Shrimad bhagwat geeta katha || श्रीमद्भगवद्गीता प्रथम अध्याय। - MANTRAMOL

Shrimad bhagwat geeta katha || श्रीमद्भगवद्गीता प्रथम अध्याय।

श्रीमद्भगवद्गीता प्रथम अध्याय ।। Shrimad bhagwat geeta katha

Shrimad bhagwat geeta katha || श्रीमद्भगवद्गीता प्रथम अध्याय।

पाठकों आपके लिए प्रस्तुत है। “Shrimad bhagwat geeta katha” श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम अध्याय। हिन्दी मे अनुवाद सहित व प्रथम अध्याय का महत्व।

 

श्रीमद्भगवद्गीताके पहले अध्यायका माहात्म्य

श्रीपार्वतीजीने कहा-भगवन् ! आप सब तत्त्वोंके ज्ञाता हैं। आपकी कृपासे मुझे श्रीविष्णु-सम्बन्धी नाना प्रकारके धर्म सुननेको मिले, जो समस्त लोकका उद्धार करनेवाले हैं। देवेश ! अब मैं गीताका माहात्म्य सुनना चाहती हूँ, जिसका श्रवण करनेसे श्रीहरिमें भक्ति बढ़ती है।

श्रीमहादेवजी बोले-जिनका श्रीविग्रह अलसीके फूलकी भाँति श्यामवर्णका है, पक्षिराज गरुड़ ही जिनके वाहन हैं, जो अपनी महिमासे कभी च्युत नहीं होते तथा शेषनागकी शय्यापर शयन करते हैं, उन
भगवान् महाविष्णुकी हम उपासना करते हैं। एक समयकी बात है, मुर दैत्यके नाशक भगवान् विष्णु शेषनागके रमणीय आसनपर सुखपूर्वक विराजमान थे। उस समय समस्त लोकोंको आनन्द देनेवाली भगवती लक्ष्मीने आदरपूर्वक प्रश्न किया।

श्रीलक्ष्मीजीने पूछा-भगवन् ! आप सम्पूर्ण जगत्का पालन करते हुए भी अपने ऐश्वर्यके प्रति उदासीन-से होकर जो इस क्षीरसागरमें नींद ले रहे हैं, इसका क्या कारण है?

श्रीभगवान् बोले-सुमुखि ! मैं नींद नहीं लेता हूँ, अपितु तत्त्वका अनुसरण करनेवाली अन्तर्दृष्टिके द्वारा अपने ही माहेश्वर तेजका
साक्षात्कार कर रहा हूँ। देवि ! यह वही तेज है, जिसका योगी पुरुष कुशाग्र-बुद्धिके द्वारा अपने अन्तःकरणमें दर्शन करते हैं तथा जिसे मीमांसक विद्वान् वेदोंका सार-तत्त्व निश्चित करते हैं। वह माहेश्वर तेज एक, अजर, प्रकाशस्वरूप, आत्मरूप रोग-शोकसे रहित, अखण्ड आनन्दका पुञ्ज, निष्पन्द (निरीह) तथा द्वैतरहित है। इस जगत्का जीवन उसीके अधीन है। मैं उसीका अनुभव करता हूँ। देवेश्वरि ! यही कारण है कि मैं तुम्हें नींद लेता-सा प्रतीत हो रहा हूँ।

( Shrimad bhagwat geeta katha 1 )

श्रीलक्ष्मीजीने कहा-हषीकेश ! आप ही योगी पुरुषोंके ध्येय हैं। आपके अतिरिक्त भी कोई ध्यान करनेयोग्य तत्त्व है, यह जानकर मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा है। इस चराचर जगत्की सृष्टि और संहार करने वाले स्वयं आप ही हैं। आप सर्वसमर्थ हैं। इस प्रकारकी स्थितिमें होकर भी यदि आप उस परम तत्त्वसे भिन्न हैं तो मुझे उसका बोध कराइये।

श्रीभगवान् बोले-प्रिये ! आत्माका स्वरूप द्वैत और अद्वैतसे पृथक्, भाव और अभावसे मुक्त तथा आदि और अन्तसे रहित है। शुद्ध ज्ञानके प्रकाशसे उपलब्ध होनेवाला तथा परमानन्दस्वरूप होनेके कारण एकमात्र सुन्दर है । वही मेरा ईश्वरीय रूप है। आत्माका एकत्व ही सबके द्वारा जाननेयोग्य है। गीताशास्त्रमें इसीका प्रतिपादन हुआ है। अमित तेजस्वी भगवान् विष्णुके ये वचन सुनकर लक्ष्मी देवीने शङ्का उपस्थित करते हुए कहा भगवन् ! यदि आपका स्वरूप स्वयं परमानन्दमय और मन-वाणीकी पहुँचके बाहर है तो गीता कैसे उसका बोध कराती है ? मेरे इस संदेहका आप निवारण कीजिये।

श्रीभगवान् बोले-सुन्दरि ! सुनो, मैं गीतामें अपनी स्थितिका वर्णन करता हूँ। क्रमशः पाँच अध्यायोंको तुम पाँच मुख जानो, दस
अध्यायोंको दस भुजाएँ समझो तथा एक अध्यायको उदर और दो अध्यायोंको दोनों चरणकमल जानो। इस प्रकार यह अठारह अध्यायोंकी वाङ्मयी ईश्वरीय मूर्ति ही समझनी चाहिये ।* यह ज्ञानमात्रसे ही महान् पातकोंका नाश करनेवाली है। जो उत्तम बुद्धिवाला पुरुष गीताके एक या
आधे अध्यायका अथवा एक, आधे या चौथाई श्लोकका भी प्रतिदिन अभ्यास करता है, वह सुशर्माके समान मुक्त हो जाता है।

श्रीलक्ष्मीजीने पूछा–देव ! सुशर्मा कौन था ? किस जातिका था और किस कारणसे उसकी मुक्ति हुई ?

( Shrimad bhagwat geeta katha 2 )

श्रीभगवान् बोले-प्रिये  ! सुशर्मा बड़ी खोटी बुद्धिका मनुष्य था । पापियोंका तो वह शिरोमणि ही था। उसका जन्म वैदिक ज्ञानसे शून्य एवं क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले ब्राह्मणोंके कुलमें हुआ था। वह न ध्यान करता था, न जप; न होम करता था, न अतिथियोंका सत्कार । वह लम्पट
होनेके कारण सदा विषयोंके सेवनमें ही आसक्त रहता था। हल जोतता और पत्ते बेचकर जीविका चलाता था। उसे मदिरा पीनेका व्यसन था तथा वह मांस भी खाया करता था। इस प्रकार उसने अपने जीवन का दीर्घकाल व्यतीत कर दिया । एक दिन मूढ़ बुद्धि सुशर्मा पत्ते लानेके लिये किसी ऋषिकी वाटिकामें घूम रहा था। इसी बीच में कालरूपधारी काले साँपने उसे डस लिया। सुशर्माकी मृत्यु हो गयी। तदनन्तर वह अनेक नरकोंमें जा वहाँकी यातनाएँ भोगकर मर्त्यलोकमें लौट आया और वहाँ बोझ ढोनेवाला बैल हुआ।

उस समय किसी पङ्गने अपने जीवनको आरामसे व्यतीत करने के लिये उसे खरीद लिया। बैलने अपनी पीठपर पङ्गुका भार ढोते हुए बड़े कष्टसे सात-आठ वर्ष बिताये । एक दिन पड़ पङ्गुने किसी ऊँचे स्थानपर बहुत देरतक बड़ी तेजीके साथ उस बैलको घुमाया। इससे वह थककर बड़े वेगसे पृथ्वीपर गिरा और मूर्छित हो गया। उस समय वहाँ कुतूहलवश आकृष्ट हो बहुत-से लोग एकत्रित हो गये। उस जनसमुदायमेंसे किसी पुण्यात्मा व्यक्तिने उस बैलका कल्याण करनेके लिये उसे अपना पुण्यदान किया।

( Shrimad bhagwat geeta katha 3 )

तत्पश्चात् कुछ दूसरे लोगोंने भी अपने-अपने पुण्योंको याद करके उन्हें उसके लिये दान किया। उस भीड़में एक वेश्या भी खड़ी थी। उसे अपने पुण्यका पता नहीं था तो भी उसने लोगोंकी देखा-देखी उस बैलके लिये कुछ त्याग किया। तदनन्तर यमराजके दूत उस मरे हुए प्राणीको पहले यमपुरीमें ले गये। वहाँ यह विचारकर कि यह वेश्याके दिये हुए पुण्यसे पुण्यवान् हो गया है, उसे छोड़ दिया गया।

फिर वह भूलोकमें आकर उत्तम कुल और शीलवाले ब्राह्मणोंके घरमें उत्पन्न हुआ। उस समय भी उसे अपने पूर्व जन्मकी बातोंका स्मरण बना रहा। बहुत दिनोंके बाद अपने अज्ञानको दूर करनेवाले कल्याण-तत्त्वका जिज्ञासु होकर वह उस वेश्याके पास गया और उसके दानकी बात बतलाते हुए उसने पूछा-‘तुमने कौन-सा पुण्यदान किया था ?’ वेश्याने उत्तर दिया-‘वह पिंजरेमें बैठा हुआ तोता प्रतिदिन कुछ पढ़ता है। उससे मेरा अन्तःकरण पवित्र हो गया है। उसीका पुण्य मैंने तुम्हारे लिये दान किया था।’ इसके बाद उन दोनोंने तोतेसे पूछा। तब उस तोतेने अपने पूर्वजन्मका स्मरण करके प्राचीन इतिहास कहना आरम्भ किया।

( Shrimad bhagwat geeta katha 4)

शुक बोला–पूर्वजन्ममें मैं विद्वान् होकर भी विद्वत्ताके अभिमानसे मोहित रहता था। मेरा राग-द्वेष इतना बढ़ गया था कि मैं गुणवान् विद्वानोंके प्रति भी ईर्ष्याभाव रखने लगा। फिर समयानुसार मेरी हो गयी और मैं अनेकों घृणित लोकोंमें भटकता फिरा । उसके बाद इस लोकमें आया। सद्गुरुकी अत्यन्त निन्दा करनेके कारण तोतेके कुलमें मेरा जन्म हुआ। पापी होनेके कारण छोटी अवस्थामें ही मेरा माता-पितासे वियोग हो गया। एक दिन मैं ग्रीष्म-ऋतुमें तपे मार्गपर पड़ा था। वहाँसे कुछ श्रेष्ठ मुनि मुझे उठा लाये और महात्माओंके आश्रयमें आश्रमके भीतर एक पिंजरेमें उन्होंने मुझे डाल दिया। वहीं मुझे पढ़ाया गया। ऋषियोंके बालक बड़े आदरके साथ गीताके प्रथम अध्यायकी आवृत्ति करते थे।

उन्हींसे सुनकर मैं भी बारंबार पाठ करने लगा। इसी बीचमें एक चोरी करनेवाले बहेलियेने मुझे वहाँसे चुरा लिया। तत्पश्चात् इस देवीने मुझे खरीद लिया। यही मेरा वृत्तान्त है, जिसे मैंने आपलोगोंसे बता दिया। पूर्वकालमें मैंने इस प्रथम अध्यायका अभ्यास किया था, जिससे मैंने अपने पापको दूर किया है। फिर उसीसे इस वेश्याका भी अन्तःकरण शुद्ध हुआ है और उसीके पुण्यसे ये द्विजश्रेष्ठ सुशर्मा भी पापमुक्त हुए हैं। इस प्रकार परस्पर वार्तालाप और गीताके प्रथम अध्यायके माहात्म्यकी प्रशंसा करके वे तीनों निरन्तर अपने-अपने घरपर गीता का अभ्यास करने लगे। फिर ज्ञान प्राप्त करके वे मुक्त हो गये । इसलिये जो गीता के प्रथम अध्यायको पढ़ता, सुनता तथा अभ्यास करता है, उसे इस भवसागरको पार करने में कोई कठिनाई नहीं होती

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

अथ श्रीमद्भगवद्गीता

अथ प्रथमोऽध्यायः

धृतराष्ट्र उवाच

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय । १।

सञ्जय उवाच

दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा। आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत्। २।
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् । व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता।३।
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः । ४।
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् । पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः । ५।
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् । सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः । ६।
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम । नायका मम सैन्यस्य सज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते । ७ ।
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः । अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च। ८।
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः । नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः । ९ ।
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् । पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्। १०।

सञ्जय उवाच

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः । भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि । ११ ।
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः । सिंहनादं विनयोच्चैः शङ्ख दध्मौ प्रतापवान् । १२ ।
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः । सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् । १३ ।
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ । माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः । १४ ।
पाञ्चजन्य हषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः। पौण्ड् दध्मौ महाशङ्ख भीमकर्मा वृकोदरः । १५ ।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ । १६ ।
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः । धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः । १७ ।
द्रुपदा द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते । सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक् पृथक् । १८ ।
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् । नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् । १९ ।
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः । प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः । २० ।
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।

अर्जुन उवाच

सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत । २१ ।
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्भुकामानवस्थितान् । कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे । २२ ॥
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः । धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेयुद्धे प्रियचिकीर्षवः । २३ ।

सञ्जय उवाचनमा

एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्। २४॥
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् । उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान्कुरूनिति । २५।
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितृनथ पितामहान् ।आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा । २६ ।
श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि । तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धूनवस्थितान् । २७ ।
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।

अर्जुन उवाच

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्। २८ ।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते। २९ ।
| गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते । न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः । ३० ।
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव । न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे । ३१ ।
न काले विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च । किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगै वितेन वा । ३२।
येषामर्थे काशितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च । त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च । ३३ ।
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा । ३४ ।
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्रतोऽपि मधुसूदन । अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते । ३५।
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याजनार्दन । पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः । ३६ ।

अर्जुन उवाच

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् । स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव । ३७।
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः । कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् । ३८ ।
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् । कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन । ३९ ।
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः । धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत। ४०।
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः । ४१ ।
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः । ४२ ।
दोषेरेतेः कुलघ्नाना वर्णसङ्करकारकैः । उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः । ४३ ।
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन । नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम । ४४ ।
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् । यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः । ४५।
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् । ४६ ।

सञ्जय उवाच

एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्। विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः । ४७नमः

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो
नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

पहला अध्याय ( हिन्दी मे अर्थ )

धृतराष्ट्र बोले, हे सञ्जय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्रमें इकट्ठे हुए युद्धकी इच्छावाले मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने क्या किया ? । १।

इसपर सञ्जय बोले, उस समय राजा दुर्योधनने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवोंकी सेनाको देखकर और द्रोणाचार्यके पास जाकर यह वचन कहा-।२।

हे आचार्य ! आपके बुद्धिमान् शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नद्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रोंकी इस बड़ी भारी सेनाको देखिये। ३।

इस सेनामें बड़े-बड़े धनुषोंवाले युद्धमें भीम और अर्जुनके समान बहुत-से शूरवीर हैं, जैसे सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद । ४ ।

और धृष्टकेतु, चेकितान तथा बलवान् काशिराज, पुरुजित्, कुन्तिभोज और मनुष्योंमें श्रेष्ठ शैव्य । ५।

और पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान् उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु और द्रौपदीके पाँचों पुत्र-ये सभी महारथी हैं। ६

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! हमारे पक्षमें भी जो-जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिये, आपके जाननेके लिये मेरी सेनाके जो-जो सेनापति हैं, उनको कहता हूँ। ७।

एक तो स्वयं आप और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्तका पुत्र भूरिश्रवा । ८।

तथा और भी बहुत-से शूरवीर अनेक प्रकारके शस्त्र-अस्त्रोंसे युक्त मेरे लिये जीवनकी आशाको त्यागनेवाले सब-के-सब युद्धमें चतुर हैं। ९।

भीष्मपितामहद्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकारसे अजेय है और भीमद्वारा रक्षित इन लोगोंकी यह सेना जीतने में सुगम है। १० ।

इसलिये सब मो!पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आपलोग सब-के-सब ही निःसन्देह भीष्मपितामहकी ही सब ओरसे रक्षा करें। ११ ।

इस प्रकार द्रोणाचार्यसे कहते हुए दुर्योधनके वचनोंको सुनकर कौरवोंमें वृद्ध बड़े प्रतापी पितामह भीष्मने उस दुर्योधनके हृदयमें हर्ष उत्पन्न करते हुए उच्च स्वरसे सिंहकी नादके समान गर्जकर बजाया। १२ ।

पहला अध्याय ( हिन्दी मे अर्थ )

उसके उपरान्त शङ्ख और नगारे तथा ढोल, मृदङ्ग और नृसिंहादि बाजे एक साथ ही बजे, उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ। १३ ।

उसके अनन्तर सफेद घोड़ोंसे युक्त उत्तम रथमें बैठे हुए श्रीकृष्ण महाराज और अर्जुनने भी अलौकिक शङ्ख बजाये। १४ ।

उनमें श्रीकृष्ण महाराजने पाञ्चजन्य नामक शङ्ख और अर्जुनने देवदत्त नामक शङ्ख बजाया, भयानक कर्मवाले भीमसेनने पौण्ड्र नामक महाशङ्ख बजाया। १५ ।

कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने अनन्तविजय नामक शङ्ख और नकुल तथा सहदेवने सुघोष और मणिपुष्पक नामवाले शङ्ख बजाये। १६ ।

श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज और महारथी शिखण्डी और धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि । १७ ।

तथा राजा द्रुपद और द्रौपदीके पाँचों पुत्र और बड़ी भुजावाले सुभद्रापुत्र अभिमन्यु, इन सबने हे राजन् ! अलग-अलग शङ्ख बजाये । १८।

और उस भयानक शब्दने आकाश और पृथ्वीको भी शब्दायमान करते हुए धृतराष्ट्र-पुत्रोंके हृदय विदीर्ण कर दिये। १९।

हे राजन् ! उसके उपरान्त कपिध्वज अर्जुनने खड़े हुए धृतराष्ट्र-पुत्रोंको देखकर उस शस्त्र चलनेकी तैयारीके समय धनुष उठाकर हृषीकेश श्रीकृष्ण महाराजसे यह वचन कहा-हे अच्युत ! मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा करिये। २०-२१ ।

जबतक मैं इन स्थित हुए युद्धकी कामनावालोंको अच्छी प्रकार देख लूँ कि इस युद्धरूप व्यापारमें मुझे किन-किनके साथ युद्ध करना योग्य है। २२ ।

दुर्बुद्धि दुर्योधनका युद्धमें कल्याण चाहने वाले जो-जो ये राजा लोग इस सेनामें आये हैं, उन युद्ध करनेवालोंको मैं देखूगा। २३ ।

सञ्जय बोले, हे धृतराष्ट्र ! अर्जुनद्वारा इस प्रकार कहे हुए महाराज श्रीकृष्णचन्द्रने दोनों सेनाओंके बीचमें भीष्म और द्रोणाचार्यके सामने और सम्पूर्ण राजाओं के सामने उत्तम रथको खड़ा करके ऐसे कहा कि हे पार्थ ! इन इकट्ठे हुए कौरवोंको देख । २४-२५ ।

पहला अध्याय ( हिन्दी मे अर्थ )

उसके उपरान्त पृथापुत्र अर्जुनने उन दोनों ही सेनाओंमें स्थित हुए पिताके भाइयोंको, पितामहोंको, आचार्योंको, मामोंको, भाइयोंको, पुत्रोंको, पौत्रोंको तथा मित्रों को, ससुरोंको और सुहृदोंको भी देखा । २६ ।

इस प्रकार उन खड़े हुए सम्पूर्ण बन्धुओंको देखकर वे अत्यन्त करुणासे युक्त हुए कुन्तीपुत्र अर्जुन शोक करते हुए यह बोले । २७ ।

हे कृष्ण ! इस युद्धकी इच्छावाले खड़े हुए स्वजनसमुदायको देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हुए जाते हैं और मुख भी सूखा जाता है और मेरे शरीरमें कम्प तथा रोमाञ्च होता है। २८-२९ ।

तथा हाथसे गाण्डीव धनुष गिरता है और त्वचा भी बहुत जलती है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिये मैं खड़ा रहनेको भी समर्थ नहीं हूँ। ३० ।

हे केशव ! लक्षणोंको भी विपरीत ही देखता हूँ तथा युद्धमें अपने कुलको मारकर कल्याण भी नहीं देखता । ३१ ।

Madanan Mata Sadhana ।। मदानन माता साधना।

हे कृष्ण ! मैं विजय नहीं चाहता और राज्य तथा सुखोंको भी नहीं चाहता, हे गोविन्द ! हमें राज्यसे क्या प्रयोजन है अथवा भोगोंसे और जीवनसे भी क्या प्रयोजन है। ३२ ।

क्योंकि हमें जिनके लिये राज्य, भोग और सुखादिक इच्छित हैं, वे ही यह सब धन और जीवनकी आशाको त्यागकर युद्धमें खड़े हैं। ३३ ।

जो कि गुरुजन, ताऊ, चाचे, लड़के और वैसे ही दादा, मामा, ससुर, पोते, साले तथा और भी सम्बन्धी लोग हैं। ३४ ।

इसलिये हे मधुसूदन ! मुझे मारनेपर भी अथवा तीन लोकके राज्यके लिये भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वीके लिये तो कहना ही क्या है। ३५।

हे जनार्दन ! धृतराष्ट्रके पुत्रोंको मारकर भी हमें क्या प्रसन्नता होगी, इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा। ३६ ।

इससे हे माधव ! अपने बान्धव धृतराष्ट्रके पुत्रोंको मारनेके लिये हम योग्य नहीं हैं, क्योंकि अपने कुटुम्बको मारकर हम कैसे सुखी होंगे। ३७ ।

यद्यपि लोभसे भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुलके नाशकृत दोषको और मित्रोंके साथ विरोध करने में पापको नहीं देखते हैं। ३८।

पहला अध्याय ( हिन्दी मे अर्थ )

परंतु हे जनार्दन ! कुलके नाश करनेसे होते हुए दोषको जाननेवाले हमलोगोंको इस पापसे हटनेके लिये क्यों नहीं विचार करना चाहिये। ३९ ।

क्योंकि कुलके नाश होनेसे सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, धर्मके नाश होनेसे सम्पूर्ण कुलको पाप भी बहुत दबा लेता है। ४० ।

तथा हे कृष्ण ! पापके अधिक बढ़ जानेसे कुलकी स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय ! स्त्रियोंके दूषित होनेपर वर्णसंकर उत्पन्न होता है। ४१ ।

और वह वर्णसंकर कुलघातियोंको और कुलको नरकमें ले जानेके लिये ही होता है । लोप हुई पिण्ड और जलकी क्रियावाले इनके पितरलोग भी गिर जाते हैं। ४२ ।

और इन वर्णसंकर-कारक दोषोंसे कुलघातियोंके सनातन कुलधर्म और जातिधर्म नष्ट हो जाते हैं। ४३ ।

तथा हे जनार्दन ! नष्ट हुए कुलधर्मवाले मनुष्योंका अनन्त कालतक नरकमें वास होता है, ऐसा हमने सुना है। ४४ ।

अहो ! शोक है कि हमलोग बुद्धिमान् होकर भी महान् पाप करनेको तैयार हुए हैं जो कि राज्य और सुखके लोभसे अपने कुलको मारनेके लिये उद्यत हुए हैं। ४५।

Durga saptashati keelakam stotram

यदि मुझ शस्त्ररहित, न सामना करनेवालेको शस्त्रधारी धृतराष्ट्रके पुत्र रणमें मारें तो वह मारना भी मेरे लिये अति कल्याणकारक होगा। ४६।

सञ्जय बोले-रणभूमिमें शोकसे उद्विग्न मनवाले अर्जुन इस प्रकार कहकर बाणसहित धनुषको त्यागकर रथके पिछले भागमें बैठ गये। ४७ ।

इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनि एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें “अर्जुनविषादयोग” नामक पहला अध्याय ॥१॥

 

( Shrimad bhagwat geeta katha ) 

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