Durga saptashati keelakam stotram

दुर्गा मां सप्तशती कीलकम् स्तोत्रं ।। Durga saptashati keelakam stotram

 

Durga saptashati keelakam stotram

आज हम बात करने वाले है ! ” Durga saptashati keelakam stotram “, के बारे में। यह दुर्गा सप्तशती कीलकम् स्तोत्र क्या होता है ? इसका इस्तेमाल कैसे करते है। इसे आपको क्या लाभ होगा। कीलकम् स्तोत्र की महिमा क्या है ? इसका रचना किसने की थी ? यह सब बाते मैं आपको बताने वाला हूँ।

दुर्गा सप्तशती कीलकम् स्तोत्र रचना

इस स्तोत्र की रचना भगवान शिव ने की थी ! जब दुर्गा सप्तशती के पाठ से सब बड़ी सहजता से सिद्धियाँ प्राप्त कर लेते थे ! मां दुर्गा बहुत शीध्र ही प्रसन्न होकर वर दे देती थी ! भगवान शिव ने सोचा कोई इसका दुरुपयोग न करे। तब भगवान शिव ने इन सब बातो को ध्यान में रख कर इस स्तोत्र को कील दिया ! तब से यह स्तोत्रं कीलित कर दिया हैं ! ताकि कोई आसानी से बड़ी सिद्धीय प्राप्त न कर सकें |

दुर्गा सप्तशती कीलकम् स्तोत्र महिमा

सप्तशती पाठ ; करने के तुरंत बाद कीलकम् स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। अगर कोई भी ऎसा नही करता तो पाठ का पूर्ण फल प्राप्त नही होता। क्योंकि सप्तशती पाठ भगवान शिव के द्वारा कीलित है। इस लिए कीलकम् स्तोत्र का पाठ करना बहुत अनिवार्य है। इसे यह पाठ निर्दोष हो जाता है। इसलिए दुर्गा सप्तशती पाठ के पूर्व कीलकम् स्तोत्रं पाठ करना अनिवार्य हैं |

Madanan Mata Sadhana ।। मदानन माता साधना।

दुर्गा सप्तशती कीलकम् स्तोत्र से लाभ

1. सप्तशती पाठ के साथ कीलकम् स्तोत्र का पाठ करने से मां दुर्गा शीध्र प्रसन्न होती है।

2. कीलकम् स्तोत्र ; का रोज पाठ करने से आपकी पाठ-पूजा व जाप शीध्र सिद्ध होता है। और पूर्ण फल देता है।

3. कीलकम् स्तोत्र ; पाठ से दुर्गा सप्तशती पाठ निर्दष हो जाता है।

4. इसका पाठ करने से भगवान शिव प्रसन्न होते है। और उनकी कृपा प्राप्त होती है।

5. कीलकम् स्तोत्र ; का पाठ करने से आपके पूजा-पाठ, जप तप, मंत्र साधना, इन सब के फलों को कीलित कर देता है। ऎसा करने से आपके द्वारा किये गये कोई भी कर्मो का क्षय नही होता।

दुर्गा सप्तशती कीलकम् स्तोत्र पाठ A

ॐ चण्डिका देवी को ‘ नमस्कार है ।

मार्कण्डेय जी कहते हैं ! विशुद्ध ज्ञान ही जिनका शरीर है। तीनों वेद ही जिनके तीन दिव्य नेत्र हैं। जो कल्याण-प्राप्ति के हेतु हैं तथा अपने मस्तक पर अर्ध चन्द्रका मुकुट धारण करते हैं। उन भगवान्‌ शिवको नमस्कार है ॥ १ ॥

मन्त्रोंका जो अभिकीलक है ! अर्थात्‌ मन्त्रों की सिद्धि में विघ्न उपस्थित करने वाले शाप रूपी कीलक का जो निवारण करने वाला है। उस सप्तशती स्तोत्र को सम्पूर्ण रूप से जानना चाहिये ( और जानकर उसकी उपासना करनी चाहिये ) ,
यद्यपि सप्तशतीके अतिरिक्त अन्य मन्त्रोंकें जपमें भी जो निरन्तर लगा रहता है। वह भी कल्याण का भागी होता है ॥ २॥

उसके भी उच्चाटन आदि कर्म सिद्ध होते हैं ! तथा उसे भी समस्त दुर्लभ वस्तुओ की प्राप्ति हो जाती है। तथापि जों अन्य मन्त्रो का जप न॑ करके केवल इस सप्तशती नामक स्तोंत्र से ही देवी की स्तुति करते हैं। उन्हें स्तुति मात्र से ही सच्चिदानन्द स्वरूपिणी देवी सिद्ध हो जाती है ॥ ३ ॥

Durga saptashati keelakam stotram B

उन्हें अपने कार्य की सिद्धि के लिये मन्त्र, ओषधि तथा अन्य किसी साघन के उपयोग की आवश्यकता नहीं रहती। बिना जपके ही उनके उच्चाटन आदि समस्त आभिचारिक कर्म सिद्ध हो जाते हैं ॥ ४ ॥

इतना ही नहीं, उनकी सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ भी सिद्ध होती हैं। लोगों के मन में यह शंखा थी। कि
“जब केवल सप्तशती की उपासना से अथवा सप्तशती को छोड़कर अन्य मन्त्रों की उपासना से भी समान रूपसे सब कार्य सिद्ध होते हैं। तब इनमें श्रेष्ठ कौन-सा साधन हैं। लोगो की इस शंखाओ को सामने रखकर भगवान्‌ शंकरने
अपने पास आये हुए जिज्ञासुओं को समझाया कि यह सप्तशती नामक सम्पूर्ण स्तोत्र ही सर्वश्रेष्ठ एवं कल्याणमय है ॥ ५ ॥

Durga mata kavach path || हर तरफ से रक्षा होगी |

तदनन्तर भगवती चंण्डिका के सप्तशती नामक स्तोत्र को महादेवजी ने गुप्त कर दिया। सप्तशती के पाठ से जो पुण्य प्राप्त होता है, उसकी कभी समाप्ति नहीं होती। किंतु अन्य मन्त्रो कें जपजन्य पुण्य की समाप्ति हो जाती है। अत: भगवान्‌ शिव ने अन्य मन्त्रों की अपेक्षा जो सप्तशती की ही श्रेष्ठता का निर्णय किया है। उसे यथार्थ ही जानना चाहिये ॥ ६ ॥

Durga saptashati keelakam stotram C

अन्य मन्त्रों का जप करने वाला पुरुष भी यदि सप्तशती के स्तोत्र और जपका अनुष्ठान कर ले तो वह भी पूर्णरूप से हीं कल्याण का भागी होता है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। जो साधक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी अथवा अष्टमी को एकाग्रचित्त होकर भगवती की सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है। और फिर उसे प्रसाद रूप से ग्रहण करता है। उसीपर भगवती प्रसन्न होती हैं। अन्यथा उनकी प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती। इस प्रकार सिद्धि के प्रतिबन्धक रूप कीलके द्वारा महादेव जी ने इस स्तोत्र को कीलित कर रखा है। ॥७-८॥

जो पूर्वोक्त रीतिसे निष्कीलन करके इस सप्तशती स्तोत्रका प्रतिदिन स्पष्ट उच्चारण पूर्वक पाठ करता है ? वह मनुष्य सिद्ध हो जाता है। वही देवीका पार्षद होता है, और बही गन्धर्व भी होता है॥ ९॥

सर्वत्र विचरते रहने पर भी इस संसार में उसे कहीं भी भय नहीं होता। बह अपमृत्युके वश में नहीं पड़ता तथा देह त्यागनेके अन्तर मोक्ष प्राप्त कर लेता है॥ १० ॥

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अत: कीलन को जानकर उसका परिहार करके ही सप्तशती का पाठ आरम्भ करे। जो ऐसा नहीं करता, उसका अमंगल होता है। इसलिये कीलक और निष्कीलन का ज्ञान प्राप्त करने पर ही यह स्तोत्र निर्दोष होता है, और विद्वान्‌ पुरुष इस निर्दोष स्तोत्र का ही पाठ आरम्भ करते हैं ॥११॥

Durga saptashati keelakam stotram D

स्त्रियों में जो कुछ भी सौभाग्य आदि दृष्टिगोचर होता है ! वह सब देवी के प्रसाद का ही फल है। अतः इस कल्याणमय स्तोत्र का सदा जप करना चाहिये ॥१२॥

इस स्तोत्रका मन्द स्वर से पाठ करने पर स्वल्प फल की प्राप्ति होती हैं, और उच्च स्वरसे पाठ करने पर पूर्ण फल की सिद्धि होती है। अतः
उच्च स्वरसे ही इसका पाठ आरम्भ करना चाहिये ॥१३॥

जिनके प्रसाद से ऐश्वर्य, सौभाग्य, आरोग्य, सम्पत्ति, शत्रु नाश तथा परम मोक्ष की भी सिद्धि होती है ! उन कल्याणमयी जगदम्बा की स्तुति मनुष्य क्यों नहीं करते ? ॥१४॥

Sadhana mein siddhi kyo nhi milti, kaise mile success.

पाठकों जो ऊपर बताया गया हैं ! वह ” Durga saptashati keelakam stotram “, हैं | इसका पाठ दुर्गा सप्तशती पाठ के तुरंत बाद करना होता हैं ! पाठकों यदि आप नहीं जानते की दुर्गा सप्तशती क्या होता हैं ! इसका पाठ कैसे करते हैं ! दुर्गा सप्तशती पाठ की सही विधि क्या होती हैं, तो आप comments करके पूछ सकते हैं | आदेश

 

****** जय माँ दुर्गा ******

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