शिव महामृत्युंजय कवच : हिन्दी में सम्पूर्ण, पूजा विधि और लाभ

शिव महामृत्युंजय कवच : हिन्दी में सम्पूर्ण, पूजा विधि और लाभ

भगवान शिव को‌ प्रसन्न करने के लिए वैसे तो बहुत सारे उपाय है, जैसे पंचाक्षर मंत्र ” ॐ नम: शिवाय,
शिव स्तुति, चालीसा और स्त्रोत। इसके अतिरिक्त भी एक ऐसा उपाय है, जिसे भगवान शिव प्रसन्न होते है।
और आपकी हर प्रकार से रक्षा करते है। वह साधन है, ” शिव महामृत्युंजय कवच “, इसके स्मरण मात्र से मन
को शांति मिलती है, और दसों दिशाओं से सुरक्षा प्राप्त होती है।

शिव महामृत्युंजय कवच क्या है।

महामृत्युंजय मंत्र व कवच के रचियता महाऋषि मार्कण्डेय जी है। इसके पीछे भी एक कहानी है, जो आप सब को ज्ञात है।
ऋषि मार्कण्डेय जी ने यमराज से रक्षा हेतु, ‌भगवान शिव‌ को प्रसन्न करने के लिए,‌ महामृत्युंजय मंत्र व कवच का जाप किया था।
जिसे भगवान शिव प्रसन्न होकर, ऋषि मार्कण्डेय कि यमराज जी से रक्षा करते हैं। महामृत्युंजय कवच भगवान शिव का ही एक स्वरुप है।

कवच पाठ की विधि

  • महामृत्युंजय कवच पाठ करने से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें।
  • भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग के सामने उतर दिशा की तरफ मुख करके पाठ आरंभ करे।
  • कवच पाठ आरंभ करने‌ से पहले संकल्प अवश्य ले।
  • देसी घी या तिल के तेल का दिपक लगाए। धूप और अगरबत्ती भी अवश्य लगा ले।
  • कवच पाठ आरंभ करने से पहले गणेश वंदना करे।
  • महामृत्युंजय पाठ आरंभ करने से पहले भगवान शिव व पाठ के प्रति अटूट आस्था और विशवास होना चाहिए।
  • कवच पाठ के साथ महामृत्युंजय मंत्र का जाप व महामृत्युंजय यंत्र पूजन भी करना चाहिए।

महामृत्युंजय कवच के लाभ

  • शिव महामृत्युंजय कवच के नियमित रूप से 21 दिनो तक पाठ करने से भगवान शिव की विषेश कृपया प्राप्त होती है।
  • नकारात्मक विचारों और नकारात्मक शक्तियाँ से छुटकारा मिलता है।
  • रोजाना इस कवच का पाठ करने से आप स्वस्थ रहते है। और मन को शांति मिलती है।
  • महामृत्युंजय कवच के पाठ से भय और चिंता से मुक्ति मिलती है।
  • इस कवच का पाठ करने‌ से पापो का‌ क्षय होता है।

शिव महामृत्युंजय कवच

भैरव उवाच

शृणुष्व परमेशानिं कवचं मन्मुखोदितम्।
महामृत्युञ्जयस्यास्य न देवं परमाद्भुतम् ॥ १ ॥

अर्थ :- श्री भैरव जी ने कहा-हे महेश्वरि ! इस परम् ऐश्वर्यवान् कवच को मेरे मुख से सुनो।
इस अद्भुत महामृत्युञ्जय कवच को किसी को न दे।

यं धृत्वा च पठित्वा च यं श्रुत्वा कवचोत्तमम्।
त्रैलोक्याधिपतिर्भूत्वा सुखितोऽस्मि महेश्वरि ॥ २ ॥

अर्थ :- इस उत्तम कवच को जो धारण करे, पढ़े या सुनेगा
वह त्रैलोक्य का मालिक होकर सुख से रहेगा।

तदेव वर्णयिष्यामि तव प्रीत्या वरानने।
तथापि परमं तत्त्वं न दातव्यं दुरात्मने ॥ ३ ॥

अर्थ :- हे वरानने ! उसका वर्णन तुम्हारी प्रीति देखकर करता हूँ।
यह परम तत्व है किसी भी दुरात्मा को नहीं देना बताना चाहिए।

कवच पाठ आरंभ :-

ध्यानं चन्द्र मण्डल मध्यस्थे रुद्र माले विचित्रिते। तत्रस्थं चिन्तयेत्साध्यं मृत्युंमाप्नोति जीविति ॥ 1 ॥

ॐ जूं सः शिरः पातु देवो मृत्युञ्जयोमम । श्री शिवो वै ललाटं च ॐ ह्रौं ध्रुवौ सदाशिवः ॥ 2 ॥

नीलकण्ठोऽवतान्नेत्रे कपर्दीमेवताच्छ्रुती। त्रिलोचनोऽवताद्गण्डौ नासा में त्रिपुरान्तकः ॥ 3॥

मुखं पीयूपघट् भृदोष्ठौ में कृतिकाम्बरः । हनुं में हाटकेशानो मुखं बटुकभैरवः ॥4॥

कन्धरां कालमथनो गलं गणप्रियोऽवतु । स्कंन्धौ स्कंदपितापातु हस्तौ में गिरिशोवतु ॥ 5 ॥

नखान्मे गिरिजानाथः पायादङ्गुलि संयुतान्। स्तनौ तारापतिः पातु वक्षः पशुपतिर्मम ॥ 6 ॥

कुक्षिं कुबेरवदः पार्श्वों मे मारशासनः । शर्व पातु तथा नाभिं शूली पृष्ठं ममावतु ॥ 7 ॥

शिश्नं में शंकरः पातु गुह्यं गुह्यकवल्लभः । कटिं कालान्तक पायाद् उरुमेंधकघातनः ॥ 8 ॥

जागरूकोऽवताज्जानू जड्ये मे कालभैरवः । गुल्फौ पायाज्ञ्जदाधारी-पादौ मृत्युञ्जयो ऽवतु ॥ 9 ॥

पादादि मूर्द्धापर्यन्तं सद्योजातो ममावतु । रक्षाहीनं नामहीनं वपुः पात्वमृतेश्वरः ॥ 10 ॥

पूर्वे बलविकरणो दक्षिणे कालशासनः । पश्चिमे पार्वतीनाथ उत्तरे मां मनोन्मनः ॥ 11 ॥

नाथ, उत्तर में मनोन्मन । ऐशान्यामीश्वरं पायादाग्नेयामग्निलोचनः । नैऋत्यां शंभुरव्यान्मां वायव्यां वायुवाहनः ॥ 12 ॥

ऊर्ध्व बलप्रमथनः पाताले परमेश्वरः । दश दिक्षु सदा पातु महामृत्युञ्जयश्चमाम् ॥ 13 ॥

रणे राजकुले द्यूते विषमे प्राणसंशये । पायादों जूं महारुद्रो देवदेवो दशाक्षर ॥ 14 ॥

प्रभाते पातु मां ब्रह्मा मध्यान्हे भैरवोऽवतु । सायं सर्वेश्वरः पातु निशायां नित्यचेतनः ॥ 15 ॥

अर्द्धरात्रे महादेवो निशान्ते मां महोदयः । सर्वदा सर्वतः पातु ॐ जूं सः ह्रौं मृत्युञ्जयः ॥ 16 ॥

इतीदं कवचं पुणयं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् । सर्वमंत्रमयं गुह्यं सर्वतंत्रेषु गोपितम् ॥ 17 ॥

पुण्यं पुणयप्रदं दिव्यं देवदेवाधिदैवतम् । य इदं च पठेन्मंत्र कवचं वाचयेत्ततः ॥ 18 ॥

तस्य हस्ते महादेवि त्र्यंबकस्याष्टसिद्धयः । रणे धृत्वा चरेयुद्धं हत्वाशत्रू जयं लभेत् ॥ 19 ॥

जपं कृत्वा गृहे देवि स प्राप्स्याति सुखं पुनः । महाभये महारोगे महामारीभये तथा ॥ 20 ॥

दुर्भिक्षे शत्रु संहारे पठेत्कवचमादरात् । सर्वं तत्प्रशमं याति मृत्युञ्जय प्रसादतः ॥ 21 ॥

धनं पुत्रान्सुखं लक्ष्मींमारोग्यं सर्वसम्पदः । प्राप्नोति साधकः सद्यो देवि सत्यं न संशयः ॥ 22 ॥

इतीदं कवचं पुण्यं महामृत्युञ्जयस्य तु । गोप्यं सिद्धिप्रदं गुह्यं गोपनीयं स्वयोनिवत् ॥ 23 ॥

महामृत्युंजय कवच हिन्दी

  1. चन्द्रमण्डल मध्य में धारण किए हुए विचित्र माला धारण किए रुद्र का जो चिन्तन करता है
    उसे मृत्यु प्राप्त होने पर भी जीवन मिल जाता है।
  2. ॐ जूं सः ह्रौं बीजरूपी शिव शिर में निवास करें श्री शिव ललाट में, ॐ सदाशिव भौंः में।
  3. नीलकण्ठ नेत्रों में, कपर्दी कानों में। गण्डस्थ में त्रिलोचन, नासा में त्रिपुरांतक।
  4. मुख में अमृतघट रूपी शिव, ओष्ठों में कृत्तिकाम्बर। ठोड़ी में हाटकेश्वर, मुख में बटुक भैरवः ।
  5. कन्धे में कालमथन, गले में गणप्रिय। स्कंधप्रदेश में स्कंदपिता, हाथ में गिरीश।
  6. पादो की संयुक्त अंगुलिसहित नखों में गिरिजानाथ। स्तनों में तारापति, वक्षस्थल में पशुपति।
  7. कुक्षि में वर देने वाले कुबेर, पार्श्व मंडल में मारशासन। नाभि स्थान में शर्व, पृष्ठ स्थान में शूली।
  8. लिंग स्थान में शंकर, गुदा स्थान में गुह्यकबल्लभ। कटि में कालान्तक, ऊरू में अंधक घात।
  9. जानु में जागरूक, जंघाओं में कालभैरव। गुल्फ स्थान में जटाधारी, पादस्थान में मृत्युञ्जय।
  10. पाद से मूर्द्धा पर्यन्त सद्योजात। रक्षाहीन, नामहीन शरीर का अमृतेश्वर ।
  11. पूर्वे बलविकरण, दक्षिणे कालशासन, पश्चिम में पार्वती
  12. ऐशान्य दिशा में ईश्वर। आग्नेय में अग्निलोचन। नैऋत्य में शंभु। वायव्य में वायुवाहन ।
  13. ऊर्ध्व स्थान का बलप्रमथन, पाताल का परमेश्वर, दशो दिशाओं की रक्षा महामृत्युञ्जय करें।
  14. रणे-राजकुल में, जूवा, विषम समय, प्राणसंकट के समय। ॐ जूं महारूद्रो देवदेवो दशक्षर रूप रक्षा करें।
  15. प्रभात समय ब्रह्मा, मध्याह्न में भैरव, सायंकाल सर्वेश्वर, रात्रिकाल में नित्यचेतन रूप रक्षा करें।
  16. अर्धरात्रि में महादेव, निशा के अन्त में महोदय। सर्वदा सब स्थानों में ॐ जूं सः ह्रौं यह मृत्युञ्जय मन्त्रात्मक देव रक्षा करें।
  17. यह तीनों लोकों में पुण्यप्रद दुर्लभ मृत्युञ्जय कवच सर्वमन्त्रमय गुप्त से भी गुप्त तीनों लोकों में हैं।
  18. यह पुण्य से भी पुण्यप्रद दिव्य देवो में देवाधिपति मृत्युञ्जय का मन्त्र कवच का पाठ करें।
  19. उके हाथ में हे महादेवि ! त्र्यंबक की अष्टसिद्धि प्राप्त होती है। युद्ध में धारण करने से, युद्ध में
    विचरता हुआ शत्रुओं का नाश करके जय प्राप्त करता है।
  20. जय प्राप्त करके, गृह में पुनः सुख जिस प्रकार मिलता है। महाभय, महारोग, महामारी भय से।
  21. दुर्भिक्ष, शत्रुसंहार के समय इस कवच का आदर-सम्मान के साथ पाठ करें।
  22. धन-पुत्र-सुख, लक्ष्मी सुख, आरोग्य सुख सर्व सम्पत्ति का सुख साधक को प्राप्त होता रहता है
    यह कवच सदैव-सर्वत्र फलकारी है इसमें संशय नहीं है।
  23. यह महापुण्यकारी गुप्त सिद्धिप्रद गोपनीय महामृत्युञ्जय कवच उस तरह से गुप्त रखने योग्य है
    जिस तरह अपनी योनि को गुप्त रखा जाता है।

श्री महामृत्युंजय यंत्र 

शिव महामृत्युंजय कवच हिंदी में पढ़ें। संपूर्ण पाठ, पूजा विधि, नियम, लाभ और कवच पाठ

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