Durga mata kavach path || हर तरफ से रक्षा होगी |

दुर्गा मां कवच पाठ।। Durga mata kavach path

 

Durga mata kavach path

पाठकों आज हम आपको ” Durga mata kavach path ” और कीलकम् स्त्रोत्रं के बारे मे बताने जा रहे है ! दुर्गा कवच का पाठ करने से क्या फल प्राप्त होते है ? इसके पाठ करने से आप हमेशा रोगों से मुक्त रहते है। आप जहाँ भी जाएंग विजय प्राप्त होगी। मां दुर्गा सदैव आपकी रक्षा करेगी। आप किसी भी संकट मे फस गये हों। घर मे क्लेश रहता है। आपके परिवार का कोई सदस्य सदैव बिमार रहता हो, तो दुर्गा कवच पाठ करने से सब दुख दूर हो जाएंग । मां दुर्गा की सम्पूर्ण शक्ति स्वरूपा देवियाँ आपकी चारो और से रक्षा करेगी। और आपका सदैव मंगल होगा। जय मां दुर्गा ।

दुर्गा माता कवच पाठ, ( Durga mata kavach path )

पाठकों दुर्गा माता का कवच पाठ ! भगवान ब्रह्म जी द्वारा रचा गया था। जब महर्षि मार्कंडेय जी लोग कल्याण हेतु ! भगवान ब्रह्मा जी से पूछते है ? कि हे ब्रह्म देव मुझे ऐसा गुप्त व शक्तिशाली को ‌उपाय बताये जो आपने अब तक किसी को भी प्रकट न किया हो ? और सब का कल्याण करने वाला हो ? तब ब्रह्म जी दुर्गा कवच पाठ को बताते है ! और वह कहते है। इसे गुप्त व शक्तिशाली और कुछ नही है। जो कलयुग मे मुक्ति पाने का सब से सहज मार्ग होगा।

दुर्गा माता कवच पाठ के लाभ

1. पाठकों दुर्गा कवच पाठ करने से शक्ति स्वरुपा सम्पूर्ण देवियाँ आपकी चारो और से रक्षा करती है।

2. आप जहाँ भी जाएंग, आपको मान सम्मान प्राप्त होगा।

3. आपके घर मे लक्ष्मी मां का सदैव वास रहेगा।

4. हमेशा आपके‌ घर मे सुख शांति बनी रहेगी।

5. किसी भी तरहा का किया कराया ! भूत प्रेत ! जादू टोना ! तंत्र मंत्र जैसी तांत्रिक क्रिया ? आपके घर पर असर नही करेंगी ! यदि इनमे से कुछ भी पहले से है ! तो वह पाठ करने मात्र से नष्ट हो जाएगी।

6. यदि आप ग्रह दशा से पीडित है। तो  कवच पाठ मात्र से दूर हो जाएगी।

दुर्गा कवच पाठ लाभ 

8. आपका व्यापार घाटे मे जा रहा है। तो दुर्गा कवच पाठ करने से बचाया जा सकता है।

9. आपके परिवार का कोई भी सदस्य सदैव बिमार रहता है ! तो यदि वह दुर्गा कवच पाठ कर ले, तो सारे रोगो से मुक्त हो जाता है।

10. यदि आप कोई भी साधना कर रहे है ? या फिर करना चाहते है ? तो उसे पहले दुर्गा कवच पाठ कर ले, तो आपको 100% सफलता प्राप्त होती है।

11. यदि आपके विवाह को काफी वर्ष बीत चुके है ? कोई भी संतान नही है ? तो प्रतिदिन सुबह दुर्गा कवच पाठ व कीलकम् स्त्रोत्रं का पाठ करने से शीध्र ही संतान प्राप्त होगी।

12. पाठकों यदि आप‌ मां दुर्गा का कवच पाठ का प्रतिदिन ! उच्च स्वर से पाठ करते है। तो आपके साथ आपके परिवार के सभी सदस्य तर जाते है।

दुर्गा कवच पाठ विधि

पाठकों दुर्गा मां के चित्र के संमुख देसी घी का दिपक जलाए ! धूप व अगरबत्ती भी लगाए।  कवच पाठ आरम्भ करने से पूर्व संकल्प करें। और पाठ आरम्भ करें। दुर्गा कवच ! पाठ करने के तुरंत बाद कीलकम् स्त्रोत्रं का पाठ अवश्य करें। यदि आप ऐसा नही करते तो, आपको दुर्गा कवच पाठ का पूर्ण फल प्राप्त नही होगा। प्रतिदिन पाठ आरम्भ करने से पूर्व अपने पित्तर देव व कुल देवी देवता को‌ स्मरण करें।

दुर्गा माता कवच पाठ A

ॐ चण्डिका देवीको नमस्कार है ।

मार्कण्डेय जी ने कहा पितामह ! जो इस संसार में परम गोपनीय तथा मनुष्यों की सब प्रकारसे रक्षा करने वाला हैं ? और जो अबतक आपने दूसरे किसीके सामने प्रकट नहीं कियां हो ? ऐसा कोई साधन मुझे बताइये ॥ १ ॥

ब्रह्माजी बोले ब्रह्मन्‌ ! ऐसा साधन तो एक देवी का कवच ही है ! जो गोपनीय से भी परम गोपनीय, पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियों का उपकार करने वाला है । महामुने ! उसे श्रवण करो ॥ २ ॥

देवीकी नौ मूर्तियाँ हैं ! जिन्हें “नददुर्गो’ कहते हैं। उनके पृथक्‌-पृथक्‌ नाम बतलाये जाते हैं ! प्रथम नाम “शैलपुत्री” है ! दूसरी मूर्तिका नाम “ब्रह्मचारिणीर” है ! तीसरा स्वरूप “चन्द्रघण्टार्के” नामसे प्रसिद्धि है ! चौथी मूर्तिको कूष्माष्डा कहते हैं ! पाँचवीं दुर्गाका नाम “स्कन्दमाता” है ! देवीके छठे रूपको “कात्यायनी” कहते हैं ! सातवाँ “कालरात्रि” ! और आठवाँ स्वरूप “महागौरी” के नामसे प्रसिद्ध है ! नवीं दुर्गाका नाम “सिद्धिदात्री” है ! ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेद भगवान के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं॥ ३–५॥

जो मनुष्य अग्निमें जल रहा हो ! रणभूमि में शत्रुओं से घिर गया हो ! विषम संकटमें फँस गया हो ! तथा इस प्रकार भयसे आतुर होकर जो भगवती दुर्गाकी शरण में प्राप्त हुए हों ! उनका कभी कोई अमंगल नहीं होता ! युद्धके समय संकटमें पड़ने पर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं दिखायी देती ! उन्हें शोक, दुःख और भय की प्राप्ति नहीं होती ॥ ६–७॥

दुर्गा माता कवच पाठ B

जिन्होंने भक्तिपूर्वक देवीका स्मरण किया है ! उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है। देवेश्र्ववरि ! जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं ! उनकी तुम ‘निःसंदेह रक्षा करती हो ॥८॥

चामुण्डा देवी प्रेतपर आरूढ़ होती हैं ! वाराही भैंसेपर सवारी करती हैं ! ऐन्द्रीका वाहन ऐरावत हाथी है ! वैष्णवी देवी गरुड़ पर ही आसन जमाती हैं ॥ ९॥

माहेश्वरी वृषभपर आरूढ़ होती हैं ! कौमारी का वाहन मयूर है ! भगवान्‌ विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी देवी कमल के आसनपर विराजमान हैं ! और हाथोंमें कमल धारण किये हुए हैं ॥१०॥

वृषभपर आरूढ़ ईश्वरी देवीने श्वेत रूप धारण कर रखा है। ब्राह्मी देवी हसपर बैठी हुई हैं और सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हैं ॥ ११॥

इस प्रकार ये सभी माताएँ सब प्रकार की योगशक्तियों से सम्पन्न हैं। इनके सिवा और भी बहुत-सी देवियाँ हैं, जो अनेक प्रकारके आभूषणों की शोभासे युक्त तथा नाना प्रकारके रत्नों से सुशोभित हैं ॥ १२ ॥

ये सम्पूर्ण देवियों क्रोथमें भरी हुई हैं, और भक्तोंकी रक्षाके लिये रथपर बैठी दिखायी देती हैं। ये शू्ज, चक्र, गदा, शक्ति, हल और मुसल, खेटक और तोमर, परशु तथा पाश, कुन्त और त्रिशूल एवं उत्तम शार्डधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथों में धारण करती हैं। दैत्योंके शरीरका नाश करना, भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना यही उनके शस्त्र-धारण का उद्देश्य है ॥१३-१५॥।

[ कक्च आरम्भ करनेके पहले इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये ] महान्‌ रौद्ररूप, अत्यन्त घोर पराक्रम, महान्‌ बल और महान्‌ उत्साहवाली देवि ! तुम महान्‌ भय का नाश करनेवाली हो, तुम्हें नमस्कार है ॥१६॥

दुर्गा माता कवच पाठ C 

तुम्हारी ओर देखना भी कठिन है। शत्रुओं का भय बढ़ाने वाली जगदम्बिके ! मेरी रक्षा करो। पूर्व दिशा में ऐन्द्री (इन्द्रशक्ति) मेरी रक्षा करे। अग्निकोणमें अग्निशक्ति, दक्षिण दिशा में वाराही तथा नैऋत्यकोण में खड्गधारिणी मेरी रक्षा करे । पश्चिम दिशा में वारुणी और वायव्यकोण में मृगपर सवारी करनेवाली देवी मेरी रक्षा करे ॥१७-१८॥

उतरदिशा में कौमारी और ईशान-कोण में शूलधारिणी देवी रक्षा करे। ब्रह्मणि ! तुम ऊपर की ओर से मेरी रक्षा करो और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करे ॥१९॥

इसी प्रकार शव को अपना वाहन बनाने वाली चामुण्डा देवी दसो दिशाओं में मेरी रक्षा करे ।
जया आगे से और विजया पीछे की ओर से मेरी रक्षा करें ॥२०॥

वाम भाग में अजिता और दक्षिण भाग में अपराजिता रक्षा करे । उद्योतिनी शिखा की रक्षा करे। उमा मेरे मस्तक पर विराजमान होकर रक्षा करे ॥२१॥।

ललाट में मालाधरी रक्षा करे और यशस्विनी देवी मेरी भौंहों का संरक्षण करे । भौंहों के मध्यभाग में त्रिनेत्रा और नथुनों की यमघण्टा देवी रक्षा करे ॥२२॥

दोनों नेत्रों के मध्यभाग में शाखिंनी और कानों में द्वारवासिनी रक्षा करे । कालिका देवी कपोलों की तथा भगवती शांकरी कानों के मूलभाग की रक्षा करे ॥२३॥

नासिकामें सुगन्धा और ऊपर के ओठमें चर्चिका देवी रक्षा करे। नीचे के ओठमें अमृतकला तथा जिह्लां में सरस्वती देवी रक्षा करे ॥२४॥।

कौमारी दाँतों की और चण्डिका कण्ठ प्रदेश की रक्षा करे। चित्रघण्टा गले की घाँटी की और महामाया तालुमें रहकर रक्षा करे ॥ २५॥

कामाक्षी ठोढ़ी की और सर्वमड़्ला मेरी वाणी की रक्षा करे। भद्रकाली ग्रीवामें और धनुर्घरी पृष्ठवेश (मेरुदण्ड) में रहकर रक्षा करे॥ २६॥

कण्ठ के बाहरी भाग में नील ग्रीवा और कण्ठ की नलीमें नलकूंबरी रक्षा करे। दोनों कंधों में खड्गिनी और मेरी दोनों भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करे ॥ २७ ॥

Durga mata kavach path D

दोनों हाथों में दण्डिनी और अंगुलियों में अम्बिका रक्षा करे। शूलेधरी नखोंकी रक्षा करे । कुलेश्वरी कुक्षि (पेट) में रहकर रक्षा करे ॥ २८ ॥

महादेवी दोनों स्तनोंकी और शोकविनाशिनी देवी मनकी रक्षा करे। ललिता देवी हदयमें और शूलधारिणी उदरमें रहकर रक्षा करे ॥ २९ ॥

नाभिमें कामिनी और गुह्मभागकी गुह्योश्ररी रक्षा करे। पूतना और कामिका लिंग की और महिषवाहिनी गुदाकी रक्षा करे ॥ ३० ॥

भगवती कटि भाग में और विन्ध्यवासिनी घुटनो की रक्षा करे। सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली महाबला देवी दोनों पिण्डलियॉं की रक्षा करे ॥ ३१॥

नारसिंही दोनों घुट्टियोंकी और तैजसी देवी दोनों चरणोंके पृष्ठभागकी रक्षा करे | श्री देवी पैरों की अंगुलियों में और तलवासिनी पैरोकें तलुओंमें रहकर रक्षा करे ॥ ३२ ॥

अपनी दाढ़ोंके कारण भयंकर दिखायी देनेवाली दंष्ट्राकराली देवी नखोंकी और ऊर्ध्वकेशिनी देवी केशों की रक्षा करे। रोमावलियों के छिद्रोंमे कौबेरी और त्वचाकी वागीश्वरी देवी रक्षा करे॥३३॥

पार्वती देवी रक्त, मजा, वसा, मांस, हड्डी और मेद की रक्षा करे । आँतोंकी कालरात्रि और पित्तकी मुकुटेश्वरी रक्षा करे ॥ ३४ ॥

मूलाधार आदि कमल-कोशोंमें पद्मावती देवी और कफ में चूडामणि देवी स्थित होकर रक्षा करे। नख के तेजकी ज्वालामुखी रक्षा करे। जिसका किसी भी अस्त्र से भेदन नहीं हो सकता, वह अभेद्या देवी शरीरकी समस्त संघियोंमें रहकर रक्षा करे ॥ ३५॥

ब्रह्माणि ! आप मेरे वीर्यकी रक्षा करें। छत्रेधवरी छायाकी तथा धर्मधारिणी देवी मेरे अहंकार, मन और बुद्धिकी रक्षा करे ॥ ३६ ॥।

हाथमें वज्र धारण करने वाली वज्रहस्ता देवी मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायु की रक्षा करे । कल्याण से शोभित होने वाली भगवती कल्याण शोभना मेरे प्राणकी रक्षा करे ॥ ३७ ॥

रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श इन विषयोंका अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करे तथा सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणकी रक्षा सदा नारायणी देवी करे ॥ ३८ ॥

Durga mata kavach path E

वाराही आयुकी रक्षा करे। वैष्णवी धर्मकी रक्षा करे तथा चक्रिंणी (चक्र धारण करनेवाली). देवी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन तथा विद्याकी रक्षा करे ॥ ३९॥

इन्द्राणि ! आप मेरे गोत्रकी रक्षा करें । चण्डिके ! तुम मेरे पशुओंकी रक्षा करो । महालक्ष्मी पुत्रिंकी रक्षा करे और भैरवी पत्नीकी रक्षा करे ॥ ४० ॥

मेरे पथकी सुपथा तथा मार्गकी क्षेमकरी रक्षा करे।’ राजाके दरबार में महालक्ष्मी रक्षा. करे तथा सब ओर व्याप्त रहनेवाली विजया देवी सम्पूर्ण भयोंसे मेरी रक्षा करे ॥ ४१ ॥

देवि ! जो स्थान कवचमें नहीं कहा गया है, अतएव रक्षासे रहिंत है, वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हो; क्योंकि तुमे विजयशालिनी और पापनाशिनी हो ॥ ‘४२ ॥

यदि अपने शरीरका भला चाहे तो मुनष्य बिना कवच के कहीं एक पग भी न जाय कवच का पाठ करके ही यात्रा करे । कवचके द्वारा सब ओर से सुरक्षित मनुष्य जहाँ-जहाँ भी जाता है, वहाँ-वहाँ उसे धन-लाभ होता है, तथा सम्पूर्ण कामनाओ की सिद्धि करनेवाली विजयकी प्राप्ति होती है । वह जिस-जिस अभीष्ट वस्तुका चिन्तन करता है, उस-उसको निश्चय ही प्राप्त कर लेता है। वह पुरुष इस पृथ्वीपर तुलनारहित महान्‌ ऐश्वर्यका भागी होता है ॥ ४३-४४ ॥

दुर्गा माता कवच पाठ F

कवच से सुरक्षित मनुष्य निर्भय हो जाता है। युद्धमें उसकी पराजय नही होती तथा वह तीनों लोकोंमें पूजनीये होता है ॥ ‘४५॥

देवीका यह कवच देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। जो प्रतिदिन नियम पूर्वक तीनों संध्याओंके समय श्रद्धाके साथ इसका पाठ करता है, उसे दैवी कला प्राप्त होती है। तथा वह तीनों लोकोंमें कहीं भी पराजित नहीं होता । इतना ही नहीं, वह अपमृत्युसे रहित हो। सौसे भी अधिक वर्षोतक जीवित रहता है ॥ ४६-४७ ॥

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मकरी, चेचक और कोढ़ आदि उसकी सम्पूर्ण व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं। कनेर, भाँग, अफीम, धतूरें आदिका स्थावर विष, साँप और बिच्छू आदिंके काटनेसे चढ़ा-हुआ जंगम विष तथा अहिफेन और तेलके संयोग आदि से बनने वाला
कृत्रिम विष। ये सभी प्रकारके विष दूर हो जाते हैं, उनका कोई असर नहीं होता ॥ ४८ ॥

Durga mata kavach path G

इस पृथ्वी पर मारण-मोहन आदि जितने आभिचारिक प्रयोग होते हैं। तथा इस प्रकारके जितने मन्त्र, यन्त्र होते हैं। वे सब इस कवचको
हृदयमें धारण कर लेने पर उस मनुष्य को देखते ही नष्ट हो जाते हैं । ये ही नहीं, पृथ्वी पर विचरने वाले ग्राम देवता, आकाशचारी देव विशेष, जलके सम्बन्ध से प्रकट होने वाले गण, उपदेशमात्र से सिद्ध होनेवाले निम्नरकोटि के देवता, अपने जन्म के साथ प्रकर होने वाले देवता, कुल देवता, माला (कण्ठमाला आदि), डाकिनी,शाकिनी,अन्तरिक्षमें विचरने वाली अत्यन्त बलवती भयानक डाकिनियाँ, ग्रह, भूत,’ पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्म राक्षस, बेताल, कृष्माष्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी हृदयमें कवच धारण किये रहने पर उस मनुष्यको देखते ही भाग जाते हैं। कवचधारी पुरुषको राजा से सम्मान वृद्धि प्राप्त होती है । यह कवच मनुष्य के तेजकी वृद्धि करने वाला और उत्तम है ॥ ४९-५२ ॥

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कवचका पाठ करने वाला पुरुष अपनी कीर्ति से विभूषित भूतल पर अपने सुयश के साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होता है। जो पहले कवचका पाठ करके उसके बाद सप्तशती चण्डीका पाठ करता है। उसकी जब तक ‘वन, पर्वत और काननो सहित यह पृथ्वी ‘टिकी रहती है। तबतक यहाँ पुत्र-पौत्र आदि संतान परम्परा बनी रहती है ॥ ५३-५४ ॥

फिर देहका अन्त होनेपर वह पुरुष भगवती महा मायाके प्रसाद से उस नित्य परम पदकों प्राप्त होता हैं। जो देवताओं के लिये भी दुर्लभ है॥ ५५ ॥

वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता और कल्याणमय शिवके साथ आनन्दका भागी होता
है ॥ ५६ ॥|

 

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