Bhagwat Geeta dwitiya adhyay ।। श्रीमद्भगवद्गीता महत्तव - MANTRAMOL

Bhagwat Geeta dwitiya adhyay ।। श्रीमद्भगवद्गीता महत्तव

श्रीमद्भगवद्गीता द्वतिया अध्याय व महत्तव || Bhagwat Geeta dwitiya adhyay

 

पाठकों आप सब के लिए प्रस्तुत है। “Bhagwat Geeta dwitiya adhyay” श्रीमद्भगवद्गीता का द्वितीय अध्याय, और महत्व सहित

 

श्रीमद्भगवद्गीताके दूसरे अध्यायका माहात्म्य

भगवान कहते हैं लक्ष्मी ! प्रथम अध्याके माहात्यका उत्तम उपाख्यान मैंने तुम्हें सुना दिया। अब अन्य अध्यायोंके माहात्म्य श्रवण करो। दक्षिण दिशामें वेदवेत्ता ब्राह्मणों के पुरन्दरपुर नामक नगर श्रीमान् देवशर्मा नामक एक विद्वान् ब्राह्मण रहते थे। वे अतिथियोंके पूजक, स्वाध्यायशील, वेद-शास्त्रोंके विशेषज्ञ, यज्ञोंका अनुष्ठान करने वाले और तपस्वियों के सदा ही प्रिय थे। उन्होंने उत्तम द्रव्योंके द्वारा अग्निमें हवन करके दीर्घकालतक देवताओंको तृप्त किया, किंतु उन धर्मात्मा ब्राह्मणको कभी सदा रहनेवाली शान्ति न मिली। वे परम कल्याणमय तत्त्वका ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे प्रतिदिन प्रचुर सामग्रियोंके द्वारा सत्य-संकल्पवाले तपस्वियोंकी सेवा करने लगे।

इस प्रकार शुभ आचरण करते हुए उन्हें बहुत समय बीत गया। तदनन्तर एक दिन पृथ्वीपर उनके समक्ष एक त्यागी महात्मा प्रकट हुए। वे पूर्ण अनुभवी, आकाङ्क्षारहित, नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि रखनेवाले तथा शान्तचित्त थे। निरन्तर परमात्माके चिन्तनमें संलग्न हो वे सदा आनन्दविभोर रहते थे। देवशर्माने उन नित्यसन्तुष्ट तपस्वीको शुद्धभावसे प्रणाम किया और पूछा-‘महात्मन् ! मुझे शान्तिमयी स्थिति कैसे प्राप्त होगी? तब उन आत्मज्ञानी संतने देवशर्माको सौपुर ग्रामके निवासी मित्रवान्का, जो बकरियोंका चरवाहा था, परिचय दिया और कहा, ‘वही तुम्हें उपदेश देगा।’

( Bhagwat Geeta dwitiya adhyay )

यह सुनकर देवशर्माने महात्माके चरणोंकी वन्दना की और समृद्धिशाली सौपुर ग्राममें पहुँचकर उसके उत्तरभागमें एक विशाल वन देखा । उसी वनमें नदीके किनारे एक शिलापर मित्रवान् बैठा था। उसके नेत्र आनन्दातिरेकसे निश्चल हो रहे थे-वह अपलक दृष्टि से देख रहा था। वह स्थान आपसका स्वाभाविक वैर छोड़कर एकत्रित हुए परस्पर- विरोधी जन्तुओंसे घिरा था। वहाँ उद्यानमें मन्द-मन्द वायु चल रही थी। मृगोंके झुंड शान्तभावसे बैठे थे और मित्रवान् दयासे भरी हुई आनन्दमयी मनोहारिणी दृष्टि से पृथ्वीपर मानो अमृत छिड़क रहा था। इस रूपमें उसे देखकर देवशर्माका मन प्रसन्न हो गया। वे उत्सुक होकर बड़ी विनयके साथ मित्रवानके पास गये। मित्रवान्ने भी अपने मस्तकको किंचित्
नवाकर देवशर्माका सत्कार किया।

तदनन्तर विद्वान् देवशर्मा अनन्य- चित्तसे मित्रवान्के समीप गये और जब उसके ध्यानका समय समाप्त हो गया, उस समय उन्होंने अपने मनकी बात पूछी-‘महाभाग ! मैं आत्माका ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ। मेरे इस मनोरथकी पूर्तिके लिये मुझे किसी ऐसे उपायका उपदेश कीजिये, जिसके द्वारा सिद्धि प्राप्त हो चुकी हो।’ देवशर्माकी बात सुनकर मित्रवान्ने एक क्षणतक कुछ विचार कया। उसके बाद इस प्रकार कहा- -‘विद्वन् ! एक समयकी बात है, मैं वनके भीतर बकरियोंकी रक्षा कर रहा था। इतनेमें ही एक भयंकर व्याघ्रपर मेरी दृष्टि पड़ी, जो मानो सबको ग्रस लेना चाहता था। मैं मृत्युसे डरता था, इसलिये व्याघ्रको आते देख बकरियोंके झुंडको आगे करके वहाँसे भाग चला, किंतु एक बकरी तुरंत ही सारा भय छोड़कर नदीके किनारे उस बाघके पास बेरोक-टोक चली गयी। फिर तो व्याघ्र भी द्वेष छोड़कर चुपचाप खड़ा हो गया। उसे इस अवस्थामें देखकर बकरी

( Bhagwat Geeta dwitiya adhyay )

बोली-‘व्याघ्र ! तुम्हें तो अभीष्ट भोजन प्राप्त हुआ है। मेरे शरीरसे मांस निकालकर प्रेमपूर्वक खाओ न । तुम इतनी देरसे खड़े क्यों हो? तुम्हारे मनमें मुझे खानेका विचार क्यों नहीं हो रहा है ?’

व्याघ्र बोला-बकरी ! इस स्थानपर आते ही मेरे मनसे द्वेषका भाव निकल गया। भूख-प्यास भी मिट गयी। इसलिये पास आनेपर भी अब मैं तुझे खाना नहीं चाहता। व्याघ्रके यों कहनेपर बकरी बोली-‘न जाने मैं कैसे निर्भय हो गयी हैं। इसमें क्या कारण हो सकता है? यदि तुम जानते हो तो बताओ।’ यह सुनकर व्याघ्रने कहा-‘मैं भी नहीं जानता। चलो, सामने खड़े हुए इन महापुरुषसे पूछे।’ ऐसा निश्चय करके वे दोनों वहाँसे चल दिये। उन दोनोंके स्वभावमें यह विचित्र परिवर्तन देखकर मैं विस्मयमें पड़ा था। इतने में ही उन्होंने मुझसे ही आकर प्रश्न किया । वहाँ वृक्षकी शाखापर एक वानरराज था। उन दोनोंके साथ मैंने भी वानरराजसे पूछा। विप्रवर ! मेरे पूछनेपर वानरराजने आदरपूर्वक
कहा-‘अजापाल ! सुनो, इस विषयमें मैं तुम्हें प्राचीन वृत्तान्त सुनाता हूँ।

यह सामने वनके भीतर जो बहुत बड़ा मन्दिर है, उसकी ओर देखो। इसमें ब्रह्माजीका स्थापित किया हुआ एक शिवलिङ्ग है। पूर्वकालमें यहाँ सुकर्मा नामक एक बुद्धिमान् महात्मा रहते थे, जो तपस्यामें संलग्न होकर इस मन्दिरमें उपासना करते थे। वे वनमेंसे फूलोंका संग्रह कर लाते और नदीके जलसे पूजनीय भगवान् शङ्करको स्नान कराकर उन्हींसे उनकी पूजा किया करते थे। इस प्रकार आराधनाका कार्य करते हुए सुकर्मा यहाँ निवास करते थे। बहुत समयके बाद उनके समीप किसी अतिथिका आगमन हुआ। सुकर्माने भोजनके लिये फल लाकर अतिथि को अर्पण किया और कहा-‘विद्वन् ! मैं केवल तत्त्वज्ञानकी इच्छासे भगवान् शङ्करकी आराधना करता हूँ। आज इस आराधना का फल परिपक्व होकर मुझे मिल गया; क्योंकि इस समय आप-जैसे महापुरुषने मुझपर अनुग्रह किया है।’

( Bhagwat Geeta dwitiya adhyay )

सुकर्माके ये मधुर वचन सुनकर तपस्याके धनी महात्मा अतिथिको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने एक शिलाखण्डपर गीताका दूसरा अध्याय लिख दिया और ब्राह्मणको उसके पाठ एवं अभ्यासके लिये आज्ञा देते हुए कहा-‘ब्रह्मन् ! इससे तुम्हारा आत्मज्ञान सम्बन्धी मनोरथ अपने-आप सफल हो जायगा ।’ यों कहकर वे बुद्धिमान् तपस्वी सुकर्माके सामने ही उनके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये। सुकर्मा विस्मित होकर उनके आदेश के अनुसार निरन्तर गीताके द्वितीय अध्यायका अभ्यास करने लगे। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् अन्तःकरण शुद्ध होकर उन्हें आत्मज्ञानकी प्राप्ति हुई। फिर वे जहाँ-जहाँ गये, वहाँ-वहाँका तपोवन शान्त हो गया। उनमें शीत-उष्ण और राग-द्वेष आदिकी बाधाएँ दूर हो गयीं। इतना ही नहीं, उन स्थानोंमें भूख-प्यासका कष्ट भी जाता रहा तथा भयका सर्वथा अभाव हो गया। यह सब द्वितीय अध्यायका जप करनेवाले सुकर्मा ब्राह्मणकी तपस्याका ही प्रभाव समझो।

मित्रवान् कहता है वानरराजके यों कहने पर मैं प्रसन्नतापूर्वक बकरी और बाघके साथ उस मन्दिरकी ओर गया। वहाँ जाकर शिलाखण्डपर लिखे गीताके द्वितीय अध्यायको मैंने देखा और पढ़ा। उसीकी आवृत्ति करनेसे मैंने तपस्याका पार पा लिया है। अतः भद्रपुरुष ! तुम भी सदा द्वितीय अध्यायकी ही आवृत्ति किया करो। ऐसा करनेपर मुक्ति तुमसे दूर नहीं रहेगी।

भगवान कृष्ण कहते हैं—प्रिये ! मित्रवानके इस प्रकार आदेश देनेपर देवशर्माने उसका पूजन किया और उसे प्रणाम करके पुरन्दरपुरकी राह ली। वहाँ किसी देवालयमें पूर्वोक्त आत्मज्ञानी महात्माको पाकर उन्होंने यह सारा वृत्तान्त निवेदन किया और सबसे पहले उन्हींसे द्वितीय
अध्यायको पढ़ा। उनसे उपदेश पाकर शुद्ध अन्तःकरणवाले सुकर्मा प्रतिदिन बड़ी श्रद्धाके साथ द्वितीय अध्यायका पाठ करने लगे। तबसे उन्होंने अनवद्य (प्रशंसाके योग्य) परमपदको प्राप्त कर लिया। लक्ष्मी ! यह द्वितीय अध्यायका उपाख्यान कहा गया।

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

अथ द्वितीयोऽध्यायः

सञ्जय उवाच

तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः । १।
श्रीभगवानुवाच कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वमकीर्तिकरमर्जुन ।२।
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते । क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप । ३ ।

अर्जुन उवाच

कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन । इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजास्वरिसूदन । ४।
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके। हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् । ५ ।
न चैद्विद्यः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः। यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः । ६ ।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः। यच्छ्यः स्यानिश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।७।
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्। अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्। ८।

सञ्जय उवाच

एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप । न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह। ९ ।
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः । १०।

श्रीभगवानुवाच

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । गतासूनगतासुंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः । ११ ।
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः । न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्। १२ ।
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहान्तरप्राप्तिर्षीरस्तत्र न मुह्यति । १३ ।
मात्रास्पर्शास्तु पृषेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तास्तितिक्षस्व भारत। १४ ।
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते। १५॥
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः । १६ ।
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति । १७
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत । १८
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते । १९
न जायते नियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे । २० ।

श्रीभगवानुवाच

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् । कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्। २१ ।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही । २२।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः । २३ ।
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः । २४ ।
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते । तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि । २५ ।
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि । २६।
जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु वं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि । २७ ।
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना। २८।
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः। आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् । २९ ।

श्रीभगवानुवाच

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि । ३० ।
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धाद्धि युद्धाच्छ्योऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते । ३१ ।
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् । ३२ ।
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्य सङ्ग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्म कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि । ३३।
अकीर्तिचापिभूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् । सम्भावितस्य चाकीर्तिमरणादतिरिच्यते । ३४।
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः । येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् । ३५।

अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः । निन्दन्तस्तव सामर्थ्य ततो दुःखतरं नु किम् । ३६ ।
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः । ३७ ।
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि । ३८।
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिोगे त्विमां शृणु। बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि । ३९ ।
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् । ४०

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्। ४१ ।
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः । ४२ ।
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् । क्रियाविशेषबहुला भोगैश्वर्यगति प्रति । ४३ ।
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् । व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते। ४४ ।
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्। ४५।
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके। तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः । ४६ ।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि । ४७ ।

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते । ४८।
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय । बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः । ४९।
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्। ५०।
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः । जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्। ५१।
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च । ५२।
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला । समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि । ५३।

अर्जुन उवाच

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्। ५४ ।

श्रीभगवानुवाच

प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्यार्थ मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते। ५५ ।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते । ५६।
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् । नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता। ५७।
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता। ५८।
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । रसवर्ज रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते । ५९।
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः । ६० ।
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः । वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता। ६१ ।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते । सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्नोधोऽभिजायते। ६२।

श्रीभगवानुवाच

क्रोधाद्भवति सम्मोहःसम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति । ६३ ।
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् । आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति । ६४।
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते । प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते । ६५ ।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना । न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्। ६६ ।
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । तदस्य हरति प्रज्ञां वायु वमिवाम्भसि । ६७ ।
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता। ६८।

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः । ६९ ।
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यत्। तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वेस शान्तिमाप्नोति न कामकामी। ७०।
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः । निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति । ७१ ।
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति । ७२ ।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे साङ्ख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

दूसरा अध्याय ( हिन्दी में )

सञ्जय बोले कि पूर्वोक्त प्रकारसे करुणा करके व्याप्त और आँसुओंसे पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रोंवाले शोकयुक्त उस अर्जुनके प्रति भगवान् मधुसूदनने यह वचन कहा। १।

कृष्ण बोले हे अर्जुन ! तुमको इस विषमस्थलमें यह अज्ञान किस हेतुसे प्राप्त हुआ? क्योंकि यह न तो श्रेष्ठ पुरुषोंसे आचरण किया गया है, न स्वर्गको देनेवाला है, न कीर्तिको करनेवाला है। २।

इसलिये हे अर्जुन ! नपुंसकताको मत प्राप्त हो, यह तेरे योग्य नहीं है। हे परंतप ! तुच्छ हृदयकी दुर्बलताको त्यागकर युद्धके लिये खड़ा हो।३।
तब अर्जुन बोले कि हे मधुसूदन ! मैं रणभूमिमें भीष्मपितामह और द्रोणाचार्यके प्रति किस प्रकार बाणोंसे युद्ध करूँगा, क्योंकि हे अरिसूदन ! वे दोनों ही पूजनीय हैं। ४ ।

इसलिये इन महानुभाव गुरुजनोंको न मारकर इस लोकमें भिक्षाका अन्न भी भोगना कल्याणकारक समझता हूँ, क्योंकि गुरुजनोंको मारकर भी इस लोकमें रुधिरसे सने अर्थ और कामरूप भोगोंको ही तो भोगूंगा। ५ ।

और हमलोग यह भी नहीं जानते कि हमारे लिये क्या करना श्रेष्ठ है अथवा यह भी नहीं जानते कि हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही धृतराष्ट्रके पुत्र हमारे सामने खड़े हैं। ६।

इसलिये कायरतारूप दोष करके उपहत हुए स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहितचित्त हुआ मैं, आपको पूछता हूँ जो कुछ निश्चय किया हुआ कल्याणकारक साधन हो, वह मेरे लिये कहिये; क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिये आपके शरण हुए मेरेको शिक्षा दीजिये। ७।

क्योंकि भूमिमें निष्कण्टक धनधान्यसम्पन्न राज्यको और देवताओंके स्वामीपनेको प्राप्त होकर भी मैं उस उपायको नहीं देखता हूँ जो कि मेरी इन्द्रियोंके सुखानेवाले शोकको दूर कर सके। ८।

( Bhagwat Geeta dwitiya adhyay )

श्री सञ्जय बोले, हे राजन् ! निद्राको जीतने वाले अर्जुन अन्तर्यामी श्रीकृष्ण महाराजके प्रति इस प्रकार कहकर फिर श्रीगोविन्द भगवान्से ‘युद्ध नहीं करूँगा’ ऐसे स्पष्ट कहकर चुप हो गये। ९।

उसके उपरान्त हे भरतवंशी धृतराष्ट्र ! अन्तर्यामी श्रीकृष्ण महाराजने दोनों सेनाओंके बीचमें उस शोकयुक्त अर्जुनको हँसते हुए-से यह वचन कहे । १० ।

अर्जुन ! तू न शोक करनेयोग्योंके लिये शोक करता है और पण्डितोंके-से वचनोंको कहता है; परंतु पण्डितजन जिनके प्राण चले गये हैं उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये हैं उनके लिये भी शोक नहीं करते हैं। ११ ।

क्योंकि आत्मा नित्य है। इसलिये शोक करना अयुक्त है। वास्तवमें न तो ऐसा ही है कि मैं किसी कालमें नहीं था अथवा तू नहीं था अथवा ये राजालोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे। १२ ।

Durga saptashati keelakam stotram

किंतु जैसे जीवात्माकी इस देहमें कुमार, युवा और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीरकी प्राप्ति होती है, उस विषयमें धीर पुरुष नहीं मोहित होता है अर्थात् जैसे कुमार, युवा और जरावस्थारूप स्थूल शरीरका विकार अज्ञानसे आत्मामें भासता है, वैसे ही एक शरीरसे दूसरे शरीरको प्राप्त होनारूप सूक्ष्मशरीरका विकार भी अज्ञानसे ही आत्मामें भासता है, इसलिये तत्त्वको जाननेवाला धीर पुरुष इस विषयमें नहीं मोहित होता है। १३ ।

हे कुन्तीपुत्र ! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःखको देनेवाले इन्द्रिय और विषयोंके संयोग क्षणभङ्गुर और अनित्य हैं, इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन ! उनको तू सहनकर । १४ ।

क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ ! दुःख-सुखको समान समझनेवाले जिस धीर पुरुषको ये इन्द्रियों के विषय व्याकुल नहीं कर सकते वह मोक्ष के लिये योग्य होता है। १५।

और हे अर्जुन ! असत् वस्तुका तो अस्तित्व नहीं है और सत्का अभाव नहीं है, इस प्रकार इन दोनोंका ही तत्त्वज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है।१६।

इस न्यायके अनुसार नाशरहित तो उसको जान कि जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, क्योंकि इस अविनाशीका विनाश करनेको कोई भी समर्थ नहीं है। १७।

( Bhagwat Geeta dwitiya adhyay )

और इस नाशरहित अप्रमेय नित्यस्वरूप जीवात्माके ये सब शरीर नाशवान् कहे गये हैं, इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन ! तू युद्ध कर । १८।

मा जो इस आत्माको मारनेवाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते हैं; क्योंकि यह आत्मा न मारता है और न मारा जाता है। १९।

यह आत्मा किसी कालमें भी न जन्मता है और न मरता है अथवा न यह आत्मा हो करके फिर होनेवाला है; क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीरके नाश होनेपर भी यह नाश नहीं होता है। २० ।

हे पृथापुत्र अर्जुन ! जो पुरुष इस आत्माको नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है। २१ ।

और यदि तू कहे कि मैं तो शरीरोंके वियोगका शोक करता हूँ तो यह भी उचित नहीं है; क्योंकि जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रोंको त्यागकर दूसरे नये वस्त्रोंको ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरोंको त्यागकर दूसरे नये शरीरोंको प्राप्त होता है। २२ ।

अर्जुन ! इस आत्माको शस्त्रादि नहीं काट सकते हैं और इसको आग नहीं जला सकती और इसको जल गीला नहीं कर सकते हैं और वायु नहीं सुखा सकता है। २३ ।

Durga mata kavach path || हर तरफ से रक्षा होगी |

क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह, अक्लेद्य और अशोष्य है तथा यह आत्मा निःसंदेह नित्य, सर्वव्यापक, अचल, स्थिर रहनेवाला और सनातन है। २४ ।

यह आत्मा अव्यक्त अर्थात् इन्द्रियोंका अविषय और यह आत्मा अचिन्त्य अर्थात् मनका अविषय और यह आत्मा विकार रहित अर्थात् न बदलने-वाला कहा गया है, इससे हे अर्जुन ! इस आत्माको ऐसा जानकर तू शोक करनेयोग्य नहीं है अर्थात् तुझे शोक करना उचित नहीं है। २५ ।

यदि तू इसको सदा जन्मने और सदा मरने वाला माने तो भी हे अर्जुन ! इस प्रकार शोक करनेको योग्य नहीं है । २६ ।

( Bhagwat Geeta dwitiya adhyay )

क्योंकि ऐसा होनेसे तो जन्मनेवालेकी निश्चित मृत्यु और मरनेवालेका निश्चित जन्म होना सिद्ध हुआ, इससे भी तू इस बिना उपायवाले विषयमें शोक करने को योग्य नहीं है। २७।

यह भीष्मादिकोंके शरीर मायामय होनेसे अनित्य हैं, इससे शरीरोंके लिये भी शोक करना उचित नहीं; क्योंकि हे अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणी जन्मसे पहले बिना शरीर वाले और मरनेके बाद भी बिना शरीरवाले ही हैं, केवल बीचमें ही शरीरवाले प्रतीत होते हैं, फिर उस विषयमें क्या चिन्ता है। २८ ।

हे अर्जुन ! यह आत्मतत्त्व बड़ा गहन है, इसलिये कोई महापुरुष ही इस आत्माको आश्चर्यकी ज्यों देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही आश्चर्यकी ज्यों इसके तत्त्वको कहता है और दूसरा कोई ही इस आत्माको आश्चर्यकी ज्यों सुनता है और कोई-कोई सुनकर भी इस आत्माको नहीं जानता। २९ ।

अर्जुन ! यह आत्मा सबके शरीरमें सदा ही अवध्य है, इसलिये सम्पूर्णभूतप्राणियों के लिये तू शोक करनेको योग्य नहीं है।३० ।
और अपने धर्मको देखकर भी तू भय करने को योग्य नहीं है; क्योंकि धर्मयुक्त युद्धसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारक कर्तव्य
क्षत्रियके लिये नहीं है । ३१ ।

हे पार्थ ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले स्वर्गके द्वाररूप इस प्रकारके युद्धको भाग्यवान् क्षत्रियलोग ही पाते हैं। ३२ । और यदि तू इस धर्मयुक्त संग्रामको नहीं करेगा तो स्वधर्मको और कीर्तिको खोकर पापको प्राप्त होगा। ३३ ।

और सब लोग तेरी बहुत कालतक रहनेवाली अपकीर्तिको भी कथन करेंगे और वह अपकीर्ति माननीय पुरुषके लिये मरणसे भी अधिक बुरी होती है । ३४।

और जिनके तू बहुत माननीय होकर भी अब तुच्छताको प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भयके कारण युद्धसे उपराम हुआ मानेंगे। ३५ ।

( Bhagwat Geeta dwitiya adhyay )

और तेरे वैरीलोग तेरे सामर्थ्यकी निन्दा करते हुए बहुत-से न कहनेयोग्य वचनों को कहेंगे, फिर उससे अधिक दुःख क्या होगा। ३६ ।

इससे युद्ध करना तेरे लिये सब प्रकारसे अच्छा क्योंकि या तो मरकर स्वर्गको प्राप्त होगा अथवा जीतकर पृथ्वीको भोगेगा, इससे हे अर्जुन ! युद्धके लिये निश्चयवाला होकर खड़ा हो । ३७ ।

यदि तुझे स्वर्ग तथा राज्यकी इच्छा न हो तो भी सुख-दुःख, लाभ- हानि और जय-पराजयको समान समझकर उसके उपरान्त युद्धके लिये तैयार हो, इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा। ३८ ।

Madanan Mata Sadhana ।। मदानन माता साधना।

हे पार्थ ! यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोगके* विषयमें कही गयी और इसीको अब निष्काम कर्मयोगके। विषयमें सुन, जिस बुद्धिसे युक्त हुआ तू कर्मोके बन्धनको अच्छी तरहसे नाश करेगा। ३९ ।

इस निष्काम कर्मयोगमें आरम्भका अर्थात् बीजका नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं होता है, इसलिये इस निष्काम कर्मयोगरूप धर्मका थोड़ा भी साधन जन्म-मृत्युरूप महान् भयसे उद्धार कर देता है। ४० ।

अर्जुन हे पाथ ! इस कल्याणमार्गमें निश्चयात्मक बुद्धि एक ही है और अज्ञानी (सकामी) पुरुषोंकी बुद्धियाँ बहुत भेदोंवाली अनन्त होती हैं। ४१ ।

हे अर्जुन ! जो सकामी पुरुष केवल फलश्रुतिमें प्रीति रखनेवाले, स्वर्गको ही परमश्रेष्ठ माननेवाले, इससे बढ़कर और कुछ नहीं है ऐसे कहनेवाले हैं, वे अविवेकीजन जन्मरूप कर्मफलको देनेवाली और भोग तथा ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये बहुत-सी क्रियाओंके विस्तारवाली, इस प्रकारकी जिस दिखाऊ शोभायुक्त वाणीको कहते हैं। ४२-४३ ।

उस वाणीद्वारा हरे हुए चित्तवाले तथा भोग और ऐश्वर्यमें आसक्तिवाले, उन पुरुषोंके अन्तःकरणमें निश्चयात्मक बुद्धि नहीं होती है। ४४ ।

अर्जुन ! सब वेद तीनों गुणोंके कार्यरूप संसारको विषय करनेवाले अर्थात् प्रकाश करनेवाले हैं; इसलिये तू असंसारी अर्थात् निष्कामी और सुख- दुःखादि द्वन्द्वोंसे रहित नित्य वस्तुमें स्थित तथा योग क्षेमको न चाहनेवाला और आत्मपरायण हो । ४५।

क्योंकि मनुष्यका सब ओरसे परिपूर्ण जलाशयके प्राप्त होनेपर छोटे जलाशयमें जितना प्रयोजन रहता है,अच्छी प्रकार ब्रह्मको जाननेवाले ब्राह्मणका भी सब वेदोंमें उतना ही प्रयोजन रहता है अर्थात् जैसे बड़े जलाशयके प्राप्त हो जानेपर जलके लिये छोटे जलाशयोंकी आवश्यकता नहीं रहती, वैसे ही ब्रह्मानन्दकी प्राप्ति होनेपर आनन्दके लिये वेदोंकी आवश्यकता नहीं रहती। ४६।

( Bhagwat Geeta dwitiya adhyay )

इससे तेरा कर्म करनेमात्रमें ही अधिकार होवे, फलमें कभी नहीं और तू कोंके फलकी वासनावाला भी मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी प्रीति न होवे । ४७ ।

हे धनञ्जय ! आसक्तिको त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धिमें समान बुद्धिवाला होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोको कर, यह
समत्वभाव* ही योग नामसे कहा जाता है। ४८।

इस समत्वरूप बुद्धियोगसे सकाम कर्म अत्यन्त तुच्छ है, इसलिये हे धनञ्जय ! समत्व बुद्धियोगका आश्रय ग्रहण कर; क्योंकि फलकी वासनावाले अत्यन्त दीन हैं। ४९ ।

समत्व-बुद्धियुक्त पुरुष पुण्य-पाप दोनोंको इस लोकमें ही त्याग देता है अर्थात् उनसे लिपायमान नहीं होता, इससे समत्वबुद्धियोगक लिये ही चेष्टा कर, यह समत्वबुद्धिरूप योग ही कर्मोमें चतुरता है अर्थात् कर्मबन्धनसे छूटनेका उपाय है। ५० ।

क्योंकि बुद्धियोग युक्त ज्ञानीजन कोंसे उत्पन्न होनेवाले फलको त्यागकर जन्म रूप बन्धनसे छूटे हुए निर्दोष अर्थात् अमृतमय परमपदको प्राप्त होते हैं। ५१ ।

अर्जुन हे मित्र ! जिस कालमें तेरी बुद्धि मोहरूप दलदलको बिलकुल तर जायगी तब तू सुननेयोग्य और सुने हुएके वैराग्यको प्राप्त होगा। ५२।

जब तेरी अनेक प्रकारके सिद्धान्तोंको सुननेसे विचलित हुई बुद्धि परमात्माके स्वरूपमें अचल और स्थिर ठहर जायगी तब तू समत्वरूप योगको प्राप्त होगा। ५३ ।

इस प्रकार भगवानके वचनोंको सुनकर अर्जुनने पूछा-हे केशव ! समाधिमें स्थित स्थिरबुद्धिवाले पुरुषका क्या लक्षण है ? और स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है ? कैसे बैठता है ? कैसे चलता है ? । ५४ ।

उसके उपरान्त श्रीकृष्ण महाराज बोले, हे अर्जुन ! जिस कालमें यह पुरुष मनमें स्थित सम्पूर्ण कामनाओंको त्याग देता है, उस कालमें आत्मासे ही आत्मामें संतुष्ट हुआ स्थिरबुद्धिवाला कहा जाता है। ५५ ।

तथा दुःखोंकी प्राप्तिमें उद्वेगरहित है मन जिसका और सुखोंकी प्राप्तिमें दूर हो गयी है स्पृहा जिसकी तथा नष्ट हो गये हैं राग, भय और क्रोध जिसके, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है। ५६।

जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ, उन-उन शुभ तथा अशुभ वस्तुओंको प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है। ५७।

( Bhagwat Geeta dwitiya adhyay )

और कछुआ अपने अङ्गोंको जैसे समेट लेता है, वैसे ही यह पुरुष जब सब ओर से अपनी इन्द्रियोंको इन्द्रियोंके विषयोंसे समेट लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है। ५८।

यद्यपि इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंको न ग्रहण करनेवाले पुरुषके भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं परंतु राग नहीं निवृत्त होता और इस पुरुषका तो राग भी परमात्माको साक्षात् कग्छ निवृत्त हो जाता है। ५९ ।

और हे अर्जुन ! जिससे कि यत्न करते हो बुद्धिमान् पुरुषके भी मनको यह प्रमथन स्वभाववाली इन्द्रियाँ बलात् हर लेती हैं। ६० ।

इसलिये मनुष्यको चाहिये कि उन सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें करके समाहितचित्त हुआ मेरे परायण स्थित होवे, क्योंकि जिस पुरुषके इन्द्रियाँ वशमें होती हैं, उसकी ही बुद्धि स्थिर होती है। ६१ ।

हे – अर्जुन ! मनसहित इन्द्रियोंको वशमें करके मेरे परायण न होनेसे मनके द्वारा विषयोंका चिन्तन होता है और विषयोंको चिन्तन करनेवाले पुरुषकी उन विषयोंमें आसक्ति हो जाती है और आसक्तिसे उन विषयोंकी कामना उत्पन्न होती है और कामनामें विघ्न पड़नेसे क्रोध उत्पन्न होता है । ६२ ।

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क्रोधसे अविवेक अर्थात् मूढभाव उत्पन्न होता है और अविवेकसे स्मरणशक्ति भ्रमित हो जाती है और स्मृतिके भ्रमित हो जानेसे बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्तिका नाश हो जाता है और बुद्धिके नाश होनेसे यह पुरुष अपने श्रेय-साधनसे गिर जाता है। ६३ ।

परंतु स्वाधीन अन्तःकरणवाला पुरुष राग-द्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंद्वारा विषयोंको भोगता हुआ अन्तःकरणकी प्रसन्नता अर्थात् स्वच्छता को प्राप्त होता है। ६४ ।

( Bhagwat Geeta dwitiya adhyay )

उस निर्मलताके होनेपर इसके सम्पूर्ण दुःखोंका अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्तवाले पुरुषकी बुद्धि शीघ्र ही अच्छी प्रकार स्थिर हो जाती है। ६५ ।

हे अर्जुन ! साधनरहित पुरुषके अन्तःकरणमें श्रेष्ठबुद्धि नहीं होती है और उस अयुक्तके अन्तःकरणमें आस्तिकभाव भी नहीं होता है और बिना आस्तिकभाव वाले पुरुषको शान्ति भी नहीं होती, फिर शान्तिरहित पुरुषको सुख कैसे हो सकता है ? । ६६।

क्योंकि जलमें वायु नावको जैसे हर लेता है, वैसे ही विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंके बीचमें जिस इन्द्रियके साथ मन रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुषकी बुद्धिको हरण कर लेती है। ६७।

इससे हे महाबाहो ! जिस पुरुषकी इन्द्रियाँ सब प्रकार इन्द्रियोंके विषयोंसे वशमें की हुई होती हैं, उसकी बुद्धि स्थिर होती है। ६८।

और हे अर्जुन ! सम्पूर्ण भूत-प्राणियोंके लिये जो रात्रि है, उस नित्य-शुद्ध-बोधस्वरूप परमानन्दमें भगवत्को प्राप्त हुआ योगी पुरुष जागता है और जिस नाशवान् क्षणभङ्गुर सांसारिक सुखमें सब भूतप्राणी जागते हैं, तत्त्वको जाननेवाले मुनिके लिये वह रात्रि है। ६९ ।

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जैसे सब ओरसे परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठावाले समुद्रके प्रति नाना नदियोंके जल, उसको चलायमान न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही जिस स्थिरबुद्धि पुरुषके प्रति सम्पूर्ण भोग किसी प्रकारका विकार उत्पन्न किये बिना ही समा जाते हैं, वह पुरुष परम शान्तिको प्राप्त होता है, न कि भोगोंको चाहनेवाला । ७०।

क्योंकि जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंको त्यागकर, ममतारहित और अहंकार रहित, स्पृहारहित हुआ बर्तता है, वह शान्तिको प्राप्त होता है। ७१ ।

हे पाथ ! यह ब्रह्मको प्राप्त हुए पुरुषकी स्थिति है, इसको प्राप्त होकर (योगी कभी) मोहित नहीं होता है और अन्तकालमें भी इस निष्ठामें स्थित होकर ब्रह्मानन्दको प्राप्त हो जाता है। ७२ ।

इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण
और अर्जुनके संवादमें “सांख्ययोग” नामक दूसरा अध्याय ।। २ ।।

 

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