Bhagwat geeta chautha adhyay, in hindi - MANTRAMOL

Bhagwat geeta chautha adhyay, in hindi

श्रीमद्भगवद्गीता चतुर्थ अध्याय व महत्तम ।। Bhagwat geeta chautha adhyay

 

पाठकों आप सब के लिए प्रस्तुत है। “Bhagwat geeta chautha adhyay”; श्रीमद्भगवद्गीता का चतुर्थ अध्याय, व महत्तम हिन्दी व संस्कृत सहित |

Bhagwat geeta chautha adhyay, in hindi

श्रीमद्भगवद्गीताके चौथे अध्यायका माहात्म्य

श्रीभगवान् कहते हैं ! – प्रिये ! अब मैं चौथे अध्यायका माहात्म्य बतलाता हूँ। सुनो, भागीरथीके तटपर वाराणसी (बनारस) नामकी एक पुरी है। वहाँ विश्वनाथजी के मन्दिर में भरत नामके एक योगनिष्ठ महात्मा रहते थे, जो प्रतिदिन आत्मचिन्तन में तत्पर हो आदर पूर्वक गीताके चतुर्थ
अध्याय का पाठ किया करते थे। उसके अभ्यास से उनका अन्तःकरण निर्मल हो गया था। वे शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वों से कभी व्यथित नहीं होते थे। एक समयकी बात है, वे तपोधन नगर की सीमा में स्थित देवताओं का दर्शन करनेकी इच्छासे भ्रमण करते हुए नगर से बाहर निकल गये। वहाँ बेरके दो वृक्ष थे। उन्हींकी जड़में वे विश्राम करने लगे। एक वृक्ष की जड़ में उन्होंने अपना मस्तक रखा था ? और दूसरे वृक्षके मूलमें उनका एक पैर टिका हुआ था। थोड़ी देर बाद जब वे तपस्वी चले गये तब बेर के वे दोनों वृक्ष पाँच ही छः दिनों के भीतर सूख गये।

उनमें पत्ते और डालियाँ भी नहीं रह गयीं। तत्पश्चात् वे दोनों वृक्ष कहीं ब्राह्मणों के पवित्र गृह में दो कन्याओं ! के रूपमें उत्पन्न वे दोनों कन्याएँ जब बढ़कर सात वर्ष की हो गयीं, तब एक दिन उन्होंने दूर देशोंसे घूमकर आते हुए भरत मुनि को देखा । उन्हें देखते ही वे दोनों उनके चरणों में पड़ गयीं और मीठी वाणी में बोलीं-‘मुने ! आप की ही कृपा से हम दोनों का उद्धार हुआ है। हमने बेर की योनि त्याग कर मानव-शरीर प्राप्त किया है।’ उनके इस प्रकार कहने पर मुनिको बड़ा विस्मय हुआ।  उन्होंने पूछा- ‘पुत्रियो ! मैंने कब और किस साधनसे तुम्हें मुक्त किया था ? साथ ही यह भी बताओ कि तुम्हारे बेर के वृक्ष होने में क्या कारण था?

Bhagwat geeta chautha adhyay

क्योंकि इस विषय में मुझे कुछ भी ज्ञात नहीं है ? तब वे कन्याएँ पहले उन्हें अपने बेर हो जाने का कारण बतलाती हुई बोलीं- “मुने ! गोदावरी नदी के तटपर छिन्नपाप नामका एक उत्तम तीर्थ है, जो मनुष्योंको पुण्य प्रदान करने वाला है | वह पावन ता की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ है। उस तीर्थ में सत्यतपा नामक एक तपस्वी बड़ी कठोर तपस्या कर रहे थे। वे ग्रीष्म ऋतु में प्रज्वलित अग्नियों के बीच में बैठते थे, वर्षा काल में जल की धाराओं से उनके मस्तक के बाल सदा भीगे ही रहते थे; तथा जाड़े के समय जल में निवास करने के कारण उनके शरीर में हमेशा रोंगटे खड़े रहते थे। वे बाहर-भीतर से सदा शुद्ध रहते, समय पर तपस्या करते तथा मन और इन्द्रियों को संयम में रखते हुए, परम शान्ति प्राप्त करके आत्मा में ही रमण करते थे।

वे अपनी विद्वत्ता के द्वारा जैसा व्याख्यान करते थे, उसे सुनने के लिये साक्षात् ब्रह्मा जी भी प्रतिदिन उनके पास उपस्थित होते और प्रश्न करते थे? ब्रह्माजीके साथ उनका संकोच नहीं रह गया था, अतः उनके आने पर भी वे सदा तपस्यामें मग्न रहते थे। परमात्मा के ध्यानमें निरन्तर संलग्न रहने के कारण उनकी तपस्या सदा बढ़ती रहती थी। सत्यतपाको जीवन्मुक्त ! के समान मान कर इन्द्र को अपने समृद्धिशाली पद के सम्बन्ध में कुछ भय हुआ, तब उन्होंने उनकी तपस्या में सैकड़ों विघ्न डालने आरम्भ किये। अप्सराओं के समुदाय से हम दोनों को बुलाकर इन्द्रने इस प्रकार आदेश दिया-‘तुम दोनों उस तपस्वी की तपस्या में विघ्न डालो, जो मुझे इन्द्र पद से हटाकर स्वयं स्वर्ग का राज्य भोगना चाहता है।’ इन्द्र का यह आदेश पाकर हम दोनों उनके सामने से चलकर गोदावरी के तीर्थ, जहाँ वे मुनि तपस्या करते थे आयीं।

Bhagwat geeta chautha adhyay

वहाँ मन्द एवं गम्भीर स्वर से बजते हुए मृदङ्ग तथा मधुर वेणुनाद के साथ हम दोनों ने अन्य अप्सराओंसहित मधुर स्वरमें गाना आरम्भ किया। इतना ही नहीं, उन योगी महात्मा को वश में करने के लिये हम लोग स्वर, ताल और लय के साथ नृत्य भी करने लगीं। बीच-बीच में जरा-जरा-सा अंचल खिसकने पर उन्हें हमारी छाती भी दीख जाती थी। हम दोनों की उन्मत्त गति काम भावका उद्दीपन करनेवाली थी, किंतु उसने उन निर्विकार चित्त वाले महात्मा के मनमें क्रोध का संचार कर दिया। तब उन्होंने हाथ से जल छोड़ कर हमें क्रोध पूर्वक शाप दिया-‘अरी ! तुम दोनों गङ्गाजी के तटपर बेरके वृक्ष हो जाओ।’

यह सुनकर हम लोगों ने बड़ी विनयके साथ कहा-‘महात्मन् ! हम दोनों पराधीन थीं, अतः हमारे द्वारा जो दुष्कर्म बन गया है, उसे आप क्षमा करें।’ यों कहकर हमने मुनिको प्रसन्न कर लिया। तब उन पवित्र चित्तवाले मुनिने हमारे शापोद्धारकी अवधि निश्चित करते हुए कहा-भरत मुनि के आने तक ही तुमपर यह शाप लागू होगा। उसके बाद तुमलोगोंका मर्त्यलोकमें जन्म होगा और पूर्वजन्मकी स्मृति बनी रहेगी।’ ‘मुने ! जिस समय हम दोनों बेर-वृक्षके रूपमें खड़ी थीं, उस समय आपने हमारे समीप आकर गीताके चौथे अध्याय का जप करते हुए हमारा उद्धार किया था, अतः हम आपको प्रणाम करती हैं। आपने केवल शापसे ही नहीं, इस भयानक संसार से भी गीता के चतुर्थ अध्याय के पाठद्वारा हमें मुक्त कर दिया।

श्रीभगवान् कहते हैं ! उन दोनों के इस प्रकार कहने पर मुनि बहुत ही और उनसे पूजित हो विदा लेकर जैसे आये थे, वैसे ही चले
गये तथा वे कन्याएँ भी बड़े आदरके साथ प्रतिदिन गीताके चतुर्थ अध्यायका पाठ करने लगी, जिससे उनका उद्धार प्रसन्न हुए गया।

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

अथ चतुर्थोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्। १ ।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप। २।
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्य ह्येतदुत्तमम्। ३।

अर्जुन उवाच

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति। ४ ।

श्रीभगवानुवाचा

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेस्थ परन्तप। ५ ।
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृति स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया। ६ ।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्। ७ ।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे। ८ ।
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन। ९ ।
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः । बहवो ज्ञानतपसा पूता मडावमागताः । १०।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । मम वानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः । ११ ।

श्रीभगवानुवाचा

कासन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः । क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा । १२ ।
चातुर्वयं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्। १३ ।
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते। १४ ।
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः । कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्। १५।
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः । तत्ते कर्मप्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्। १६ ।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः । १७।
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः । स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्। १८।

श्रीभगवानुवाचा

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः । १९ ।
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः । कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः । २० ।

श्रीभगवानुवाचा

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः । शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् । २१ ।
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः । समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते । २२ ।
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः । यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते । २३॥
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना । २४
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते । ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति । २५
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति । शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति । २६
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते । २७
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे । स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः । २८
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे । प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः । २९।
अपरे नियताहाराः प्राणान्ग्राणेषु जुह्वति । सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः । ३०॥

श्रीभगवानुवाचा

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् । नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम । ३१ ॥
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे । ३२ ।
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप । सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते । ३३ ।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः । ३४।
यज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि । ३५।
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि । ३६ ।
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा । ३७।

श्रीभगवानुवाचा

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति । ३८ ।
श्रद्धावॉल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति । ३९।
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परोन सुखं संशयात्मनः । ४० ।
योगसत्र्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्। आत्मवन्तं न कर्माणि निबनन्ति धनञ्जय। ४१ ।
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः । छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत । ४२।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
ज्ञानकर्मसन्यासयोगो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

चौथा अध्याय ( हिन्दी में )

इसके उपरान्त श्रीकृष्ण महाराज बोले, हे अर्जुन ! मैंने इस अविनाशी योगको कल्पके आदिमें सूर्यके प्रति कहा था, और सूर्यने अपने पुत्र मनुके प्रति कहा और मनुने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकुके प्रति कहा । १।

इस प्रकार परम्परासे प्राप्त हुए इस योगको राजर्षियोंने जाना, परंतु हे अर्जुन ! वह योग बहुत कालसे इस पृथ्वीलोकमें लोप (प्रायः) हो गया था। २ ।

वह ही यह पुरातन योग अब मैंने तेरे लिये वर्णन किया है, क्योंकि तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिये तथा यह योग बहुत उत्तम और रहस्य अर्थात् अति मर्मका विषय है। ३ ।

इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र महा राज के वचन सुनकर अर्जुनने पूछा, हे भगवन् ! आपका जन्म तो आधुनिक अर्थात् अब हुआ है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है, इसलिये इस योगको कल्पके आदिमें आपने कहा था यह मैं कैसे जानूँ ? । ४ ।

इसपर श्रीकृष्ण महाराज बोले, हे अर्जुन ! मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं, परंतु हे परन्तप ! उन सबको तू नहीं जानता है और मैं जानता हूँ। ५।

मेरा जन्म प्राकृत मनुष्योंके सदृश नहीं है, मैं अविनाशीस्वरूप, अजन्मा होनेपर भी तथा सब भूत-प्राणियोंका ईश्वर होनेपर भी अपनी प्रकृतिको अधीन करके योग माया से प्रकट होता हूँ। ६।

हे भारत ! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूपको रचता हूँ अर्थात् प्रकट करता हूँ। ७।

क्योंकि साधु पुरुषोंका उद्धार करनेके लिये और दूषित कर्म करने वालों का नाश करने के लिये तथा धर्म स्थापन करने के लिये युग-युगमें प्रकट होता हूँ। ८।

Bhagwat geeta chautha adhyay in hindi 

इसलिये हे अर्जुन ! मेरा वह जन्म और कर्म दिव्य अर्थात् अलौकिक है, इस प्रकार जो पुरुष तत्त्वसे * जानता है, वह शरीर को त्यागकर फिर जन्मको नहीं प्राप्त होता है, किंतु मुझे ही प्राप्त होता है।९।

हे अर्जुन ! पहले भी राग, भय और क्रोधसे रहित अनन्य भावसे मेरे में स्थितिवाले मेरे शरण हुए बहुत-से पुरुष ज्ञानरूप तपसे पवित्र स्वरूपको प्राप्त हो चुके हैं। १० ।

क्योंकि हे अर्जुन ! जो मेरेको जैसे भजते हैं, मैं भी उनको वैसे ही भजता हूँ, इस रहस्य को जानकर ही बुद्धिमान् मनुष्यगण सब प्रकारसे मेरे मार्गके अनुसार बर्तते हैं। ११ ।

जो मेरेको तत्त्वसे नहीं जानते हैं, वे पुरुष इस मनुष्य लोक में कर्मोके फलको चाहते हुए देवताओंको पूजते हैं और उनके कर्मोंसे उत्पन्न हुई सिद्धि भी शीघ्र ही होती है, परंतु उनको मेरी प्राप्ति नहीं होती। इसलिये तू मेरेको ही सब प्रकारसे भज। १२ ।

हे अर्जुन ! गुण और कर्मोके विभागसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र मेरे द्वारा रचे गये हैं, उनके कर्ताको भी मुझ अविनाशी परमेश्वरको तू अकर्ता ही जान । १३ ।

क्योंकि कर्मोके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है इसलिये मेरेको कर्म लिपायमान नहीं करते, इस प्रकार जो मेरे को तत्त्व से जानता है, वह भी कर्मोसे नहीं बँधता है। १४ ।

तथा पहिले होनेवाले मुमुक्षु पुरुषोंद्वारा भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किया गया है, इससे तू भी पूर्वजोंद्वारा सदासे किये हुए कर्मको ही कर । १५।

परंतु कर्म क्या और अकर्म क्या है ? ऐसे इस विषयमें बुद्धिमान् पुरुष भी मोहित हैं, इसलिये मैं, वह कर्म अर्थात् कर्मोंका तत्त्व तेरे लिये अच्छी प्रकार कहूँगा कि जिसको जानकर तू अशुभ अर्थात् संसार बन्धनसे छूट जायगा । १६ ।

Bhagwat geeta chautha adhyay in hindi 

कर्मका स्वरूप भी जानना चाहिये और अकर्मका स्वरूप भी जानना चाहिये तथा निषिद्ध कर्मका स्वरूप भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्मकी गति गहन है। १७ ।

जो पुरुष कर्ममें अर्थात् अहंकार रहित की हुई सम्पूर्ण चेष्टाओंमें अकर्म अर्थात् वास्तव में उनका न होनापना देखे और जो अकर्ममें अर्थात् अज्ञानी पुरुषद्वारा किये हुए सम्पूर्ण क्रियाओंके त्यागमें भी कर्मको अर्थात् त्यागरूप क्रियाको देखे, वह पुरुष मनुष्योंमें बुद्धिमान् है और वह योगी सम्पूर्ण कर्मोका करनेवाला है।१८।

हे अर्जुन ! जिसके सम्पूर्ण कार्य कामना और संकल्प से रहित हैं, ऐसे उस ज्ञानरूप अग्नि द्वारा भस्म हुए कर्मों वाले पुरुष को ज्ञानीजन भी पण्डित कहते हैं। १९ ।

जो पुरुष सांसारिक आश्रयसे रहित सदा परमानन्द परमात्मामें तृप्त है, वह कर्मोके फल और सङ्ग अर्थात् कर्तृत्व-अभिमानको त्यागकर कर्ममें अच्छी प्रकार बर्तता हुआ भी कुछ भी नहीं करता है। २० ।

जीत लिया है अन्तःकरण और शरीर जिसने तथा त्याग दी है सम्पूर्ण भोगों की सामग्री जिसने ऐसा आशा रहित पुरुष केवल शरीर सम्बन्धी कर्मको करता हुआ भी पापको नहीं प्राप्त होता है। २१ ।

अपने-आप जो कुछ आ प्राप्त हो उसमें ही संतुष्ट रहनेवाला और हर्ष- शोकादि द्वन्द्वों से अतीत हुआ तथा मत्सरता अर्थात् ईर्ष्या से रहित सिद्धि और असिद्धिमें समत्व भाव वाला पुरुष कर्मोको करके भी नहीं बँधता है। २२ ।

क्योंकि आसक्तिसे रहित ज्ञानमें स्थित हुए चित्तवाले यज्ञके लिये आचरण करते हुए मुक्त पुरुषके सम्पूर्ण कर्म नष्ट हो जाते हैं । २३ ।

उन यज्ञके लिये आचरण करनेवाले पुरुषों में से कोई तो इस भावसे यज्ञ करते हैं कि अर्पण अर्थात् युवादिक भी ब्रह्म है और हवि अर्थात् हवन करनेयोग्य द्रव्य भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप अग्निमें ब्रह्मरूप कर्ताके द्वारा जो हवन किया गया है वह भी ब्रह्म ही है, इसलिये ब्रह्मरूप कर्ममें समाधिस्थ हुए उस पुरुषद्वारा जो प्राप्त होनेयोग्य है, वह भी ब्रह्म ही है। २४ ।

और दूसरे योगीजन देवताओंके पूजनरूप यज्ञको ही अच्छी प्रकार उपासते हैं अर्थात् करते और दूसरे ज्ञानीजन परब्रह्म परमात्मा रूप अग्निमें यज्ञके द्वारा ही यज्ञ को हवन करते हैं । २५ ।

Shrimad bhagwat geeta katha || श्रीमद्भगवद्गीता प्रथम अध्याय।

Bhagwat geeta chautha adhyay in hindi 

अन्य योगीजन श्रोत्रादिक सब इन्द्रियोंको संयम अर्थात् स्वाधीनता रूप अग्नि में हवन करते हैं अर्थात् इन्द्रियोंको विषयोंसे रोककर अपने वशमें कर लेते हैं और दूसरे योगीलोग शब्दादिक विषयोंको इन्द्रियरूप अग्निमें हवन करते हैं अर्थात् रागद्वेषरहित इन्द्रियोंद्वारा विषयोंको ग्रहण करते हुए भी भस्मरूप करते हैं। २६ ।

जो दूसरे योगीजन सम्पूर्ण इन्द्रियों की चेष्टाओं को‌ तथा प्राणोंके व्यापारको ज्ञानसे प्रकाशित हुई, परमात्मामें स्थितिरूप योगाग्निमें हवन करते हैं। । २७।

दूसरे कई पुरुष ईश्वर-अर्पण-बुद्धिसे लोक सेवा में द्रव्य लगानेवाले हैं, वैसे ही कई पुरुष स्वधर्म-पालनरूप तप यज्ञ को करनेवाले हैं और कई अष्टाङ्गयोगरूप यज्ञको करनेवाले हैं और दूसरे अहिंसादि तीक्ष्ण व्रतोंसे युक्त यत्नशील पुरुष भगवान्के नामका जप तथा भगवत्प्राप्तिविषयक शास्त्रोंका अध्ययन रूप ज्ञानयज्ञके करने वाले हैं। २८ ।

कुछ दूसरे योगीजन अपानवायुमें प्राणवायुको हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायुमें अपानवायुको हवन करते हैं तथा अन्य योगीजन प्राण और अपानकी गतिको रोककर प्राणायामके परायण होते हैं। २९।

चौथा अध्याय

दूसरे नियमित आहार* करनेवाले योगीजन प्राणोंको प्राणोंमें ही हवन करते हैं, इस प्रकार यज्ञोंद्वारा नाश हो गया है पाप जिनका ऐसे यह सब ही पुरुष यज्ञोंको जाननेवाले हैं। ३० ।

हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन ! यज्ञोंके परिणामरूप ज्ञानामृतको भोगनेवाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं और यज्ञरहित पुरुषको यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक होगा। ३१ ।

ऐसे बहुत प्रकारके यज्ञ वेदकी वाणीमें विस्तार किये गये हैं, उन सबको शरीर, मन और इन्द्रियोंकी क्रियाद्वारा ही उत्पन्न होने वाले जान, इस प्रकार तत्त्वसे जानकर निष्कामकर्मयोगद्वारा संसारबन्धनसे मुक्त हो जायगा । ३२ ।

हे अर्जुन ! सांसारिक वस्तुओंसे सिद्ध होने वाले यज्ञसे ज्ञानरूप यज्ञ सब प्रकार श्रेष्ठ है, क्योंकि हे पार्थ ! सम्पूर्ण यावन्मात्र कर्म ज्ञानमें शेष होते हैं अर्थात् ज्ञान उनकी पराकाष्ठा है। ३३।

Bhagwat Geeta dwitiya adhyay ।। श्रीमद्भगवद्गीता महत्तव

Bhagwat geeta chautha adhyay in hindi 

इसलिये तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानी पुरुषोंसे भली प्रकार दण्डवत्-प्रणाम तथा सेवा और निष्कपटभावसे किये हुए प्रश्नद्वारा उस ज्ञानको जान, वे मर्मको जाननेवाले ज्ञानीजन तुझे उस ज्ञानका उपदेश करेंगे। ३४।

कि जिसको जानकर तू फिर इस प्रकार मोहको प्राप्त नहीं होगा और हे अर्जुन ! जिस ज्ञानके द्वारा सर्वव्यापी अनन्त चेतनरूप हुआ अपने अन्तर्गत* समष्टि बुद्धिके आधार सम्पूर्ण भूतोंको देखेगा और उसके उपरान्त मेरेमें । अर्थात् सच्चिदानन्दस्वरूपमें एकीभाव हुआ सच्चिदानन्दमय ही देखेगा । ३५ ।

यदि तू सब पापियों से भी अधिक पाप करनेवाला है, तो भी ज्ञान रूप नौका द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पापों को अच्छी प्रकार तर जायगा। ३६ ।

हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म मय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मोको भस्ममय कर देता है। ३७ ।

इसलिये इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसन्देह कुछ भी नहीं है, उस ज्ञान को कितने क कालसे ,अपने-आप समत्वबुद्धि रूप योग के द्वारा अच्छी प्रकार शुद्धान्तःकरण हुआ पुरुष आत्मामें अनुभव करता है। ३८।

हे अर्जुन ! जितेन्द्रिय, तत्पर हुआ श्रद्धावान् पुरुष ज्ञानको प्राप्त होता है, ज्ञानको प्राप्त होकर तत्क्षण भगवत्प्राप्ति रूप परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है। ३९ ।

हे अर्जुन ! भगवद्विषयको न जानने वाला, तथा श्रद्धारहित और संशययुक्त पुरुष परमार्थसे भ्रष्ट हो जाता है, उनमें भी संशय युक्त पुरुषके लिये तो न सुख है, और न यह लोक है, न परलोक है, अर्थात् यह लोक और परलोक दोनों ही उसके लिये भ्रष्ट हो जाते हैं। ४०

Bhagwat Geeta third adhayay ।। mahatmy

Bhagwat geeta chautha adhyay in hindi 

हे धनञ्जय ! समत्व-बुद्धिरूप योगद्वारा भगवदर्पण कर दिये हैं, सम्पूर्ण कर्म जिसने और ज्ञान द्वारा नष्ट हो गये हैं, सब संशय जिसके, ऐसे परमात्मपरायण पुरुष को कर्म नहीं बाँधते हैं। ४१ ।

इससे हे भरतवंशी अर्जुन ! तू समत्व बुद्धि‌ रूप योग में स्थित हो, और अज्ञानसे उत्पन्न हुए हृदय में स्थित इस अपने संशय को ज्ञानरूप तलवार द्वारा छेदन करके युद्धके लिये खड़ा हो । ४२ ।

इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण, और अर्जुनके संवादमें “ज्ञानकर्मसन्यासयोग’ नामक चौथा अध्याय ।। ४ ।।

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