Bhagwat Geeta third adhayay ।। mahatmy - MANTRAMOL

Bhagwat Geeta third adhayay ।। mahatmy

श्रीमद्भगवद्गीता तीसरा अध्याय व माहात्म्य ।। Bhagwat Geeta third adhayay

 

Bhagwat Geeta third adhayay ।। mahatmy

पाठकों आपके लिए प्रस्तुत है  “Bhagwat Geeta third adhayay” भागवत गीत का तीसरा अध्याय, माहात्म्य हिन्दी व संस्कृत में |

श्रीमद्भगवद्गीताके तीसरे अध्यायका माहात्म्य

श्रीभगवान् कहते हैं ? प्रिये ! जनस्थान में एक जड नामक ब्राह्मण था ! जो कौशिक वंशमें उत्पन्न हुआ था। उसने अपना जातीय धर्म छोड़कर बनिये की वृत्तिमें मन लगाया। उसे परायी स्त्रियों के साथ व्यभिचार करने का व्यसन पड़ गया था। वह सदा जुआ खेलता, शराब पीता और शिकार खेलकर जीवों की हिंसा किया करता था। इसी प्रकार उसका समय बीतता था। धन नष्ट हो जानेपर वह व्यापारके लिये बहुत दूर उत्तर दिशामें चला गया। वहाँसे धन कमा कर धरकी ओर लौटा। बहुत दूर तक का रास्ता उसने तै कर लिया था। एक दिन सूर्यास्त हो जाने पर जब दसों दिशाओंमें अन्धकार फैल गया, तब एक वृक्षके नीचे उसे लुटेरों ने धर दबाया और शीघ्र ही उस के प्राण ले लिये।

उसके धर्मका लोप हो गया था, इसलिये वह बड़ा भयानक प्रेत हुआ। उसका पुत्र बड़ा धर्मात्मा और वेदों का विद्वान था। उसने अबतक पिता के लौट आनेकी राह देखी। जब वे नहीं आये तब उनका पता लगाने के लिये वह स्वयं भी घर छोड़कर चल दिया। वह प्रतिदिन खोज करता ! मगर राहगीरोंसे पूछने पर भी उसे उनका कुछ समाचार नहीं मिलता था ? तदनन्तर एक दिन एक मनुष्यसे उसकी भेंट हुई, जो उसके पिता का सहायक था | उससे सारा हाल जानकर उसने पिताकी मृत्यु पर बहुत शोक किया। वह बड़ा बुद्धिमान था ? बहुत कुछ सोच-विचार कर पिता ! का पारलौकिक कर्म करने की इच्छा से आवश्यक सामग्री साथ ले उसने काशी जाने का विचार किया।

मार्ग में सात-आठ मुकाम डालकर, वह नवें दिन उसी वृक्षके नीचे पहुंचा, जहाँ इसके पिता मारे गये थे। उस स्थान पर उसने संध्योपासना की, और गीताके तीसरे अध्यायका पाठ किया। इसी समय आकाश में बड़ी भयानक आवाज हुई। उसने अपने पिता को भयंकर आकार में देखा ? फिर तुरंत ही अपने सामने आकाश ! उसे एक सुन्दर विमान दिखायी दिया, जो महान् तेजसे व्याप्त था। उसमें अनेकों क्षुद्र घंटिकाएँ लगी थीं।

अध्यायका माहात्म्य

उसके तेजसे समस्त दिशाएँ आलोकित हो रही थीं। यह दृश्य देखकर उसके चित्तकी व्यग्रता दूर हो गयी। उसने विमानपर अपने पिता को दिव्यरूप धारण किये विराजमान देखा। उनके शरीरपर पीताम्बर शोभा पा रहा था और मुनिजन उनकी स्तुति कर रहे थे। उन्हें देखते ही पुत्र ने प्रणाम किया, तब पिताने भी उसे आशीर्वाद दिया। तत्पश्चात् उसने पितासे यह सारा वृत्तान्त पूछा । उसके उत्तरमें पिताने सब बातें बताकर इस प्रकार कहना आरम्भ किया-‘बेटा ! दैववश मेरे निकट गीताके तृतीय अध्याय का पाठ करके तुमने इस शरीरके द्वारा किये हुए दुस्त्यज कर्मबन्धनसे मुझे छुड़ा दिया।

अतः अब घर लौट जाओ; क्योंकि जिसके लिये तुम काशी जा रहे थे, वह प्रयोजन इस समय तृतीय अध्यायके पाठसे ही सिद्ध हो गया है।’ पिता के यों कहनेपर पुत्रने पूछा-‘तात ! मेरे हित का उपदेश दीजिये ? तथा और कोई कार्य जो मेरे लिये करने योग्य हो बतलाइये।’ तब पिताने उससे कहा-‘अनघ ! तुम्हें यही कार्य फिर करना है। मैंने जो कर्म किया है, वही मेरे भाई ने भी किया था। इससे वे घोर नरक में पड़े हैं। उनका भी तुम्हें उद्धार करना चाहिये तथा मेरे कुल के और भी जितने लोग नरकमें पड़े हैं | उन सबका भी तुम्हारे द्वारा उद्धार हो जाना चाहिये; यही मेरा मनोरथ है। बेटा ! जिस साधन के द्वारा तुमने मुझे संकट से छुड़ाया है ? उसी का अनुष्ठान औरों के लिये भी करना उचित है।

उसका अनुष्ठान करके उससे होने वाला पुण्य उन नारकी जीवों को संकल्प करके दे दो। इससे वे समस्त पूर्वज मेरी ही तरह यातना से मुक्त हो स्वल्पकाल में ही श्रीविष्णुके परमपद को प्राप्त हो जायेंगे।’ पिताका यह संदेश सुनकर पुत्रने कहा- ‘तात ! यदि ऐसी बात है | आपकी भी ऐसी ही रुचि है ? तो मैं समस्त नार की जीवों का नरकसे उद्धार कर दूंगा।’ यह सुनकर उसके पिता बोले- ‘बेटा ! एवमस्तु, तुम्हारा कल्याण हो; मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य सम्पन्न हो गया।

Bhagwat Geeta third adhayay 

इस प्रकार पुत्र को आश्वासन देकर उसके पिता भगवान् विष्णुके परमधामको चले गये। तत्पश्चात् वह भी लौटकर जनस्थानमें आया और परम सुन्दर भगवान् श्रीकृष्णके मन्दिरमें उनके समक्ष बैठकर पिताके आदेशानुसार गीताके तीसरे अध्यायका पाठ करने लगा। उसने नारकी जीवोंका उद्धार करने की इच्छा से गीता पाठ जनित सारा पुण्य संकल्प करके दे दिया। इसी बीच में भगवान् विष्णुके दूत यातना भोगनेवाले नार की जीवों को छुड़ाने के लिये यमराज के पास गये। यमराजने नाना प्रकार के सत्कारोंसे उनका पूजन किया और कुशल पूछी। वे बोले-‘धर्मराज ! हम लोगों के लिये सब ओर आनन्द-ही-आनन्द है।’

इस प्रकार सत्कार कर के पितृलोक के सम्राट् परम बुद्धिमान् यमने विष्णुदूतोंसे यमलोक में आनेका कारण पूछा। तब विष्णुदूतोंने कहा—यमराज ! शेषशय्या पर शयन करनेवाले भगवान् विष्णुने हम लोगों को आपके पास कुछ संदेश देनेके लिये भेजा है। भगवान् हम लोगों के मुखसे आपकी कुशल पूछते हैं और यह आज्ञा देते हैं कि ‘आप नरकमें पड़े हुए समस्त प्राणियों को छोड़ दें। अमित तेजस्वी भगवान् विष्णुका यह आदेश सुनकर यमने मस्तक झुकाकर उसे स्वीकार किया और मन-ही-मन कुछ सोचा। तत्पश्चात् मदोन्मत्त नारकी जीवोंको नरकसे मुक्त देखकर उनके साथ ही वे भगवान् विष्णुके वास-स्थानको चले।

यमराज श्रेष्ठ विमान के द्वारा जहाँ क्षीरसागर है, वहाँ जा पहुँचे। उसके भीतर कोटि-कोटि सूर्योके समान कान्तिमान् नील कमल-दलके समान श्यामसुन्दर लोकनाथ जगद्गुरु श्रीहरि का उन्होंने दर्शन किया। भगवान्का तेज उनकी शय्या बने हुए शेषनाग के फणोंकी मणियोंके प्रकाशसे दुगुना हो रहा था। वे आनन्द- युक्त दिखायी दे रहे थे। उनका हृदय प्रसन्नतासे परिपूर्ण था। भगवती लक्ष्मी अपनी सरल चितवनसे प्रेमपूर्वक उन्हें बार-बार निहार रही थीं। चारों ओर योगीजन भगवानकी सेवामें खड़े थे। उन योगियों की आँखोंके तारे ध्यानस्थ होनेके कारण निश्चल प्रतीत होते थे। देवराज इन्द्र अपने विरोधियोंको परास्त करने के उद्देश्य से भगवानकी स्तुति कर रहे थे। ब्रह्माजीके मुखसे निकले हुए वेदान्त वाक्य मूर्तिमान् होकर भगवानके गुणोंका गान कर रहे थे।

अध्यायका माहात्म्य

भगवान् पूर्णतः संतुष्ट होनेके साथ ही समस्त योनियों की ओरसे उदासीन प्रतीत होते थे। जीवोंमेंसे जिन्होंने योग-साधनके द्वारा अधिक पुण्य संचय किया था, उन सबको एक ही साथ वे कृपादृष्टिसे निहार रहे थे। भगवान् अपने स्वरूपभूत अखिल चराचर जगत्को आनन्द पूर्ण दृष्टिसे आमोदित कर रहे थे। शेषनागकी प्रभा से उद्भासित एवं सर्वत्र व्यापक दिव्य विग्रह धारण किये नील कमलके सदृश श्यामवर्ण वाले श्रीहरि ऐसे जान पड़ते थे, मानो चाँदनी से घिरा हुआ आकाश सुशोभित हो रहा हो । इस प्रकार भगवान्की झाँकी करके यमराज अपनी विशाल बुद्धिके द्वारा उनकी स्तुति करने लगे। यमराज बोले सम्पूर्ण जगत्का निर्माण करनेवाले परमेश्वर ! आपका अन्तःकरण अत्यन्त निर्मल है।

आपके मुखसे ही वेदोंका प्रादुर्भाव हुआ है। आप ही विश्वस्वरूप और इसके विधायक ब्रह्मा हैं। आपको नमस्कार है। अपने बल और वेगके कारण जो अत्यन्त दुर्धर्ष प्रतीत होते हैं, ऐसे दानवेन्द्रों का अभिमान चूर्ण करनेवाले भगवान् विष्णुको नमस्कार है। पालनके समय सत्त्वमय शरीर धारण करनेवाले, विश्वके आधारभूत, सर्वव्यापी श्रीहरिको नमस्कार है। समस्त देहधारियोंकी पातक-राशिको दूर करनेवाले परमात्माको प्रणाम है। जिनके ललाटवर्ती नेत्रके तनिक- सा खुलनेपर भी आगकी लपटें निकलने लगती हैं, उन रुद्ररूपधारी आप परमेश्वरको नमस्कार है।

Bhagwat Geeta third adhayay 

आप सम्पूर्ण विश्वके गुरु, आत्मा और महेश्वर हैं, अतः समस्त वैष्णवजनोंको संकटसे मुक्त करके उनपर अनुग्रह करते हैं। आप मायासे विस्तारको प्राप्त हुए अखिल विश्वमें व्याप्त होकर भी कभी माया अथवा उससे उत्पन्न होनेवाले गुणोंसे मोहित नहीं होते। माया तथा मायाजनित गुणोंके बीचमें स्थित होनेपर भी आपपर उनमेंसे किसी का प्रभाव नहीं पड़ता। आपकी महिमाका अन्त नहीं है; क्योंकि आप असीम हैं। फिर आप वाणीके विषय कैसे हो सकते हैं। अतः मेरा मौन रहना ही उचित है। इस प्रकार स्तुति करके यमराजने हाथ जोड़ कर कहा-‘जगद्गुरो ! आपके आदेशसे इन जीवोंको गुणरहित होनेपर भी मैंने छोड़ दिया है।

अब मेरे योग्य और जो कार्य हो, उसे बताइये।’ उनके यों कहनेपर भगवान् मधुसूदन मेघके समान गम्भीर वाणीद्वारा मानो अमृतरससे सींचते हुए बोले-‘धर्मराज ! तुम सबके प्रति समानभाव रखते हुए लोकोंका पापसे उद्धार कर रहे हो । तुमपर देहधारियोंका भार रखकर मैं निश्चिन्त हूँ। अतः तुम अपना काम करो और अपने लोकको लौट जाओ।’ यों कहकर भगवान् अन्तर्धान हो गये। यमराज भी अपनी पुरीको लौट आये। तब वह ब्राह्मण अपनी जातिके और समस्त नारकी जीवोंका नरकसे उद्धार करके स्वयं भी श्रेष्ठ विमानद्वारा श्रीविष्णुधाम को चला गया।

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

अथ तृतीयोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ? तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव। १ ।
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ? तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्। २ ।

श्रीभगवानुवाच

लोकेऽस्मिद्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ। ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्। ३ ।
कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्य पुरुषोऽश्नुते । न च सन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति। ४ ।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः। ५ ।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते। ६।
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते। ७ ।
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः। ८ ।

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः । तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर। ९ ।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् । १०।
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ । ११।
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः । तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः । १२ ।
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः । भुञ्जते ते त्वयं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्। १३ ।
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः । १४ ।
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् । तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्। १५ ।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः । अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति । १६ ।

अर्जुन उवाच

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ? आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते। १७ ।
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ? न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः । १८।
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ? असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः । १९ ।
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि । २०।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते । २१ ।
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि । २२ ।

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । मम वानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः । २३ ।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्या कर्म चेदहम् । सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः । २४ ।
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम् । २५ ।
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् । जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् । २६ ।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते । २७ ।
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः । गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सजते । २८ ।

प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु । तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन विचालयेत्। २९ ।
मयि सर्वाणि कर्माणि सत्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः । ३० ।
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः । ३१ ।
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्। सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः । ३२
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृति यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति। इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ। ३४ । श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः । ३५।

अर्जुन उवाच

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः । अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः । ३६ ।

श्रीभगवानुवाच

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्धवः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् । ३७ ।
धूमेनावियते वह्निर्यथादशों मलेन च । यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्। ३८।
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा। कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च । ३९ ।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्। ४०।
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ । पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्। ४१ ।
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः । ४२ ।
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना । जहि शत्रु महाबाहो कामरूपं दुरासदम्। ४३।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३॥

 

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

 

तीसरा अध्याय ( हिन्दी में )

इसपर अर्जुनने प्रश्न किया कि हे जनार्दन ? यदि कर्मोंकी अपेक्षा ज्ञान आपके श्रेष्ठ मान्य है, तो फिर हे केशव ! मुझे भयंकर कर्ममें क्यों लगाते हैं ? । १ ।

तथा आप मिले हुए-से वचन से मेरी बुद्धि को मोहित ! सी करते हैं, इसलिये उस एक बात को निश्चय करके कहिये कि जिससे मैं कल्याण को प्राप्त होऊँ। २।

इस प्रकार अर्जुन के पूछनेपर ? भगवान् श्रीकृष्ण महाराज बोले, हे निष्पाप अर्जुन ! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा* मेरे द्वारा पहले कही गयी है | ज्ञानियोंकी ज्ञानयोगसे और योगियों की निष्काम कर्मयोगसे* । ३।

परंतु किसी भी मार्गके अनुसार “कर्मों” को स्वरूपसे त्यागनेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मनुष्य न तो “कर्मों” के न करनेसे निष्कर्मताको प्राप्त होता है, और न कर्मो को त्यागनेमात्र से भगवत्साक्षात्काररूप सिद्धिको प्राप्त होता है। ४ ।

तथा सर्वथा कर्मोका स्वरूपसे त्याग हो भी नहीं सकता, क्योंकि कोई भी पुरुष किसी कालमें क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता है, निःसन्देह सभी पुरुष प्रकृतिसे उत्पन्न हुए गुणोंद्वारा परवश हुए कर्म करते हैं। ५ ।

इसलिये जो मूढबुद्धि पुरुष कर्मेन्द्रियोंको हठसे रोककर इन्द्रियोंके‌ भोगोंको मनसे चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहा जाता है। ६।

और हे अर्जुन ! जो पुरुष मनसे इन्द्रियोंको वशमें करके अनासक्त हुआ कर्मेन्द्रियोंसे कर्मयोगका आचरण करता है, वह श्रेष्ठ है। ७ ।

Bhagwat Geeta third adhayay ।। mahatmy E

इसलिये तू शास्त्रविधिसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको कर, क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करनेसे तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा

हे अर्जुन ! बन्धनके भयसे भी कर्मोंका त्याग करना योग्य नहीं है, क्योंकि यज्ञ अर्थात् विष्णुके निमित्त किये हुए कर्मके सिवा अन्य कर्ममें लगा हुआ ही यह मनुष्य कर्मोद्वारा बँधता है, इसलिये हे अर्जुन ! आसक्तिसे रहित हुआ, उस परमेश्वरके निमित्त कर्मका भली प्रकार आचरण कर।९।

कर्म न करनेसे तू पापको भी प्राप्त होगा; क्योंकि प्रजापति ब्रह्माने कल्पके आदिमें यज्ञसहित प्रजाको रचकर कहा कि इस यज्ञद्वारा तुमलोग वृद्धिको प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुमलोगोंको इच्छित कामनाओं के देनेवाला होवे । १०।

तथा तुमलोग इस यज्ञद्वारा देवताओं की उन्नति करो और वे देवतालोग तुमलोगोंकी उन्नति करें, इस प्रकार आपसमें कर्तव्य समझकर उन्नति करते हुए परम कल्याण को प्राप्त होवोगे। ११ ।

तथा यज्ञद्वारा बढ़ाये हुए देवतालोग तुम्हारे लिये बिना माँगे ही प्रिय भोगोंको देंगे, उनके द्वारा दिये हुए भोगोंको जो इनके लिये बिना दिये ही भोगता है वह निश्चय चोर है। १२ ।

कारण कि यज्ञसे शेष बचे हुए अन्नको खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापोंसे छूटते हैं और जो पापीलोग अपने शरीरपोषणके लिये ही पकाते हैं, वे तो पापको ही खाते हैं। १३ ।

तीसरा अध्याय

क्योंकि सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं और अन्नकी उत्पत्ति वृष्टिसे होती है तथा वृष्टि यज्ञसे होती है और वह यज्ञ कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाला है। १४ ।

तथा उस कर्मको तू वेदसे उत्पन्न हुआ जान और वेद अविनाशी परमात्मासे उत्पन्न हुआ है, इससे सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञमें प्रतिष्ठित है। १५ ।

हे पार्थ ! जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार चलाये हुए सृष्टिचक्र के अनुसार नहीं बर्तता है, अर्थात् शास्त्रानुसार कर्मो को नहीं करता है, वह इन्द्रियोंके सुखको भोगने वाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है। १६ ।

परंतु जो मनुष्य आत्माहीमें प्रीतिवाला और आत्माहीमें तृप्त तथा आत्मामें ही संतुष्ट होवे, उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है। १७ ।

क्योंकि‌ इस संसार में उस पुरुष का किये जाने से भी कोई प्रयोजन नहीं है, और न किये जानेसे भी कोई प्रयोजन नहीं है, तथा इसका सम्पूर्ण भूतों में कुछ भी स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं है, तो भी उसके द्वारा केवल लोकहितार्थ कर्म किये जाते हैं। १८ ।

इससे तू अनासक्त हुआ निरन्तर कर्तव्य कर्मका अच्छी प्रकार आचरण कर; क्योंकि अनासक्त पुरुष कर्म करता हुआ, परमात्माको प्राप्त होता है। १९ ।

इस प्रकार जनकादि ! ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं, इसलिये तथा लोक संग्रहको देखता हुआ भी तू कर्म करनेको ही योग्य है। २० ।

क्योंकि श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी उस-उसके ही अनुसार बर्तते हैं, वह पुरुष जो कुछ प्रमाण कर देता है, लोग भी उसीके अनुसार बर्तते हैं । २१ ।

इसलिये हे अर्जुन ! यद्यपि मुझे तीनों लोकोंमें कुछ भी कर्तव्य नहीं है, तथा किंचित् भी प्राप्त होनेयोग्य वस्तु अप्राप्त नहीं है, तो भी मैं कर्ममें ही बर्तता हूँ। २२ ।

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क्योंकि यदि मैं सावधान हुआ कदाचित् कर्ममें न बतूं तो हे अर्जुन ! सब प्रकारसे मनुष्य मेरे बर्तावके अनुसार बर्तते हैं, अर्थात् बर्तने लग जायँ । २३ ।

तथा यदि मैं कर्म ! न करूँ तो ये सब लोग भ्रष्ट हो जायँ और मैं वर्णसंकरका ! करने‌ वाला होऊँ तथा इस सारी प्रजाका हनन करूँ अर्थात् मारने वाला बनूं। २४ ।

इसलिये हे भारत ! कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जैसे कर्म करते हैं, वैसे ही अनासक्त हुआ विद्वान् भी लोकशिक्षाको चाहता हुआ कर्म करे । २५ ।

ज्ञानी पुरुषको चाहिये कि कर्मोमें ! आसक्ति वाले अज्ञानियोंकी बुद्धिमें भ्रम अर्थात् कर्मोंमें अश्रद्धा उत्पन्न न करे, किंतु स्वयं परमात्माके‌ स्वरूप में स्थित हुआ, और सब कर्मोको अच्छी प्रकार करता हुआ उनसे भी वैसे ही करावे । २६ ।

हे अर्जुन ! वास्तवमें सम्पूर्ण कर्म प्रकृतिके गुणों द्वारा किये हुए हैं, तो भी अहंकारसे मोहित हुए अन्तःकरणवाला पुरुष मैं कर्ता हूँ ऐसे मान लेता है। २७।

परंतु हे महाबाहो ! गुणविभाग* और कर्मविभागके । तत्त्वको जाननेवाला ज्ञानी पुरुष सम्पूर्ण गुण गुणोंमें बर्तते हैं, ऐसे मानकर नहीं आसक्त होता है। २८ ।

Bhagwat Geeta third adhayay 

और प्रकृतिके गुणोंसे मोहित हुए पुरुष गुण और कर्मोमें आसक्त होते हैं। उन अच्छी प्रकार न समझनेवाले मूर्योको अच्छी प्रकार जाननेवाला ज्ञानी पुरुष चलायमान न करे। २९ ।

इसलिये हे अर्जुन ! तू ध्याननिष्ठ चित्तसे सम्पूर्ण कर्मोको मुझमें समर्पण करके, आशारहित और ममतारहित होकर संतापरहित हुआ युद्ध कर । ३० ।

हे अर्जुन ! जो कोई भी मनुष्य दोषबुद्धिसे रहित, और श्रद्धासे ! युक्त हुए सदा ही मेरे इस मतके अनुसार बर्तते हैं, वे पुरुष सम्पूर्ण कर्मोसे छूट जाते हैं। ३१ ।

और जो दोषदृष्टिवाले ! मूर्खलोग इस मेरे मतके अनुसार नहीं बर्तते हैं, उन सम्पूर्ण ज्ञानोंमें मोहित चित्तवालोंको तू कल्याणसे भ्रष्ट हुए ही जान । ३२ ।

क्योंकि सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं, अर्थात् अपने स्वभाव से परवश हुए कर्म करते हैं, ज्ञानवान् भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है, फिर इसमें किसीका हठ क्या करेगा। ३३।

Bhagwat Geeta third adhayay 

इसलिये मनुष्यको चाहिये! कि इन्द्रिय “इन्द्रियके” अर्थमें अर्थात् सभी “इन्द्रियोंके” भोगोंमें स्थित जो राग और द्वेष हैं, उन दोनोंके वशमें नहीं होवे; क्योंकि इसके वे दोनों ही कल्याणमार्गमें विघ्न करनेवाले महान् शत्रु हैं। ३४ ।

इसलिये उन दोनों को जीतकर सावधान हुआ ! स्वधर्मका आचरण करे; क्योंकि अच्छी प्रकार आचरण किये हुए, दूसरेके धर्मसे गुणरहित भी अपना धर्म अति उत्तम है, अपने धर्ममें मरना भी कल्याण कारक है, और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है। ३५ ।

इसपर अर्जुनने पूछा कि हे कृष्ण ? फिर यह पुरुष बलात् लगाये हुएके सदृश न चाहता हुआ, भी किससे प्रेरा हुआ पाप का आचरण करता है? । ३६ ।

Shrimad bhagwat geeta katha || श्रीमद्भगवद्गीता प्रथम अध्याय।

इस प्रकार अर्जुनके पूछनेपर ! श्रीकृष्ण महाराज बोले, हे अर्जुन ! रजोगुणसे उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है, यह ही महा अशन अर्थात् अग्निके सदृश भोगोंसे न तृप्त होनेवाला और बड़ा पापी है, इस विषयमें इसको ही तू वैरी जान । ३७ ।

जैसे धुएँसे अग्नि ! और मलसे दर्पण ढका जाता है, तथा जैसे जेर से गर्भ ढका हुआ है, वैसे ही उस काम के द्वारा यह ज्ञान ढका हुआ है। ३८।

और हे अर्जुन ! इस अग्निसदृश न पूर्ण होनेवाले कामरूप ज्ञानियोंके नित्य वैरीसे ज्ञान ढका हुआ है। ३९ ।

Bhagwat Geeta third adhayay 

इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इस काम के वास स्थान कहे जाते हैं ! और यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा ही ज्ञानको ! आच्छादित करके इस जीवात्माको मोहित करता है। ४० ।

इसलिये हे अर्जुन ! तू पहले इन्द्रियों को वशमें करके ज्ञान और विज्ञानके नाश करनेवाले इस काम पापी को निश्चयपूर्वक मार । ४१ ।

और यदि तू समझे कि इन्द्रियों ! को रोक कर कामरूप वैरी को मार ने की मेरी शक्ति नहीं है ! तो तेरी यह भूल है ? क्योंकि इस शरीर से तो इन्द्रियोंको पर (श्रेष्ठ, बलवान् और सूक्ष्म) कहते हैं | और इन्द्रियों से पर मन है, और मनसे भी पर बुद्धि है, और जो बुद्धि से भी अत्यन्त पर है, वह आत्मा है। ४२ ।

Bhagwat Geeta dwitiya adhyay ।। श्रीमद्भगवद्गीता महत्तव

इस प्रकार बुद्धिसे, पर अर्थात् सूक्ष्म तथा सब प्रकार बलवान् और श्रेष्ठ ! अपने आत्मा को जानकर और बुद्धिके द्वारा मनको वशमें करके हे महाबाहो ! अपनी शक्ति को समझकर इस दुर्जय कामरूप शत्रुको मार । ४३ ।

इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें “कर्मयोग’ नामक तीसरा अध्याय ॥ ३॥

Santoshi Mata vrat katha ।। व्रत पूजन व उद्यापन की विधि

Bhagwat Geeta third adhayay complete 

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