात्म्य ।। Bhagwat Geeta 14 adhyay   साधकों आप सब के लिए प्रस्तुत “Bhagwat Geeta 14 adhyay” श्रीमद्भगवद्गीता चौदहवां अध्याय व माहात्म्य हिन्दी व संस्कृत ...

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श्रीमद्भगवद्गीता का 14 अध्याय व माहात्म्य ।। Bhagwat Geeta 14 adhyay

 

साधकों आप सब के लिए प्रस्तुत “Bhagwat Geeta 14 adhyay” श्रीमद्भगवद्गीता चौदहवां अध्याय व माहात्म्य हिन्दी व संस्कृत मे।

 

श्रीमद्भगवद्गीताके चौदहवें अध्यायका माहात्म्य

श्रीमहादेवजी कहते हैं पार्वती! अब मैं भव-बन्धन से छुटकारा पाने के साधन भूत चौदह वें अध्याय का माहात्म्य बतलाता हूँ, तुम ध्यान देकर सुनो। सिंहलद्वीप में विक्रम बेताल नामक एक राजा थे, जो सिंह के समान पराक्रमी और कलाओं के भण्डार थे। एक दिन वे शिकार खेलने के लिये उत्सुक होकर राजकुमारों सहित दो कुतियों को साथ लिये वन में गये। वहाँ पहुँचने पर उन्होंने तीव्र गति से भागते हुए खरगोश के पीछे अपनी कुतिया छोड़ दी। उस समय सब प्राणियों के देखते-देखते खरगोश इस प्रकार भागने लगा मानो कहीं उड़ गया हो । दौड़ते-दौड़ते बहुत थक जाने के कारण वह एक बड़ी खंदक (गहरे गड़े) में गिर पड़ा। गिरने पर भी वह कुतिया के हाथ नहीं आया और उस स्थानपर जा
पहुँचा, जहाँ का वातावरण बहुत ही शान्त था।

वहाँ हरिन निर्भय होकर सब ओर वृक्षों की छाया में बैठे रहते थे। बंदर भी अपने-आप टूटकर गिरे नारियल के फलों और पके हुए आमों से पूर्ण तृप्त रहते थे। वहाँ सिंह हाथी के बच्चों के साथ खेलते और साँप निडर होकर मोर की पाँखों में घुस जाते थे। उस स्थान पर एक आश्रम के भीतर वत्स नामक मुनि रहते थे, जो जितेन्द्रिय एवं शान्त-भाव से निरन्तर गीता के चौदहवें अध्याय का पाठ किया करते थे। आश्रम के पास ही वत्समुनि के किसी शिष्य ने अपना पैर धोया था, (ये भी चौदहवें अध्याय का पाठ करने वाले थे।) उसके जल से वहाँ की मिट्टी गीली हो गयी थी। खरगोश का जीवन कुछ शेष था। वह हाँफता हुआ आकर उसी कीचड़ में गिर पड़ा। उसके स्पर्श मात्र से ही खरगोश दिव्य विमानप र बैठकर स्वर्गलोक को चला गया।

Bhagwat Geeta 14 adhyay, or mahatmy

फिर कुतिया भी उसका पीछा करती हुई आयी। वहाँ उसके शरीर में  भी कुछ कीचड़ के छींटे लग गये। फिर भूख-प्यास की पीड़ा से रहित हो कुतिया का रूप त्यागकर उसने दिव्याङ्गना का रमणीय रूप धारण कर लिया तथा गन्धर्वो से सुशोभित दिव्य विमान पर आरूढ़ हो वह भी स्वर्गलोक को चली गयी। यह देख मुनि के मेधावी शिष्य स्वकन्धर हँसने लगे। उन दोनों के पूर्वजन्म के वैर का कारण सोचकर उन्हें बड़ा विस्मय हुआ था। उस समय राजा के नेत्र भी आश्चर्य से चकित हो उठे। उन्होंने बड़ी भक्ति के साथ प्रणाम करके पूछा-‘विप्रवर ! नीच योनि में पड़े हुए दोनों प्राणी-कुतिया और खरगोश ज्ञानहीन होते हुए भी जो स्वर्ग में चले गये-इसका क्या कारण है ? इसकी कथा सुनाइये।’ शिष्यने कहा—भूपाल ! इस वन में वत्स नामक ब्राह्मण रहते हैं।

वे बड़े जितेन्द्रिय महात्मा हैं; गीता के चौदहवें अध्याय का सदा जप किया करते हैं। मैं उन्हींका शिष्य हूँ, मैंने भी ब्रह्मविद्या में विशेषज्ञता प्राप्त की । गुरुजी की ही भाँति मैं भी चौदहवें अध्याय का प्रतिदिन जप करता हूँ। मेरे पैर धोने के जल में लोटने के कारण यह खरगोश कुतियाके  साथ ही स्वर्ग लोक को प्राप्त हुआ है। अब मैं अपने हँसने का कारण बताता हूँ। महाराष्ट्र में प्रत्युदक नामक महान् नगर है, वहाँ केशव नाम का एक ब्राह्मण रहता था, जो कपटी मनुष्यों में अग्रगण्य था। उसकी स्त्री का नाम विलोभना था। वह स्वच्छन्द विहार करने वाली थी। इस से क्रोध में आकर जन्मभर के वैर को याद करके ब्राह्मण ने अपनी स्त्री का वध कर डाला और उसी पाप से उसको खरगोश की योनि में जन्म मिला। ब्राह्मणी भी अपने पाप के कारण कुतिया हुई।

श्रीमहादेवजी कहते हैं—यह सारी कथा सुनकर श्रद्धालु राजा ने गीता के चौदहवें अध्याय का पाठ आरम्भ कर दिया। इससे उन्हें परमगति की प्राप्ति हुई।

ॐ श्रीपरमात्मने नमः जा

अथ चतुर्दशोऽध्या

श्रीभगवानुवाच

यःपरं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः । १ ।

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च। २ ।
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भ दधाम्यहम् । सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत । ३ ।
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता। ४ ।
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्। ५ ।
सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ। ६ ।
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् । तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्। ७ ।

श्रीभगवानुवाच

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् । प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत। ८ ।
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत । ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत। ९ ।
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत । रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा। १०।
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते । ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत।११।
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ । १२ ।
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन । १३ ।
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् । तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते । १४ ।

श्रीभगवानुवाच

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते । तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते। १५।
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्। रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् । १६ ।
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च । १७ ।
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः । १८।
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्धावं सोऽधिगच्छति । १९।
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्रुते ।२०।

अर्जुन उवाच

कैर्लिङ्गैस्त्रीनगुणानेतानतीतो भवति प्रभो। किमाचारः कथं चैतांस्त्रीनगुणानतिवर्तते। २१ ।

श्रीभगवानुवाच

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति । २२ ।
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते । गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते । २३ ।
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः । २४ ।
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते । २५ ।
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते । २६ ।
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च । २७ ।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

चौदहवाँ अध्याय

उसके उपरान्त श्रीकृष्णभगवान् बोले, हे अर्जुन ! ज्ञानों में भी अति उत्तम परम ज्ञान को मैं फिर भी तेरे लिये कहूँगा कि जिस को जानकर सब मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गये हैं। १ ।

हे अर्जुन ! इस ज्ञान को आश्रय करके अर्थात् धारण करके मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में पुनः उत्पन्न नहीं होते हैं और प्रलयकाल में भी व्याकुल नहीं होते हैं; क्योंकि उनकी दृष्टि में मुझ वासुदेव से भिन्न कोई वस्तु है ही नहीं। २ ।

हे अर्जुन ! मेरी महत् ब्रह्मरूप प्रकृति अर्थात् त्रिगुणमयी माया सम्पूर्ण भूतों की योनि है अर्थात् गर्भाधान का स्थान है और मैं उस योनिमें  चेतन रूप बीज को स्थापन करता हूँ। उस जड़- चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पत्ति होती है ।३।

हे अर्जुन ! नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियाँ अर्थात् शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी त्रिगुणमयी माया तो गर्भ को धारण करने वाली माता है और मैं बीजको स्थापन करने वाला पिता हूँ। ४ ।

हे अर्जुन ! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमो गुण ऐसे यह प्रकृति से उत्पन्न हुए तीनों गुण इस अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं। ५ ।

हे निष्पाप ! उन तीनों गुणों में प्रकाश करने वाला, निर्विकार सत्त्वगुण तो निर्मल होने के कारण सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से अर्थात् ज्ञान के अभिमान से बाँधता है।६।

Bhagwat Geeta 14 adhyay

हे अर्जुन ! रागरूप रजोगुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्न हुआ जान, वह इस जीवात्मा को कर्मो की और उनके फल की आसक्ति से बाँधता है। ७।

और हे अर्जुन ! सर्वदेहाभिमानियों के मोहने वाले तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न हुआ जान, वह इस जीवात्मा को प्रमाद,* आलस्य और निद्रा के द्वारा बाँधता है। ८ ।

क्योंकि हे अर्जुन ! सत्त्वगुण सुख में लगाता है और रजोगुण कर्म में लगाता है तथा तमोगुण तो ज्ञान को आच्छादन करके अर्थात् ढक के प्रमाद में भी लगाता है।९।

और हे अर्जुन ! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण होता है अर्थात् बढ़ता है तथा रजोगुण और सत्त्वगुण को दबाकर तमोगुण बढ़ता है, वैसे ही तमोगुण और सत्त्वगुण को दबाकर रजोगुण बढ़ता है। १० ।

इसलिये जिस काल में इस देह में तथा अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतनता और बोधशक्ति उत्पन्न होती है, उस काल में ऐसा जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा है। ११ ।

Bhagwat Geeta 14 adhyay

और हे अर्जुन ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ और प्रवृत्ति अर्थात् सांसारिक चेष्टा तथा सब प्रकार के कर्मो का स्वार्थबुद्धि से आरम्भ एवं अशान्ति अर्थात् मन की चञ्चलता और विषयभोगों की लालसा, यह उत्पन्न होते हैं। १२।

तथा हे अर्जुन ! तमोगुण के बढ़ने पर अन्तःकरण और इन्द्रियों में अप्रकाश एवं कर्तव्यकर्मो में अप्रवृत्ति और प्रमाद अर्थात् व्यर्थ चेष्टा और निद्रादि अन्तःकरण की मोहिनी वृत्तियाँ यह सब ही उत्पन्न होते हैं। १३ ।

हे अर्जुन ! जब यह जीवात्मा सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करनेवालों के मलरहित अर्थात् दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है। १४ ।

रजोगुण के बढ़ने पर, अर्थात् जिस काल में रजोगुण बढ़ता है उस काल में मृत्यु को प्राप्त होकर, कर्मो की आसक्ति वाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ पुरुष कीट, पशु आदि मूढ़ योनियोंमें उत्पन्न होता है। १५।

क्योंकि सात्त्विक कर्म का तो सात्त्विक अर्थात् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है और राजस कर्म का फल दुःख एवं तामस कर्म का फल अज्ञान कहा है। १६ ।

सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगुण से निःसंदेह लोभ उत्पन्न होता है तथा तमोगुण से प्रमाद* और मोह । उत्पन्न होते हैं और अज्ञान भी होता है। १७ ।

Bhagwat Geeta 14 adhyay

इसलिये सत्त्वगुण में स्थित हुए पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते हैं और रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्य में अर्थात् मनुष्यलोक में ही रहते हैं एवं तमोगुण के कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्यादि में स्थित हुए तामस पुरुष अधोगति को अर्थात् कीट, पशु आदि नीच योनियोंको प्राप्त होते हैं। १८।

हे अर्जुन ! जिस काल में द्रष्टा अर्थात् समष्टि-चेतन में एकीभाव से स्थित हुआ साक्षी पुरुष तीनों गुणों के सिवा अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है अर्थात् गुण ही गुणों में बर्तते हैं* ऐसा देखता है और तीनों गुणों से अति परे सच्चिदानन्दघनस्वरूप मुझ परमात्मा को तत्त्व से जानता है, उस काल में वह पुरुष मेरे स्वरूपको प्राप्त होता है। १९ ।

Bhagwat Geeta 11 adhyay, or mahatmy

तथा यह पुरुष इन स्थूल शरीर की उत्पत्ति के कारण तीनों गुणों को उल्लङ्घन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुःखों से मुक्त हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है। २० ।

इस प्रकार भगवान के रहस्ययुक्त वचनों को सुनकर अर्जुन ने पूछा कि हे पुरुषोत्तम ! इन तीनों गुणों से अतीत हुआ पुरुष किन-किन लक्षणों से युक्त होता है ? और किस प्रकार के आचरणों वाला होता है तथा हे प्रभो ! मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणोंसे अतीत होता है ? । २१ ।

मत इस प्रकार अर्जुन के पूछने पर श्रीकृष्णभगवान् बोले, हे अर्जुन ! जो पुरुष सत्त्वगुण के कार्यरूप प्रकाश को* और रजोगुण के कार्यरूप प्रवृत्ति को तथा तमोगुण के कार्य रूप मोहको भी न तो प्रवृत्त होने पर बुरा समझता है और न निवृत्त होने पर उनकी आकाङ्क्षा करता है।। २२ ।

Bhagwat Geeta 14 adhyay

तथा जो साक्षी के सदृश स्थित हुआ गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता है और गुण ही गुणों में बर्तते हैं* ऐसा समझता हुआ जो सच्चिदानन्दघन परमात्मा में एकीभाव से स्थित रहता है एवं उस स्थिति से चलाय मान नहीं होता है। २३

जो निरन्तर आत्मभाव में स्थित हुआ दुःख-सुख को समान समझने वाला है तथा मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण में समान भाव वाला और धैर्यवान् है तथा जो प्रिय और अप्रिय को बराबर समझता है और अपनी निन्दा-स्तुति में भी समान भाव वाला है। २४ ।

तथा जो मान और अपमान में सम है एवं मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है, वह सम्पूर्ण आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित हुआ पुरुष गुणातीत कहा जाता है। २५ ।

Bhagwat Geeta 12 adhyay, or mahatmy

और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तिरूप योग के द्वारा मेरे को निरन्तर भजता है, वह इन तीनों गुणों को अच्छी प्रकार उल्लङ्घन करके सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव होने के लिये योग्य होता है । २६ ।

हे अर्जुन ! उस अविनाशी परब्रह्म का और अमृत का तथा नित्यधर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का मैं ही आश्रय हूँ अर्थात् उपर्युक्त ब्रह्म, अमृत, अव्यय और शाश्वत धर्म तथा ऐकान्तिक सुख, यह सब मेरे ही नाम हैं, इसलिये इनका मैं परम आश्रय हूँ। २७।

इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “गुणत्रयविभाग योग’ नामक चौदहवाँ अध्याय ॥ १४ ॥

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 माहात्म्य ।। Bhagwat Geeta 13 adhyay

 

साधकों आप सब के लिए प्रस्तुत है। “Bhagwat Geeta 13 adhyay”  श्रीमद्भगवद्गीता तेरहवां अध्याय व माहात्म्य हिन्दी व संस्कृत में।

 

श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय का माहात्म्य

श्रीमहादेवजी कहते हैं-पार्वती ! अब तेरहवें अध्याय की अगाध महिमा का वर्णन सुनो। उस को सुनने से तुम बहुत प्रसन्न होओगी । दक्षिण दिशा में तुङ्गभद्रा नाम की एक बहुत बड़ी नदी है। उसके किनारे हरिहर पुर नामक रमणीय नगर बसा हुआ है। वहाँ हरिहर नाम से साक्षात् भगवान् शिवजी विराजमान हैं, जिनके दर्शनमात्र से परम कल्याण की प्राप्ति होती है। हरिहर पुर में हरि दीक्षित नामक एक श्रोत्रिय ब्राह्मण रहते थे, जो तपस्या और स्वाध्याय में संलग्न तथा वेदों के पारगामी विद्वान् थे।

उनके एक स्त्री थी, जिसे लोग दुराचारा कहकर पुकारते थे। इस नाम के अनुसार ही उसके कर्म भी थे। वह सदा पति को कुवाच्य कहती थी। उसने कभी भी उन के साथ शयन नहीं किया। पति से सम्बन्ध रखने वाले जितने लोग घर पर आते, उन सबको डाँट बताती और स्वयं कामोन्मत्त होकर निरन्तर व्यभिचारियों के साथ रमण किया करती थी।एक दिन नगर को इधर-उधर आते-जाते हुए पुरवासियों से भरा देख उसने निर्जन एवं दुर्गम वन में अपने लिये संकेत स्थान बना लिया। एक समय रात में किसी कामी को न पाकर वह घर के किवाड़ खोल नगर से बाहर संकेत स्थान पर चली गयी।

उस समय उसका चित्त काम से मोहित हो रहा था। वह एक-एक कुञ्ज में तथा प्रत्येक वृक्ष के नीचे जा-जाकर किसी प्रियतम की खोज करने लगी; किंतु उन सभी स्थानों पर उसका परिश्रम व्यर्थ गया। उसे प्रियतम का दर्शन नहीं हुआ। तब वह उस वन में नाना प्रकार की बातें कहकर विलाप करने लगी। चारों दिशाओं में घूम-घूम कर वियोग जनित विलाप करती हुई उस स्त्री की आवाज सुनकर कोई सोया हुआ बाघ जाग उठा और उछल कर उस स्थान पर पहुंचा, जहाँ वह रो रही थी। उधर वह भी उसे आते देख किसी प्रेमी की आशङ्का से उसके सामने खड़ी होने के लिये ओट से बाहर निकल आयी।

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

उस समय व्याघ्र ने आकर उसे नखरूपी बाणोंके प्रहार से पृथ्वी पर गिरा दिया। इस अवस्था में भी वह कठोर वाणी में चिल्लाती हुई पूछ बैठी-‘अरे बाघ ! तू किस लिये मुझे मारने को यहाँ आया है ? पहले इन सारी बातों को बता दे, फिर मुझे मारना।’ उसकी यह बात सुनकर प्रचण्ड पराक्रमी व्याघ्र क्षणभर के लिये उसे अपना ग्रास बनाने से रुक गया और हँसता हुआ-सा बोला-‘दक्षिण देश में मलापहा नामक एक नदी है। उसके तटपर मुनिपर्णा नगरी बसी हुई है। वहाँ पञ्चलिङ्ग नाम से प्रसिद्ध साक्षात् भगवान् शङ्कर निवास करते हैं। उसी नगरी में मैं ब्राह्मणकुमार होकर रहता था।

नदी के किनारे अकेला बैठा रहता और जो यज्ञ के अधिकारी नहीं हैं, उन लोगों से भी यज्ञ करा कर उनका अन्न खाया करता था। इतना ही नहीं, धनके लोभ से मैं सदा अपने वेदपाठ के फल को भी बेचा करता था। मेरा लोभ यहाँ तक बढ़ गया था कि अन्य भिक्षुओं को गालियाँ देकर हटा देता और स्वयं दूसरों को नहीं देने योग्य धन भी बिना दिये ही हमेशा ले लिया करता था। ऋण लेने के बहाने मैं सब लोगों को छला करता था। तदनन्तर कुछ काल व्यतीत होने पर मैं बूढ़ा हुआ।

मेरे बाल सफेद हो गये, आँखों से सूझता न था और मुँह के सारे दाँत गिर गये। इतने पर भी मेरी दान लेने की आदत नहीं छूटी। पर्व आने पर प्रतिग्रह के लोभ से मैं हाथ में कुश लिये तीर्थ के समीप चला जाया करता था। तत्पश्चात् जब मेरे सारे अङ्ग शिथिल हो गये, तब एक बार मैं कुछ धूर्त ब्राह्मणों के घर पर माँगने- खाने के लिये गया। उसी समय मेरे पैर में कुत्ते ने काट लिया। तब मूर्छित होकर क्षणभर में पृथ्वी पर गिर पड़ा। मेरे प्राण निकल गये। उसके बाद मैं इसी व्याघ्रयोनि में उत्पन्न हुआ।

Bhagwat Geeta 13 adhyay, or mahatmy

तबसे इस दुर्गम वन में रहता हूँ तथा अपने पूर्व पापों को याद करके कभी धर्मिष्ठ महात्मा, यति, साधु पुरुष तथा सती स्त्रियोंको मैं नहीं खाता। पापी-दुराचारी तथा कुलटा स्त्रियों को ही मैं अपना भक्ष्य बनाता हूँ; अतः कुलटा होने के कारण तू अवश्य ही मेरा ग्रास बनेगी।’ यों कहकर वह अपने कठोर नखों से उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके खा गया। इसके बाद यमराज के दूत उस पापिनी को संयमनीपुरी में ले गये। वहाँ यमराज की आज्ञा से उन्होंने अनेकों बार उसे विष्ठा, मूत्र और रक्त से भरे हुए भयानक कुण्डों में गिराया। करोड़ों कल्पोंतक उसमें रखने के बाद उसे वहाँ से ले आकर सौ मन्वन्तरों तक रौरव नरक में रखा। फिर चारों ओर मुँह करके दीन भाव से रोती हुई उस पापिनी को वहाँ से खींचकर दहनानन नामक नरक में गिराया।

उस समय उसके केश खुले हुए थे और शरीर भयानक दिखायी देता था। इस प्रकार घोर नरकयातना भोग चुकने पर वह महापापिनी इस लोक में आकर चाण्डाल योनि में उत्पन्न हुई। चाण्डाल के घर में भी प्रतिदिन बढ़ती हुई वह पूर्वजन्म के अभ्यास से पूर्ववत् पापों में प्रवृत्त रही। फिर उसे कोढ़ और राजयक्ष्मा का रोग हो गया। नेत्रों में पीड़ा होने लगी। फिर कुछ काल के पश्चात् वह पुनः अपने निवास स्थान (हरिहरपुर) को गयी, जहाँ भगवान् शिव के अन्तःपुर की स्वामिनी जम्भका देवी विराजमान हैं। वहाँ उसने वासुदेव नामक एक पवित्र ब्राह्मण का दर्शन किया, जो निरन्तर गीता के तेरहवें अध्याय का पाठ करता रहता था। उसके मुख से गीता का पाठ सुनते ही वह चाण्डाल शरीर से मुक्त हो गयी और दिव्य देह धारण कर के स्वर्गलोक में चली गयी।

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

अथ त्रयोदशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते । एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः । १ ।
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत । क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम। २ ।
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्। स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु। ३ ।
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः। ४ ।
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः। ५ ।
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः । एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्। ६ ।
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्। आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः । ७ ।
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च । जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ।८ ।
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु । नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु। ९ ।
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी । विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ।१०।
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्। एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा । ११ ।
ज्ञेय यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते। अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते । १२ ।

श्रीभगवानुवाच

सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति । १३ ।
सन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च । १४ ।
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च । सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् । १५।
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्। भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं प्रसिष्णु प्रभविष्णु च । १६ ।
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हदि सर्वस्य विष्ठितम्। १७ ।
इति क्षेत्र तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः । मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्धावायोपपद्यते । १८ ।
प्रकृतिं पुरुवं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् । १९ ।
कार्यकरणकर्तृत्वे प्रकृतिरुच्यते । पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते । २० ।
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् । कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु । २१ ।
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः । परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः । २२ ।
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह । सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते। २३ ।

श्रीभगवानुवाच

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना । अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे । २४ ।
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते । तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः । २५।
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् । क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ । २६।
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् । विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति । २७ ।
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्। न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् । २८ ।
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः । यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति । २९ ।
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति । तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा।३०।
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्माय त्मिायमव्ययः । शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते। ३१ ।
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते। सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते। ३२।
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत । ३३ ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्। ३४ ।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ।। १३ ॥

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

तेरहवाँ अध्याय

उसके उपरान्त श्रीकृष्णभगवान् फिर बोले, हे अर्जुन ! यह शरीर क्षेत्र है ऐसे कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसको क्षेत्रज्ञ,

ऐसा उनके तत्त्व को जानने वाले ज्ञानीजन कहते हैं। १।

और हे अर्जुन ! तू सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ अर्थात् जीवात्मा भी मेरे को ही जान और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का अर्थात् विकार सहित प्रकृति का और

पुरुष का जो तत्त्व से जानना है। वह ज्ञान है, ऐसा मेरा मत है। २ ।

इसलिये वह क्षेत्र जो है और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है और जिस कारण से जो हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो है और जिस

प्रभाव वाला है, वह सब संक्षेप से मेरे से सुन । ३ ।

यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का तत्त्व ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया है अर्थात् समझाया गया है और नाना प्रकार के वेदमन्त्रों से विभाग

पूर्वक कहा गया है तथा अच्छी प्रकार निश्चय किये हुए युक्ति युक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी वैसे ही कहा गया है। ४ ।

हे अर्जुन ! वही मैं तेरे लिये कहता हूँ कि पाँच महाभूत अर्थात् आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी का सूक्ष्म-भाव, अहंकार, बुद्धि और

मूल प्रकृति अर्थात् त्रिगुणमयी माया भी तथा दस इन्द्रियाँ अर्थात् श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण एवं वाक्, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा,

एक मन और पाँच इन्द्रियों के विषय अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध । ५।

तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख और स्थूल देह का पिण्ड एवं चेतनता और धृति। इस प्रकार यह क्षेत्र विकारों के सहित* संक्षेप से कहा

गया । ६।

Bhagwat Geeta 13 adhyay

कारी हे अर्जुन ! श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, प्राणिमात्र को किसी प्रकार भी न सताना और क्षमाभाव तथा

मन-वाणी की सरलता, श्रद्धा-भक्ति सहित गुरुकी सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धिा, अन्तःकरण की स्थिरता, मन और इन्द्रियों सहित शरीर

का निग्रह । ७।

इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण भोगों में आसक्ति का अभाव और अहंकार का भी अभाव एवं जन्म-मृत्यु-जरा और रोग आदि में

दुःख-दोषों का बारंबार विचार करना। ८।

पुत्र, स्त्री, घर और धनादि में आसक्ति का अभाव और ममता का न होना तथा प्रिय- नवर इस श्लोकोद अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही

चित्त का सम रहना अर्थात् मन के अनुकूल तथा प्रतिकूल के प्राप्त होने पर हर्ष-शोकादि विकारों का न होना । ९ ।

मुझ परमेश्वर में एकीभाव से स्थिति रूप ध्यान योग के द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति तथा एकान्त और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव

और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना । १० ।

तथा अध्यात्मज्ञान में नित्य स्थिति और तत्त्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा को सर्वत्र देखना, यह सब तो ज्ञान है और जो इससे विपरीत है,

वह अज्ञान है ऐसे कहा है। ११ ।

हे अर्जुन ! जो जानने के योग्य है तथा जिस को जानकर मनुष्य परमानन्द को प्राप्त होता है, उसको अच्छी प्रकार कहूँगा, वह आदि-

रहित, परम ब्रह्म अकथनीय होने से न सत् कहा जाता है और न असत् ही कहा जाता है। १२ ।

Bhagwat Geeta 13 adhyay

परंतु वह सब ओरसे हाथ-पैरवाला एवं सब ओर से नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर से श्रोत्रवाला है; क्योंकि वह संसार में सबको

व्याप्त करके स्थित है । १३।

और सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परंतु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित और गुणों से अतीत

हुआ भी अपनी योगमाया से सबको धारण-पोषण करने वाला और गुणों को भोगने वाला है। १४ ।

तथा वह परमात्मा चराचर सब भूतों के बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचररूप भी वही है और वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय है* तथा

अति समीप‌ में और दूर में भी स्थित वही है। १५ ।

और वह विभाग रहित एकरूप‌ से आकाश के सदृश परिपूर्ण हुआ भी चराचर सम्पूर्ण भूतों में पृथक्-पृथक्के सदृश स्थित प्रतीत होता

है तथा वह जानने योग्य परमात्मा, विष्णु रूप से भूतों को धारण-पोषण करने वाला और रुद्र रूप से संहार करने वाला तथा ब्रह्मारूप से

सबका उत्पन्न करने वाला है। १६ ।

Bhagwat Geeta saptam adhyay , or mahatm

वह ब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति एवं माया से अति परे कहा जाता है तथा वह परमात्मा बोध स्वरूप और जानने के योग्य है एवं तत्त्वज्ञान

से प्राप्त होने वाला और सबके हृदय में स्थित है। १७ ।

हे अर्जुन! इस प्रकार क्षेत्र*‌ तथा ज्ञान और जानने योग्य परमात्मा का स्वरूप संक्षेप से कहा गया, इसको तत्त्व से जानकर मेरा भक्त मेरे

स्वरूप को प्राप्त होता है। १८ ।

Bhagwat Geeta 13 adhyay

म हे अर्जुन ! प्रकृति अर्थात् त्रिगुणमयी मेरी माया और जीवात्मा अर्थात् क्षेत्रज्ञ, इन दोनों को तू अनादि जान और राग-द्वेषादि‌ विकारों को

तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न हुए जान । १९ ।

क्योंकि कार्य और करण के उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और जीवात्मा सुख-दुःखों के भोक्तापन में अर्थात् भोग ने में हेतु

कहा जाता है। २० ।

परंतु प्रकृति में* स्थित हुआ ही पुरुष प्रकृति से उत्पन्न हुए त्रिगुणात्मक सब पदार्थो को भोगता है और इन गुणों का सङ्ग ही इस जीवात्मा

के अच्छी, बुरी योनियोंमें  जन्म लेने में कारण है। । २१ ।

Bhagwat Geeta ashtam adhyay, or mahatm

वास्तव में तो यह पुरुष इस देहमें स्थित हुआ भी पर अर्थात् त्रिगुणमयी माया से सर्वथा अतीत ही है, केवल साक्षी होने से उपद्रष्टा और

यथार्थ सम्मति देने वाला होने से अनुमन्ता एवं सबको धारण करने वाला होने से भर्ता, जीवरूप से भोक्ता तथा ब्रह्मादिकों का भी स्वामी

होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दघन होने से परमात्मा, ऐसा कहा गया है। २२ ।

इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य तत्त्व से जानता है वह सब प्रकार‌ से बर्तता हुआ भी फिर नहीं जन्मता है

अर्थात् पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होता है। २३ ।

हे अर्जुन ! उस परम पुरुष परमात्मा को कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि से ध्यान के द्वारा हृदय में देखते हैं तथा अन्य कितने

ही ज्ञानयोग के द्वारा देखते हैं और अपर कितने ही निष्काम कर्मयोग के द्वारा देखते हैं। २४ ।

Bhagwat Geeta 13 adhyay

परंतु इनसे दूसरे अर्थात् जो मन्दबुद्धि वाले पुरुष हैं, वे स्वयं इस प्रकार न जानते‌ दूसरों से अर्थात् तत्त्व के जानने वाले पुरुषों से सुनकर

ही उपासना करते हैं अर्थात् उन पुरुषों के कहने के अनुसार ही श्रद्धासहित तत्पर हुए साधन करते हैं और वे सुननेके  परायण हुए पुरुष‌

भी मृत्युरूप संसारसागर को निःसंदेह तर जाते हैं। २५ ।

हे अर्जुन! यावन्मात्र जो कुछ भी स्थावर, जङ्गम वस्तु उत्पन्न होती है, उस सम्पूर्ण को तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्न हुई जान

अर्थात् प्रकृति और पुरुष के परस्पर के सम्बन्ध से ही सम्पूर्ण जगत्की स्थिति है, वास्तव में तो सम्पूर्ण जगत् नाशवान् और क्षणभङ्गुर होने

से अनित्य है। २६ ।

Bhagwat Geeta navam adhyay, or mahatm

इस प्रकार जानकर जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतों में नाश रहित परमेश्वर को समभाव‌ से स्थित देखता है, वही देखता है। २७ ।

क्योंकि वह पुरुष सबमें समभाव से स्थित हुए परमेश्वर को समान देखता हुआ अपने द्वारा आपको नष्ट नहीं करता है अर्थात् शरीर का

नाश होने से अपने आत्माका नाश नहीं मानता है, इससे वह परमगति को प्राप्त होता है। २८ ।

और जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति से ही किये हुए देखता है अर्थात् इस बात को तत्त्व से समझ लेता है कि प्रकृति से

उत्पन्न हुए सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बर्तते हैं तथा आत्मा को अकर्ता देखता है, वही देखता है। २९ ।

Bhagwat Geeta 13 adhyay

और यह पुरुष जिस काल में भूतों के न्यारे-न्यारे भाव को एक परमात्मा के संकल्प के आधार स्थित देखता है तथा उस परमात्मा के

संकल्प से ही सम्पूर्ण भूतों का विस्तार देखता है, उस काल में सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त होता है। ३० ।

हे अर्जुन ! अनादि होने से और गुणातीत होने से यह अविनाशी परमात्मा, शरीर में स्थित हुआ भी वास्तव में न करता है और न लिपाय

मान होता है। ३१।

जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त हुआ भी आकाश सूक्ष्म होनेके कारण लिपाय मान नहीं होता है, वैसे ही सर्वत्र देह में स्थित हुआ भी आत्मा

गुणातीत होने के कारण देह के गुणों से लिपायमान नहीं होता है। ३२ ।

Bhagwat Geeta 11 adhyay, or mahatmy

हे अर्जुन ! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित

करता है अर्थात् नित्यबोध स्वरूप एक आत्मा की ही सत्ता से सम्पूर्ण जडवर्ग प्रकाशित होता है। ३३ ।

इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को* तथा विकार सहित प्रकृति से छूटने के उपाय को जो पुरुष ज्ञाननेत्रों द्वारा तत्त्व से जानते हैं,

वे महात्माजन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं। ३४ ।

इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें “क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग’ नामक

तेरहवां अध्याय ॥ १३ ॥

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Bhagwat Geeta 12 adhyay, or mahatmy https://mantramol.com/bhagwat-geeta-12-adhyay/ https://mantramol.com/bhagwat-geeta-12-adhyay/#respond Sat, 02 Jan 2021 11:22:42 +0000 https://mantramol.com/?p=2495 श्रीमद्भगवद्गीता बारहवां अध्याय व माहात्म्य ।।  Bhagwat Geeta 12 adhyay   साधकों आप सब के लिए प्रस्तुत है। “Bhagwat Geeta 12 adhyay”  श्रीमद्भगवद्गीता बारहवां अध्याय व माहात्म्य हिन्दी व संस्कृत ...

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श्रीमद्भगवद्गीता बारहवां अध्याय व माहात्म्य ।।  Bhagwat Geeta 12 adhyay

 

साधकों आप सब के लिए प्रस्तुत है। “Bhagwat Geeta 12 adhyay”  श्रीमद्भगवद्गीता बारहवां अध्याय व माहात्म्य हिन्दी व संस्कृत मे।

 

श्रीमद्भगवद्गीताके बारहवें अध्याय का माहात्म्य

श्रीमहादेवजी कहते हैं-पार्वती ! दक्षिण दिशा में कोल्हा पुर नाम का एक नगर है, जो सब प्रकार के सुखों का आधार, सिद्ध-महात्माओं का निवास स्थान तथा सिद्धि-प्राप्ति का क्षेत्र है। वह पराशक्ति भगवती लक्ष्मी का प्रधान पीठ है। सम्पूर्ण देवता उसका सेवन करते हैं। वह पुराण प्रसिद्ध तीर्थ भोग एवं मोक्ष प्रदान करने वाला है। वहाँ करोड़ों तीर्थ और शिवलिङ्ग हैं। रुद्रगया भी वहीं है। वह विशाल नगर लोगों में बहुत विख्यात है। एक दिन कोई युवक पुरुष उस नगर में आया। [ वह कहीं का राजकुमार था ] उसके शरीर का रंग गोरा, नेत्र सुन्दर, ग्रीवा शङ्ख के समान, कंधे मोटे, छाती चौड़ी तथा भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं नगर में प्रवेश करके सब ओर महलों की शोभा निहारता हुआ वह देवेश्वरी महालक्ष्मी के दर्शनार्थ उत्कण्ठित हो मणिकण्ठ तीर्थ में गया और वहाँ

स्नान करके उसने पितरोंका तर्पण किया। फिर महामाया महालक्ष्मीजी को प्रणाम करके भक्तिपूर्वक स्तवन करना आरम्भ किया। राजकुमार बोला–जिसके हृदय में असीम दया भरी हुई है, जो समस्त कामनाओं को देती तथा अपने कटाक्षमात्र से सारे जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करती है, उस जगन्माता महालक्ष्मी की जय हो । जिस शक्ति के सहारे उसी के आदेश के अनुसार परमेष्ठी ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, भगवान् अच्युत जगत्का पालन करते हैं तथा भगवान् रुद्र अखिल विश्वका संहार करते हैं, उस सृष्टि, पालन और संहार की शक्ति से सम्पन्न भगवती पराशक्ति का मैं भजन करता हूँ। कमले ! योगिजन तुम्हारे चरणकमलों का चिन्तन करते हैं। कमलालये ! तुम अपनी स्वाभाविक सत्ता से ही हमारे समस्त इन्द्रियगोचर वषयों को जानती हो। तुम्हीं कल्पनाओं के समूह को तथा उसका कल्प करने वाले मन को उत्पन्न करती हो।

Bhagwat Geeta 12 adhyay, or mahatmy

इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति-ये सब तुम्हारे ही रूप हैं। तुम परासंवित् (परमज्ञान) रूपिणी हो । तुम्हारा स्वरूप निष्कल, निर्मल, नित्य, निराकार, निरञ्जन, अन्तरहित, आतङ्कशून्य, आलम्बहीन तथा निरामय है। देवि ! तुम्हारी महिमाका वर्णन करने में कौन समर्थ हो सकता है। जो षट्चक्रों का भेदन कर के अन्तःकरण के बारह स्थानोंमें विहार करती है, अनाहत, ध्वनि, विन्दु, नाद और कला-ये जिसके स्वरूप हैं, उस माता महालक्ष्मी को में प्रणाम करता हूँ। माता ! तुम अपने [ मुखरूपी ] पूर्णचन्द्रमा से प्रकट होने वाली अमृतराशि को बहाया करती हो । तुम्हीं परा, पश्यन्ती,‌ मध्यमा और वैखरी नामक वाणी हो । मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। देवि ! तुम जगत्की रक्षा के लिये अनेक रूप धारण किया करती हो।

अम्बि के ! तुम्ही ब्राह्मी, वैष्णवी तथा माहेश्वरी शक्ति हो। वाराही, महालक्ष्मी, नारसिंही, ऐन्द्री, कौमारी, चण्डिका, जगत को पवित्र करने वाली लक्ष्मी, जगन्माता सावित्री, चन्द्रकला तथा रोहिणी भी तुम्हीं हो । परमेश्वरि ! तुम भक्तों का मनोरथ पूर्ण करने के लिये कल्पलता के समान हो। मुझपर प्रसन्न हो जाओ। उसके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवती महालक्ष्मी अपना साक्षात् स्वरूप धारण करके बोलीं-‘राजकुमार ! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम कोई उत्तम वर माँगो।’ राजपुत्र बोला-माँ ! मेरे पिता राजा बृहद्रथ अश्वमेध नामक महान् यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे थे। वे दैवयोग से रोग ग्रस्त होकर स्वर्गगामी हो गये। इसी बीच में यूपमें बँधे हुए मेरे यज्ञसम्बन्धी घोड़े को, जो समूची पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटा था, किसी ने रात्रि में बन्धन काटकर कहीं अन्यत्र पहुँचा दिया।

Bhagwat Geeta 12 adhyay, or mahatmy

उसकी खोज में मैंने कुछ लोगों को भेजा था; किंतु वे कहीं भी उसका पता न पाकर जब खाली हाथ लौट आये हैं, तब मैं सब ऋत्विजों से आज्ञा लेकर तुम्हारी शरण में आया हूँ। देवि ! यदि तुम मुझपर प्रसन्न हो तो मेरे यज्ञ का घोड़ा मुझे मिल जाय, जिस से यज्ञ पूर्ण हो सके। तभी मैं अपने पिता महाराज का ऋण उतार सकूँगा। शरणागतो पर दया करने वाली जगजननी लक्ष्मी ! जिससे मेरा यज्ञ पूर्ण हो, वह उपाय करो। हाकावामान भगवती लक्ष्मी ने कहा-राजकुमार ! मेरे मन्दिर के दरवाजे‌ पर एक ब्राह्मण रहते हैं, जो लोगों में सिद्ध समाधि के नाम से  विख्यात हैं। वे मेरी आज्ञा से तुम्हारा सब काम पूरा कर देंगे। महालक्ष्मी के इस प्रकार कहने पर राजकुमार उस स्थान पर आये, जहाँ सिद्ध समाधि रहते थे। उनके चरणों में प्रणाम करके राजकुमार चुपचाप हाथ जोड़ खड़े हो गये।

तब ब्राह्मण ने कहा ‘तुम्हें माता जी ने यहाँ भेजा है। अच्छा, देखो; अब मैं तुम्हारा सारा अभीष्ट कार्य सिद्ध करता हूँ।’ यों कहकर मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण ने सब देवताओं को वहीं खींचा। राजकुमार ने देखा, उस समय सब देवता हाथ जोड़े थर-थर काँपते हुए वहाँ उपस्थित हो गये। तब उन श्रेष्ठ ब्राह्मण ने समस्त देवताओं से कहा-‘देवगण ! इस राजकुमार का अश्व, जो यज्ञ के लिये निश्चित हो चुका था, रात‌ में देवराज इन्द्र ने चुराकर अन्यत्र पहुँचा दिया है; उसे शीघ्र ले आओ।’ तब देवताओं ने मुनि के कहने से यज्ञ का घोड़ा लाकर दे दिया। इसके बाद उन्होंने उन्हें जाने की आज्ञा दी। देवताओं का आकर्षण देखकर तथा खोये हुए अश्व को पाकर राजकुमार ने मुनि के चरणों में प्रणाम करके कहा-‘महर्षे ! आपका यह सामर्थ्य आश्चर्यजनक है।

Bhagwat Geeta 12 adhyay, or mahatmy

आप ही ऐसा कार्य कर सकते हैं, दूसरा कोई नहीं। ब्रह्मन् ! मेरी प्रार्थना सुनिये, मेरे पिता राजा बृहद्रथ अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान आरम्भ करके दैवयोग से मृत्यु को प्राप्त हो गये हैं। अभी तक उनका शरीर तपाये हुए तेल में सुखाकर मैंने रख छोड़ा है। साधुश्रेष्ठ ! आप उन्हें पुनः जीवित कर दीजिये।’ यह सुनकर महामुनि ब्राह्मण ने किंचित् मुसकरा कर कहा-‘चलो, जहाँ यज्ञमण्डप में तुम्हारे पिता मौजूद हैं, चलें’। तब सिद्ध समाधि ने राजकुमार के साथ वहाँ जाकर जल अभिमन्त्रित किया और उसे उस शव के मस्तक पर रखा। उसके रखते ही राजा सचेत होकर उठ बैठे। फिर उन्होंने ब्राह्मण को देखकर पूछा-‘धर्मस्वरूप ! आप कौन हैं ?’ तब राजकुमार ने महाराज से पहले का सारा हाल कह सुनाया।

राजा ने अपने को पुनः जीवन दान देने वाले ब्राह्मण को नमस्कार करके पूछा-‘ब्रह्मन् ! किस पुण्य से आप को यह अलौकिक शक्ति प्राप्त हुई
है ?’ उनके यों कहने पर ब्राह्मण ने मधुर वाणी में कहा-राजन् ! मैं प्रतिदिन आलस्य रहित होकर गीताके बारह वें अध्याय का जप करता हूँ। उसी से मुझे यह शक्ति मिली है, जिससे तुम्हें जीवन प्राप्त हुआ है। यह सुनकर ब्राह्मणों सहित राजा ने उन ब्रह्मर्षि से गीता के बारहवें अध्याय का अध्ययन किया। उसके माहात्म्य से उन सबकी सद्गति हो गयी। दूसरे-दूसरे जीव भी उसके पाठ से परम मोक्ष को प्राप्त हो चुके हैं।

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

अथ द्वादशोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः। १ ।

Shrimad bhagwat geeta katha || श्रीमद्भगवद्गीता प्रथम अध्याय।

श्रीभगवानुवाच

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः। २ ।
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्। ३ ।
सत्रियम्येन्द्रियग्राम सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः । ४ ।
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्धिरवाप्यते। ५ ।
ये सर्वाणि कर्माणि मयि सन्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते। ६
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्। ७ ।
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्व न संशयः। ८ ।

Bhagwat Geeta dwitiya adhyay ।। श्रीमद्भगवद्गीता महत्तव

श्रीभगवानुवाच

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय। ९ ।
अभ्यासेऽष्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि । १०।
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः । सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् । ११ ।
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाग्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते । ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् । १२ ।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी। १३ ।
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो पद्धक्तः स मे प्रियः । १४ ।
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः । १५ ।

Bhagwat Geeta third adhayay ।। mahatmy

श्रीभगवानुवाच

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः । सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः । १६ ।
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्गति । शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः । १७ ।
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः । १८।
तुल्यनिन्दास्तुतिमौनी सन्तुष्टो येन केनचित् । अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्ये प्रियो नरः । १९ ।
ये तु धामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते । श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः । २० ।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

Bhagwat geeta chautha adhyay, in hindi

ॐ श्रीपरमात्मने नमः गणमा

बारहवाँ अध्याय

इस प्रकार भगवान के वचनों को सुनकर अर्जुन बोले, हे मनमोहन ! जो अनन्य प्रेमी भक्तजन इस पूर्वोक्त प्रकार से निरन्तर आपके

भजन-ध्यान में लगे हुए आप सगुण रूप परमेश्वर को अति श्रेष्ठभाव से उपासते हैं? और जो अविनाशी सच्चिदानन्दघन, निराकार को ही

उपासते हैं, उन दोनों प्रकार के भक्तों में अति उत्तम योगवेत्ता कौन हैं। १।

Bhagwat Geeta panchwa adhyay, or mahatm

इस प्रकार अर्जुन के पूछने पर श्रीकृष्णभगवान् बोले, हे अर्जुन ! मेरे में मन को एकाग्र करके निरन्तर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए

जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त हुए मुझ सगुण रूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मेरे को योगियों में भी अति उत्तम योगी मान्य

हैं, अर्थात् उनको मैं अतिश्रेष्ठ मानता २ ।

और जो पुरुष इन्द्रियों‌ के समुदाय को अच्छी प्रकार वश‌में करके मन-बुद्धि से परे सर्वव्यापी अकथनीयस्वरूप और सदा एकरस रहने

वाले, नित्य अचल, निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए उपासते हैं, वे सम्पूर्ण भूतों के हित

‌ में रत हुए और सब में समान भाव वाले योगी भी मेरे को ही प्राप्त होते हैं। ३-४।

Bhagwat Geeta chhata adhyay , or mahatm.

किंतु उन सच्चिदानन्दघन, निराकार ब्रह्म में आसक्त हुए चित्त‌ वाले पुरुषों के साधन में क्लेश अर्थात् परिश्रम विशेष है, क्योंकि

देहाभिमानियों से अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है अर्थात् जब तक शरीर में अभिमान रहता है, तब तक

शुद्ध, सच्चिदानन्दघन, निराकार ब्रह्ममें स्थिति होनी कठिन है। ५।

Bhagwat Geeta 12 adhyay

और जो मेरे परायण हुए भक्तजन, सम्पूर्ण कर्मों को मेरे में अर्पण करके मुझ सगुण रूप परमेश्वर को ही तैलधारा के सदृश

अनन्य-ध्यानयोग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं । ६ ।

हे अर्जुन ! उन मेरे में चित्त को लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार-समुद्र से उद्धार करने वाला होता हूँ। ७।

इसलिये हे अर्जुन ! तू मेरे में मन को लगा और मेरे में ही बुद्धि को लगा, इसके उपरान्त तू मेरे में ही निवास करेगा अर्थात् मेरे को ही

प्राप्त होगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। ८।

Bhagwat Geeta saptam adhyay , or mahatm

यदि तू मन को मेरे में अचल स्थापन करने के लिये समर्थ नहीं है, तो हे अर्जुन ! अभ्यास रूपा योग के द्वारा मेरे को प्राप्त होनेके लिये

इच्छा कर । ९ ।

यदि तू ऊपर कहे हुए अभ्यास में भी असमर्थ है तो केवल मेरे लिये कर्म करने के ही परायण हो, इस प्रकार मेरे अर्थ कर्मो को करता हुआ

भी मेरी प्राप्तिरूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा। १० ।

Bhagwat Geeta ashtam adhyay, or mahatm

और यदि इस को भी करने के लिये असमर्थ है तो जीते हुए मनवाला और मेरी प्राप्तिरूप-योग के शरण हुआ सब कर्मो के फल का

मेरे लिये त्याग* कर । ११ ।

Bhagwat Geeta 12 adhyay

क्योंकि मर्म को न जानकर किये हुए अभ्यास से परोक्षज्ञान श्रेष्ठ है और परोक्षज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है तथा ध्यान

से भी सब कर्मो के फल का मेरे लिये त्याग करना श्रेष्ठ है और त्याग से तत्काल ही परम शान्ति होती है। १२ ।

इस प्रकार शान्ति को प्राप्त हुआ जो पुरुष सब भूतों में द्वेषभाव से रहित एवं स्वार्थरहित सबका प्रेमी और दयालु है तथा ममता से

रहित एवं अहंकार से रहित, सुख-दुःखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करने वाले को भी अभय देने वाला है। १३ ।

तथा जो ध्यानयोग में युक्त हुआ, निरन्तर लाभ-हानि में संतुष्ट है तथा मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किये हुए मेरे में दृढ़ निश्चय

वाला है, वह मेरे में अर्पण किये हुए मन-बुद्धि वाला मेरा भक्त मेरे को प्रिय है। १४ ।

Bhagwat Geeta navam adhyay, or mahatm

जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता है और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता है तथा जो हर्ष, अमर्ष भय

और उद्वेगादिकों से रहित है, वह भक्त मेरेको प्रिय है। १५।

जो पुरुष आकाक्षा से रहित तथा बाहर-भीतर से शुद्ध और चतुर है अर्थात् जिस काम के लिये आया था, उसको पूरा कर चुका है, एवं

पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है, वह सर्व आरम्भों का त्यागी अर्थात् मन, वाणी और शरीर द्वारा प्रारब्ध से होने वाले सम्पूर्ण स्वाभाविक कोम कर्तापन के अभिमान का त्यागी मेरा भक्त मेरे को प्रिय है। १६ ।

Bhagwat Geeta 12 adhyay

जोन कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोच करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कोंक फल का त्यागी है,

वह भक्तियुक्त पुरुष मेरे को प्रिय है। १७ ।

जो पुरुष शत्रु-मित्र में और मान-अपमान में सम है तथा सर्दी-गर्मी और सुख-दुःखादिक द्वन्द्वों में सम है और सब संसारमें आसक्तिसे

रहित है। १८ ।

Bhagwat Geeta dasama adhyay, or mahatm

तथा जो निन्दा-स्तुति को समान समझने वाला और मननशील है अर्थात् ईश्वर के स्वरूप का निरन्तर मनन करने वाला है एवं जिस-

किस प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता से रहित है, वह स्थिर बुद्धि वाला भक्तिमान्

पुरुष मेरे को प्रिय है। १९ ।

और जो मेरे परायण हुए अर्थात् मेरे को परम आश्रय और परम गति एवं सब का आत्म रूप और सब से परे, परम पूज्य समझ कर

विशुद्ध प्रेम से मेरी प्राप्ति के लिये तत्पर हुए श्रद्धायुक्त* पुरुष इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्कामभाव से सेवन करते हैं, वे

भक्त मेरे को अतिशय प्रिय हैं। २० ।

इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवाद में‌ “भक्तियोग’ नामक बारहवाँ

अध्याय ॥ १२ ॥

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