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शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ, अर्थ, महत्व व लाभ || Shiv Mahimna stotram

 

महत्व (Shiv Mahimna stotram)

शिव महिम्न स्तोत्र भगवान शिव की महिमा का वर्णन करने वाला एक अद्भुत स्तोत्र है, (Shiv Mahimna stotram) जिसकी रचना पुष्पदंत नामक गंधर्व ने की थी।
इस स्तोत्र का प्रतिदिन श्रदा से पाठ करने से पापों का नाश होता है और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है, और जीवन मे सुख,
शांति व समृद्धि आती है। शिव महिम्न स्तोत्र केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और समर्पण भाव है। इसका
पठन- पाठन आदि से भक्तों को भक्ति, ज्ञान और मोक्ष प्राप्त होता है।

शिव महिम्न स्तोत्र विधि

इस स्तोत्र प्रतिदिन नियमित रूप 21 दिनों तक पाठ करने से भगवान शिव बहुत प्रसन्न होते हैं।
इसके अतिरिक्त आप श्रावण के महिने भी इसका पाठ करके दोगुना फल प्राप्त कर सकते है।

  • प्रातः उठ स्नान आदि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करे।
  • भगवान शिव की मूर्ति या चित्र स्थापित करे। फिर हाथ मे जल, पुष्प या चावल लेकर शिव महिम्न पाठ का संकल्प ले।
  • आप चाहे तो शिव मंदिर जाकर शिवलिंग के सामने संकल्प लेकर पाठ कर सकते हैं।
  • शिवलिंग का दूध, दही घी, पंचामृत व शुद्ध जल से अभिषेक ( स्नान ) करें।
  • भगवान शिव आगे देसी घी, या तिल के तेल का दीपक लगाकर धूप या अगरवती भी लगा दे।
  • पाठ को आरंभ करने से पहले गणेश वन्दना करे।
  • उसके पश्चात माता पार्वती व शिव परिवार को प्रणाम कर पाठ आरंभ करें।
  • शिव महिम्न स्तोत्र पाठ सम्पूर्ण होने के पश्चात आरती करके भगवान को भोग लगाएँ।
  • भोग मे फल, लड्डू, बूंदी, हलवा, खीर या मिस्री आदि भी लगा सकते है।
  • सब कार्य सम्पन्न होने के पश्चात भगवान शिव से क्षमा याचना। व अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए प्रार्थना करें।

Shiv Mahimna stotram

 

।। श्रीगणेशाय नमः ।।

|| शिवमहिम्नस्तोत्रम् ||

श्लोक 1 से 5 अर्थ सहित

महिम्नः पारन्ते परमविदुषो यद्यसदृशी। स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः ॥
अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिमाणावधि गृणन्। ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥1॥

अर्थ: पुष्पदंत कहते हैं कि हे प्रभु ! बड़े बड़े विद्वान और योगीजन आपके महिमा को नहीं जान पाये तो मैं तो एक साधारण बालक हूँ,
मेरी क्या गिनती? लेकिन क्या आपके महिमा को पूर्णतया जाने बिना आपकी स्तुति नहीं हो सकती? मैं ये नहीं मानता क्योंकि अगर
ये सच है तो फिर ब्रह्मा की स्तुति भी व्यर्थ कहलाएगी। मैं तो ये मानता हूँ कि सबको अपनी मति अनुसार स्तुति करने का अधिकार है।
इसलिए हे भोलेनाथ! आप कृपया मेरे हृदय के भाव को देखें और मेरी स्तुति का स्वीकार करें। ( Shiv Mahimna stotram )

अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ्गनसयोः। रतदव्यावृत्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।।
स कस्यस्तोतव्यः कतिविधिगुणः कस्य विषयः । पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥2॥

अर्थ: आपकी व्याख्या न तो मन, न ही वचन द्वारा संभव है। आपके सन्दर्भ में वेद भी अचंभित हैं तथा ‘नेति नेति’ का प्रयोग करते हैं
अर्थात ये भी नहीं और वो भी नहीं। आपकी महिमा और आपके स्वरूप को पूर्णतया जान पाना असंभव है, लेकिन जब आप साकार
रूप में प्रकट होते हो तो आपके भक्त आपके स्वरूप का वर्णन करते नहीं थकते। ये आपके प्रति उनके प्यार और पूज्यभाव का परिणाम है|

सावन 2026 आरम्भ और समाप्त, सोमवार व्रत, व पूजा की सम्पूर्ण विधि

 

मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवतः । स्तवब्रह्मन्किवागपि सुरगुरोविस्मय पदम् ।।
मम त्वेतां वाणों गुणकथनपुण्येन भवतः। पुनामीत्यर्थेऽस्मिन्पुरमथनबुद्धिर्व्यवसिता ॥3॥

अर्थ: हे वेद और भाषा के सृजक! आपने अमृतमय वेदोंकी रचना की है। इसलिए जब देवों के गुरु, बृहस्पति आपकी स्तुति करते है
तो आपको कोई आश्चर्य नहीं होता। मैं भी अपनी मति अनुसार आपके गुणानुवाद करने का प्रयास कर रहा हूँ। मैं मानता हूँ
कि इससे आपको कोई आश्चर्य नहीं होगा, मगर मेरी वाणी इससे अधिक पवित्र और लाभान्वित अवश्य होगी।

तवैश्वर्य तत्तज्जगदुदयरक्षा प्रलयकृत्। त्रयीवस्तुव्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासुतनुषु ॥
अभव्यानामस्मिन्वरद रमणीयामरमणीम्। विहन्तु व्याक्रोशीं विदधतइहैके जडधियः ॥4॥

अर्थ: आप इस सृष्टि के सृजनहार है, पालनहार है और विसर्जनकार है। इस प्रकार आपके तीन स्वरूप है – ब्रह्मा, विष्णु और महेश
तथा आप में तीन गुण है – सत्व, रज और तम। वेदों में इनके बारे में वर्णन किया गया है फिर भी अज्ञानी लोग आपके बारे में उटपटांग
बातें करते रहते है। ऐसा करने से भले उन्हें संतुष्टि मिलती हो, किन्तु यथार्थ से वो मुँह नहीं मोड़ सकते।

किमीहः कि‌ङ्कायः सखलुकिमुपायस्त्रिभुवनम् । किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ॥
अतक्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुः स्थो हतधियः। कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः ॥5॥

अर्थ: मूर्ख लोग अक्सर तर्क करते रहते है कि ये सृष्टि की रचना कैसे हुई, किसकी इच्छा से हुई, किन वस्तुओं से उसे बनाया गया इत्यादि।
उनका उद्देश्य लोगों में भ्रांति पैदा करने के अलावा कुछ नहीं है। सच पूछो तो ये सभी प्रश्नों के उत्तर आपकी दिव्य शक्ति से जुड़े है और
मेरी सीमित बुद्धि से उसे व्यक्त करना असंभव है। ( Shiv Mahimna stotram )

श्लोक 6 से 10 अर्थ सहित

अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां । मधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति ॥
अनीशो वा कुर्याद्भुवनजनने कः परिकरो। यतोमन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥6॥

अर्थ: हे प्रभु, आपके बिना ये सब लोक का निर्माण क्या संभव है? इस जगत का कोई रचयिता न हो, ऐसा क्या संभव है?आपके अलावा
इस सृष्टि का निर्माण भला कौन कर सकता है ?आपके अस्तित्व के बारे केवल मूर्ख लोगों को ही शंका हो सकती है।

त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति । प्रभिन्न प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ॥
रुचीनां वैचित्र्या‌जुकुटिलनानापथजुषां। नृमाणेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥7॥

अर्थ: हे परमपिता! आपको पाने के लिए अनगिनत मार्ग है – सांख्य मार्ग, वैष्णव मार्ग, शैव मार्ग, वेद मार्ग आदि।
लोग अपनी रुचि के अनुसार कोई एक मार्ग को पसंद करते है। मगर आखिरकार ये सभी मार्ग, जैसे अलग अलग
नदियों का पानी बहकर समुद्र में जाकर मिलता है, वैसे ही, आप तक पहुंचते है। सचमुच, किसी भी मार्ग का
अनुसरण करने से आपकी प्राप्ति हो सकती है।

महोक्षः खट्वांग म्परशुरजिनं भस्म फणिनः। कपालंचेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम् ॥
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भव‌द्भद्ध प्रणिहिताम्। न हि स्वात्मारामं विषय मृगतृष्णा भ्रमयति ।। 811

अर्थ: आपके भृकुटी के इशारे मात्र से सभी देवगण एश्वर्य एवं संपदाओं का भोग करते हैं। पर आपके स्वयं के लिए सिर्फ कुल्हाडी,
बैल, व्याघ्रचर्म, शरीर पर भस्म तथा हाथ में खप्पर ! इससे ये फलित होता है कि जो आत्मानंद में लीन रहता है
वो संसार के भोगपदार्थो में नहीं फँसता।

मां बगलामुखी का मंत्र | साधना जाप की सम्पूर्ण विधि, लाभ और महत्व

 

ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वद्ध वमिदम् । परोधौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये ॥
समस्तेऽप्येतस्मिन्पुरमथन तैविस्मित इव। स्तुवज्जिद्देमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता।। 911

अर्थ: इस संसार के बारे में विभिन्न विचारकों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कोई इसे नित्य जानता है तो कोई इसे अनित्य समझता है।
लोग जो भी कहें, आपके भक्त तो आपको हमेंशा सत्य मानते है और आपकी भक्ति में आनंद पाते है। मैं भी उनका समर्थन करता हूँ,
चाहे किसी को मेरा ये कहना धृष्टता लगे, मुझे उसकी परवाह नहीं।

तवैश्वर्यं यत्नाद्यदुपरिविरंचिर्हरिरधः। परिच्छेत्तु यातावनलमनलस्कन्धवपुषः ॥
ततोभक्ति श्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत्। स्तयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ।।10।।

अर्थ: जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच विवाद हुआ की दोनों में से कौन महान है, तब आपने उनकी परीक्षा करने के लिए
अग्निस्तंभ का रूप लिया। ब्रह्मा और विष्णु – दोनों नें स्तंभ को अलग अलग छोर से नापने की कोशिश की मगर वो सफल न हो सके।
आखिरकार अपनी हार मानकर उन्होंने आपकी स्तुति की, जिससे प्रसन्न होकर आपने अपना मूल रूप प्रकट किया। सचमुच,
अगर कोई सच्चे दिल से आपकी स्तुति करे और आप प्रकट न हों एसा कभी हो सकता है भला?

श्लोक 11 से 15 अर्थ सहित

अयत्नादापाद्यत्रिभुवनमवैरव्यतिकरम्। दशास्यो यद्धाहूनभृत रणकण्डूपरवशान् ॥
शिरः पद्मश्रेणोरचितचरणाम्भोरु हबलेः। स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर वियस्फूर्जितमिदम् ॥11॥

अर्थ: आपके परम भक्त रावण ने पद्म की जगह अपने नौ-नौ मस्तक आपकी पूजा में समर्पित कर दिये।
जब वो अपना दसवाँ मस्तक काटकर अर्पण करने जा रहा था तब आपने प्रकट होकर उसको वरदान दिया।
इस वरदान की वजह से ही उसकी भुजाओं में अटूट बल प्रकट हुआ और वो तीनो लोक में शत्रुओं पर विजय
पाने में समर्थ रहा। ये सब आपकी दृढ भक्ति का नतीजा है। ( Shiv Mahimna stotram )

अमुष्य त्वत्सेवा समधिगतसारं भुजवनम्। बलाकैलासेऽपि त्वदधिवसतौविक्रमयतः ॥
अलभ्या पातालेऽप्यलसचलितांगु ष्ठशिरसि । प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः ।।1211

अर्थ: आपकी परम भक्ति से रावण अतुलित बल का स्वामी बन बैठा मगर इससे उसने क्या करना चाहा ? आपकी पूजा के लिए
हर रोज कैलाश जाने का श्रम बचाने के लिए कैलाश को उठाकर लंका में गाढ़ देना चाहा। जब कैलाश उठाने के लिए रावण
ने अपनी भूजाओं को फैलाया तब पार्वती भयभीत हो उठीं। उन्हें भयमुक्त करने के लिए आपने सिर्फ अपने पैर का अंगूठा हिलाया
तो रावण जाकर पाताल में गिरा और वहाँ भी उसे स्थान नहीं मिला। सचमुच, जब कोई आदमी अनधिकृत बल या संपत्ति का स्वामी बन जाता है तो
उसका उपभोग करने में विवेक खो देता है।

य‌द्धि सुत्राम्णो वरद! परमोच्चैरपि सती। मधश्चक्र बाणः परिजनविधेयस्त्रिभुवनः ॥
नतच्चित्रं तस्मिन्वरिवसिरित्वच्चरणयोः । न कस्याप्युन्नत्यं भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥13॥

अर्थ: आपकी कृपा मात्र से ही बाणासुर दानव इन्द्रादि देवों से भी अधिक ऐश्वर्यशाली बन गया तथा तीनो लोकों पर राज्य किया।
हे ईश्वर ! जो मनुष्य आपके चरण में श्रद्धाभक्तिपूर्वक शीश रखता है उसकी उन्नति और समृद्धि निश्चित है।

Hanuman Darshan Prapti Mantra ।। हनुमान दर्शन प्राप्ति मंत्र

 

अकाण्डः ब्रह्माण्ड क्षयचकितदेवासुरकृपा। विधेयस्याऽसीद्यस्त्रिनयन विषं संह तवतः ।।
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो। विकारोऽपिश्लाघ्यो भुवनभयभगंव्यसनिनः ॥14॥

अर्थ: जब समुद्रमंथन हुआ तब अन्य मूल्यवान रत्नों के साथ महाभयानक विष निकला, जिससे समग्र सृष्टि का विनाश हो सकता था।
आपने बड़ी कृपा करके उस विष का पान किया। विषपान करने से आपके कंठ में नीला चिन्ह हो गया और आप नीलकंठ कहलाये।
परंतु हे प्रभु, क्या ये आपको कुरुप बनाता है ? कदापि नहीं, ये तो आपकी शोभा को और बढाता है। जो व्यक्ति औरों के दुःख दूर करता है
उसमें अगर कोई विकार भी हो तो वो पूजा पात्र बन जाता है।

असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे। निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः ।।
स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्। स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः ।। 15।।

अर्थ: कामदेव के वार से कभी कोई भी नहीं बच सका चाहे वो मनुष्य हों, देव या दानव हों। पर जब कामदेव ने
आपकी शक्ति समझे बिना आप की ओर अपने पुष्प बाण को साधा तो आपने उसे तत्क्षण ही भष्म कर दिया।
श्रेष्ठ जनो के अपमान का परिणाम हितकर नहीं होता।

श्लोक 16 से 20 अर्थ सहित

मही पादाघाता‌द्वजति सहसा संशयपदम्। पदं विष्णोर्भाम्यद्भुजपरिधरुग्णग्रहगणम् ॥
मुहुर्योदौस्थ्यं यात्यनिभृतजटाताडिततटा। जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ॥ 16

अर्थ: जब संसार के कल्याण हेतु आप तांडव करने लगते हैं तब समग्र सृष्टि भय के मारे कांप उठती है,
आपके पदप्रहार से पृथ्वी अपना अंत समीप देखती है ग्रह नक्षत्र भयभीत हो उठते हैं। आपकी जटा
के स्पर्श मात्र से स्वर्गलोग व्याकुल हो उठता है और आपकी भुजाओं के बल से वैंकुंठ में खलबली मच जाती है।
हे महादेव! आश्चर्य ही है कि आपका बल अतिशय कष्टप्रद है।

वियद्व्यापीतारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः । प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते ॥
जगद्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति । त्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिमदिव्यं तव वपुः ।।17।।

अर्थ: गंगा नदी जब मंदाकिनी के नाम से स्वर्ग से उतरती है तब नभोमंडल में चमकते हुए सितारों की वजह से
उसका प्रवाह अत्यंत आकर्षक दिखाई देता है, मगर आपके शिर पर सिमट जाने के बाद तो वह एक बिंदु समान दिखाई पडती है।
बाद में जब गंगाजी आपकी जटा से निकलती है और भूमि पर बहने लगती है तब बड़े बड़े द्वीपों का निर्माण करती है। ये आपके दिव्य
और महिमावान स्वरूप का ही परिचायक है।

रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिनगेन्द्रो धनुरथा। रथांगेचन्द्राकों रथचरणपाणिः शर इति ॥
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरत्णमाडम्बर विधिः। विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः ।। 18।।

अर्थ: आपने (तारकासुर के पुत्रों द्वारा रचित) तीन नगरों का विध्वंश करने हेतु पृथ्वी को रथ, ब्रह्मा को सारथी,
सूर्य चन्द्र को दो पहिये मेरु पर्वत का धनुष बनाया और विष्णुजी का बाण लिया। हे शम्भू ! इस वृहत प्रयोजन की
क्या आवश्यकता थी ? आपके लिए तो संसार मात्र का विलय करना अत्यंत ही छोटी बात है। आपको किसी सहायता
की क्या आवश्यकता? आपने तो केवल शक्तियों के साथ खेल किया था, लीला की थी।

दुर्गा सप्तश्र्लोकी पाठ || Durga Saptashloki Path

 

हरिस्ते साहस्त्र कमलबलिमाधाय पदयो। र्यदकोने तस्मिन्निजमुदहर कमलम्॥
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा। त्रयाणां रक्षायं त्रिपुरहर जागति जगताम् ॥19॥

अर्थ: जब भगवान विष्णु ने आपकी सहस्र कमलों (एवं सहस्र नामों) द्वारा पूजा प्रारम्भ की तो उन्होंने एक कमल कम पाया।
तब भक्ति भाव से विष्णुजी ने अपनी एक आँख को कमल के स्थान पर अर्पित कर दिया। उनकी इसी अदम्य भक्ति ने
सुदर्शन चक्र का स्वरूप धारण कर लिया जिसे भगवान विष्णु संसार रक्षार्थ उपयोग करते हैं। हे प्रभु, आप तीनों लोक की रक्षा के लिए सदैव जाग्रत रहते हो।

क्रतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमताम् । क्व कर्म प्रध्वस्तं फलतिपुरुषाराधनमृते ॥
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवम् । श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः ॥20॥

अर्थ: यज्ञ की समाप्ति होने पर आप यज्ञकर्ता को उसका फल देते हो। आपकी उपासना और श्रद्धा बिना किया गया
कोई कर्म फलदायक नहीं होता। यही वजह है कि वेदों में श्रद्धा रखके और आपको फलदाता मानकर हर कोई
अपने कार्यो का शुभारंभ करते है।

श्लोक 21 से 25 अर्थ सहित

क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृतां । सृवीणामात्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः ।।
क्रतुन षस्त्वत्तः क्रतुफल विधानव्यसनिनो । ध्रुवं कर्तुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः ॥ 21 ॥

अर्थ: यद्यपि आपने यज्ञ कर्म और फल का विधान बनाया है तद्यपि जो यज्ञ शुद्ध विचारों और कर्मो से प्रेप्रित न हो और
आपकी अवहेलना करने वाला हो उसका परिणाम कदाचित विपरीत और अहितकर ही होता है इसीलिए दक्षप्रजापति के
महायज्ञ यज्ञ को जिसमें स्वयं ब्रह्मा तथा अनेकानेक देवगण तथा ऋषि-मुनि सम्मिलित हुए, आपने नष्ट कर दिया क्योंकि
उसमें आपका सम्मान नहीं किया गया। सचमुच, भक्ति के बिना किये गये यज्ञ किसी भी यज्ञकर्ता के लिए हानिकारक सिद्ध होते है।

प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्त्वां दुहितरम्। गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुम्ष्यस्य वपुषा ।।
धनुः पाणेर्यातं दिवमपि सपत्नाकृतममुम् । त्रसन्तन्तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः ॥22॥

अर्थ: एक बार प्रजापिता ब्रह्मा अपनी पुत्री पर ही मोहित हो गए। जब उनकी पुत्री ने हिरनी का स्वरुप धारण कर भागने की कोशिश की
तो कामातुर ब्रह्मा भी हिरन भेष में उसका पीछा करने लगे। हे शंकर ! तब आप ने व्याघ्र स्वरूप में धनुष-बाण ले ब्रह्मा को मार भगाया।
आपके रौद्र रूप से भयभीत ब्रह्मा आकाश दिशा में अदृश्य अवश्य हुए परन्तु आज भी वह आपसे भयभीत हैं।

स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह वाय तृणवत्। पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वापुरमथन पुष्पायुधमपि ॥
यदिस्त्रैणं देवो यमनिरतदेहार्ध-घटनाद्। अवैति त्वामद्धावत वरद मुग्धा युवतयः ॥23॥

अर्थ: जब कामदेव ने आपकी तपश्चर्या में बाधा डालनी चाही और आपके मन में पार्वती के प्रति मोह उत्पन्न करने की कोशिश की,
तब आपने कामदेव को तृणवत् भस्म कर दिया। अगर तत्पश्चात् भी पार्वती ये समझती है कि आप उन पर मुग्ध है क्योंकि
आपके शरीर का आधा हिस्सा उनका है, तो ये उनका भ्रम होगा। सच पूछो तो हर युवती अपनी सुंदरता पे मुग्ध होती है।

kali mata darshan mantra ।। काली माता दर्शन साधना विधि सहित

 

श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचराः। चिता-भस्मालेपः स्रगपि नृकरोटी-परिकरः ।।
अमंगल्यं शीलं तव भवतु ना मैवमखिलम्। तथापि स्मर्तृणां वरद परमं मंगलमसि ।। 24।।

अर्थ: आप श्मशान में रमण करते हैं, भूत – प्रेत आपके मित्र हैं, आप चिता भष्म का लेप करते हैं तथा मुंडमाल धारण करते हैं।
ये सारे गुण ही अशुभ एवं भयावह जान पड़ते हैं। तब भी हे श्मशान निवासी ! उन भक्तों जो आपका स्मरण करते है,
आप सदैव शुभ और मंगल करते है। ( Shiv Mahimna stotram )

मनः प्रत्यविचत्त सविधमवधायात्तमरुतः। प्रहष्यद्रोमाणः प्रमदसलिल्लोत्संगितदृशः ।।
यदालोक्याह लावं हृद इव निमज्ज्यामृतमये। यधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत्किल भवान् ॥25॥

अर्थ: आपको पाने के लिए योगी क्या क्या नहीं करते ? बस्ती से दूर, एकांत में आसन जमाकर, शास्त्रों में बताई गई
विधि के अनुसार प्राण की गति को नियंत्रित करने की कठिन साधना करते है और उसमें सफल होने पर हर्षाश्रु बहाते है।
सचमुच, सभी प्रकार की साधना का अंतिम लक्ष्य आपको पाना ही है।

श्लोक 26 से 30 अर्थ सहित

त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वंहुतवह। स्त्वमापरत्वं व्योमत्वमुधरणिरात्मा त्वमिति च ॥
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता ब्रिश्वतिगिरम्। न विद्यस्तत्तत्वंवयमिह तु यत्त्वं न भवसि ॥26॥

अर्थ: आप ही सूर्य, चन्द्र, धरती, आकाश, अग्नि, जल एवं वायु हैं। आप ही आत्मा भी हैं। हे देव!! मुझे ऐसा कुछ भी ज्ञात नहीं जो आप न हों।

त्रयीं तिस्रो वृत्तिस्त्रि भुवनमथोत्रीनपिसुरां। नकाराद्यं र्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत्तीर्णविकृतिः ।।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः। समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गुणात्योमिति पदम् ॥27॥

अर्थ: हे सर्वेश्वर! ॐ शब्द अ, ऊ, म से बना है। ये तीन शब्द तीन लोक स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल; तीन देव –
ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा तीन अवस्था – स्वप्न, जागृति और सुषुप्ति के द्योतक है। लेकिन जब पूरी तरह से
ॐ कार का ध्वनि निकलता है तो ये आपके तुरीय पद को अभिव्यक्त करता है।

भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सह महां स्तथा। भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम् ॥
अमुष्मिन्प्रत्येकं प्रविचरति देवः श्रुतिरपि । प्रियायास्मैधाम्नेप्रणिहितनमस्योऽस्मि भवते ॥28॥

अर्थ: वेद एवं देवगण आपकी इन आठ नामों से वंदना करते हैं भव, सर्व, रूद्र, पशुपति, उग्र, महादेव,
भीम, एवं इशान। हे शम्भू! मैं भी आपकी इन नामों की भावपूर्वक स्तुति करता हूँ।

Rin Mochan Mangal Stotra || कर्ज की समस्या से मिलेगा छुटकारा

 

नमोनेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमो। नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः ॥
नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमो। नमः सर्वस्मै ते तदिदमिति शर्वाय च नमः ॥29॥

अर्थ: आप सब से दूर हैं फिर भी सब के पास है। हे कामदेव को भस्म करनेवाले प्रभु ! आप अति सूक्ष्म है फिर भी विराट है।
हे तीन नेत्रोंवाले प्रभु! आप वृद्ध है और युवा भी है। आप सब में है फिर भी सब से पर है। आपको मेरा प्रणाम है।

बहुलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः । प्रबलतम से तत्संहारे हराय नमो नमः ॥
जनसुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौमृडाय नमो नमः । प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः ॥30॥

अर्थ: मैं आपको रजोगुण से युक्त सृजनकर्ता जान कर आपके ब्रह्मा स्वरूप को नमन करता हूँ। तमोगुण को धारण करके
आप जगत का संहार करते हो, आपके उस रुद्र स्वरूप को मैं नमन करता हूँ। सत्वगुण धारण करके आप लोगों के सुख
के लिए कार्य करते हो, आपके उस विष्णु स्वरूप को नमस्कार है। इन तीनों गुणों से पर आपका त्रिगुणातीत स्वरूप है,
आपके उस शिव स्वरूप को मेरा नमस्कार है। ( Shiv Mahimna stotram )

श्लोक 31 से 35 अर्थ सहित

कृशपरिणतिचेतः क्लेशवश्वं क्व चेदम् । क्व च तव गुणसीमोल्लङ् घिनीशश्ववृद्धिः ।।
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्। वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम् ॥31॥

अर्थ: मेरा मन शोक, मोह और दुःख से संतप्त तथा क्लेश से भरा पड़ा है। मैं दुविधा में हूँ कि ऐसे भ्रमित मन से मैं आपके दिव्य
और अपरंपार महिमा का गान कैसे कर पाउँगा ? फिर भी आपके प्रति मेरे मन में जो भाव और भक्ति है उसे अभिव्यक्त किये
बिना मैं नहीं रह सकता। अतः ये स्तुति की माला आपके चरणों में अर्पित करता हूँ।

असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे । सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी ।।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं। तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥32॥

अर्थ: यदि समुद्र को दवात बनाया जाय, उसमें काले पर्वत की स्याही डाली जाय, कल्पवृक्ष के पेड की शाखा को लेखनी
बनाकर और पृथ्वी को कागज़ बनाकर स्वयं ज्ञान स्वरूपा माँ सरस्वती दिनरात आपके गुणों का वर्णन करें तो भी आप के
गुणों की पूर्णतया व्याख्या करना संभव नहीं है।

असुरसुरमुनीन्द्रं रचितस्येन्दुमौले। ग्रंथित गुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य॥
सकलगुणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानो। रुचिरमलघुवृत्तेः स्तोत्रमेतच्चकार ॥33॥

अर्थ: आप सुर, असुर और मुनियों के पूजनीय है, आपने मस्तक पर चंद्र को धारण किया है और आप सभी गुणों से परे है।
आपकी इसी दिव्य महिमा से प्रभावित होकर मैं, पुष्पंदत गंधर्व, आपकी स्तुति करता हूँ।

अहरहरनवद्य धूर्जटेः स्तोत्रमेतत् । पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान्यः ।।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र। प्रचुरतरधनायुः पुत्रवान्कीर्तिमांश्च ॥34॥

अर्थ: पवित्र और भक्तिभावपूर्ण हृदय से जो मनुष्य इस स्तोत्र का नित्य पाठ करेगा, तो वो पृथ्वीलोक में अपनी इच्छा के अनुसार धन,
पुत्र, आयुष्य और कीर्ति को प्राप्त करेगा। इतना ही नहीं, देहत्याग के पश्चात् वो शिवलोक में गति पाकर शिवतुल्य शांति का अनुभव करेगा।
शिवमहिम्न स्तोत्र के पठन से उसकी सभी लौकिक व पारलौकिक कामनाएँ पूर्ण होंगी।

महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः। अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥35॥

श्लोक 36 से 40 अर्थ सहित

अर्थ: शिव से श्रेष्ठ कोइ देव नहीं, शिवमहिम्न स्तोत्र से श्रेष्ठ कोइ स्तोत्र नहीं है, भगवान शंकर के नाम से अधिक महिमावान कोई मंत्र नहीं है
और ना ही गुरु से बढकर कोई पूजनीय तत्व।

दीक्षादानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः। महिम्नस्तव पाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ 36॥

अर्थ: शिवनहिम्न स्तोत्र का पाठ करने से जो फल मिलता है वो दीक्षा या दान देने से, तप करने से, तीर्थाटन करने से,
शास्त्रों का ज्ञान पाने से तथा यज्ञ करने से कहीं अधिक है। ( Shiv Mahimna stotram )

कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः। शशिधरवरमौलेर्देवदेवस्य दासः ।।
स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्। स्तवनमिदमकार्षीवृदिव्यदिव्यं महिम्नः ॥37॥

अर्थ: पुष्पदन्त गंधर्वों का राजा, चन्द्रमौलेश्वर शिव जी का परम भक्त था। मगर भगवान शिव के क्रोध की वजह से
वह अपने स्थान से च्युत हुआ। महादेव को प्रसन्न करने के लिए उसने ये महिम्नस्तोत्र की रचना की है।

सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुम् । पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्यचेतः ।।
ग्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः। स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥38॥

अर्थ: जो मनुष्य अपने दोनों हाथों को जोड़कर, भक्तिभावपूर्ण, इस स्तोत्र का पठन करेगा, तो वह स्वर्ग-मुक्ति देनेवाले,
देवता और मुनिओं के पूज्य तथा किन्नरों के प्रिय ऐसे भगवान शंकर के पास अवश्य जायेगा। पुष्पदंत द्वारा रचित
यह स्तोत्र अमोघ और निश्चित फल देनेवाला है।

आसमाप्त मिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्व-भाषितम्। अनौपम्यं मनोहारि सर्व मीश्वर वर्णनम् ॥39॥

अर्थ: पुष्पदंत गन्धर्व द्वारा रचित, भगवान शिव के गुणानुवाद से भरा, मनमोहक, अनुपम और पुण्यप्रदायक स्तोत्र यहाँ पर संपूर्ण होता है।

इत्येषा वाङ्गयी पूजा श्रीमच्छङ्ङ्कर-पादयोः। अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः ॥40॥

अर्थ: वाणी के माध्यम से की गई मेरी यह पूजा आपके चरणकमलों में सादर अर्पित है। कृपया इसका स्वीकार करें
और आपकी प्रसन्नता मुझ पर बनाये रखें।

श्लोक 41 से 43 अर्थ सहित

तव तत्त्वं न जानामि कीदृ‌शोऽसि महेश्वर। यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः ॥41॥

अर्थ: हे शिव!! मैं आपके वास्तविक स्वरुप् को नहीं जानता। लेकिन आप जैसे भी है, जो भी है, मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः। सर्वपाप-विनिर्मुक्तः शिव लोके महीयते ॥42।।

अर्थ: जो इस स्तोत्र का दिन में एक, दो या तीन बार पाठ करता है वह सर्व प्रकार के पाप से
मुक्त हो जाता है तथा शिव लोक को प्राप्त करता है। ( Shiv Mahimna stotram )

श्री पुष्पदन्त-मुख-पङ्कज-निर्गतेन। स्तोत्रेण किल्विष-हरेण हर-प्रियेण ।।
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन । सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः ।।43।।

अर्थ: पुष्पदंत के कमलरूपी मुख से उदित, पाप का नाश करनेवाली, भगवान शंकर की अतिप्रिय
यह स्तुति का जो पठन करेगा, गान करेगा या उसे सिर्फ अपने स्थान में रखेगा, तो भोलेनाथ शिव
उन पर अवश्य प्रसन्न होंगे

।। इति श्री पुष्पदंत विरचितं शिवमहिम्नः स्तोत्रं समाप्तम् ।।

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