Bhagwat Geeta panchwa adhyay, or mahatm - MANTRAMOL

Bhagwat Geeta panchwa adhyay, or mahatm

श्रीमद्भगवद्गीता पंचम अध्याय ।। Bhagwat Geeta panchwa adhyay

पाठकों आप सब के लिए प्रस्तुत है। “Bhagwat Geeta panchwa adhyay” श्रीमद्भगवद्गीता पंचम अध्याय व महात्म्य हिन्दी अनुवाद सहित ।

Bhagwat Geeta panchwa adhyay, or mahatm

श्रीमद्भगवद्गीताके पाँचवें अध्यायका माहात्म्य

श्रीभगवान् कहते हैं-देवि ! अब सब लोगों द्वारा सम्मानित पाँचवें अध्याय का माहात्म्य संक्षेप से बतलाता हूँ,सावधान होकर सुनो।
मद्रदेशमें पुरुकुत्स पुर नामक एक नगर है। उसमें पिङ्गल नामक एक ब्राह्मण रहता था।वह वेद पाठी ब्राह्मणों के विख्यात वंश में, जो सर्वथा निष्कलङ्क था, उत्पन्न हुआ था, किंतु अपने कुल के लिये उचित वेद- शास्त्रों के स्वाध्याय को छोड़ कर ढोल आदि बजाते हुए उसने नाच-गानमें मन लगाया। गीत, नृत्य और बाजा बजाने की कलामें परिश्रम करके पिङ्गलने बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त कर ली और उसीसे उसका राजभवनमें भी प्रवेश हो गया। अब वह राजाके साथ रहने लगा और परायी स्त्रियों को बुला-बुलाकर उनका उपभोग करने लगा। स्त्रियों के सिवा और कहीं उसका मन नहीं लगता था।

धीरे-धीरे अभिमान बढ़ जानेसे उच्छृङ्खल होकर वह एकान्त में राजा से दूसरों के दोष बतलाने लगा। पिङ्गल की एक स्त्री थी,
जिसका नाम था अरुणा। वह नीच कुल में उत्पन्न हुई थी और कामी पुरुषों के साथ विहार करने की इच्छा से सदा उन्हींकी खोज में घूमा करती थी। उसने पति को अपने मार्ग का कण्टक समझकर एक दिन आधी रात में घरके भीतर ही उसका सिर काट कर मार डाला और उसकी लाश को जमीन में गाड़ दिया। इस प्रकार प्राणों से वियुक्त होने पर वह यमलोक में पहुँचा और भीषण नरकों का उपभोग करके निर्जन वनमें गिद्ध हुआ। अरुणा भी भगन्दर रोगसे अपने सुन्दर शरीर को त्यागकर घोर नरक भोगने के पश्चात् उसी वन में शुकी हुई। एक दिन वह दाना चुगने की इच्छा से इधर-उधर फुदक रही थी, इतने में ही उस गिद्धने पूर्व जन्म के वैर का स्मरण करके उसे अपने तीखे नखों से फाड़ डाला।

Bhagwat Geeta panchwa adhyay

शुकी घायल होकर पानी से भरी हुई मनुष्य की खोपड़ी में गिरी । गिद्ध पुनः उसकी ओर झपटा। इतने में ही जाल फैलाने वाले बहेलियोंने उसे भी बाणों का निशाना बनाया। उसकी पूर्वजन्म की पत्नी शुकी उस खोपड़ी के जल में डूबकर प्राण त्याग चुकी थी। फिर वह क्रूर पक्षी भी उसीमें गिरकर डूब गया। तब यमराज के दूत उन दोनों को यमराज के लोक में ले गये। वहाँ अपने पूर्वकृत पापकर्म को याद करके दोनों ही भयभीत हो रहे थे। तदनन्तर यमराज ने जब उनके घृणित कोपर दृष्टिपात किया, तब उन्हें मालूम हुआ कि मृत्यु के समय अकस्मात् खोपड़ी के जल में स्नान करने से इन दोनों का पाप नष्ट चुका है। तब उन्होंने उन दोनों को मनोवाञ्छित लोक में जाने की आज्ञा दी।

यह सुनकर अपने पाप को याद करते हुए वे दोनों बड़े विस्मय में पड़े और पास जाकर धर्मराज के चरणों में प्रणाम करके पूछने लगे-‘भगवन् ! हम दोनों ने पूर्वजन्म में अत्यन्त घृणित पाप का संचय किया है। फिर हमें मनोवाञ्छित लोकों में भेजने का क्या कारण है ? बताइये। यमराज ने कहा-गङ्गाके किनारे वट नामक एक उत्तम ब्रह्मज्ञानी रहते थे। वे एकान्त सेवी, ममता रहित, शान्त, विरक्त और किसी से भी द्वेष न रखने वाले थे। प्रतिदिन गीताके पाँचवें अध्याय का जप करना उनका सदाका नियम था। पाँचवें अध्याय को श्रवण कर लेने पर महापापी पुरुष भी सनातन ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त कर लेता है।

Bhagwat Geeta panchwa adhyay

उसी पुण्य के प्रभाव से शुद्धचित्त होकर उन्होंने अपने शरीर का परित्याग किया था। गीता के पाठ से जिनका शरीर निर्मल हो गया था, जो आत्मज्ञान प्राप्त कर चुके थे, उन्हीं महात्मा की खोपड़ी का जल पाकर तुम दोनों पवित्र हो गये हो। अतः अब तुम दोनों मनोवाञ्छित लोकोंको जाओ; क्योंकि गीता के पाँचवें अध्याय के माहात्म्य से तुम दोनों शुद्ध हो गये हो।

श्रीभगवान् कहते हैं सबके प्रति समान भाव रखनेवाले धर्मराजके द्वारा इस प्रकार समझाये जानेपर वे दोनों बहुत प्रसन्न हुए और विमानपर
बैठकर वैकुण्ठधामको चले गये।

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

अथ पञ्चमोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

सन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनयोगं च शंससि । यच्छ्य एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्।१।

श्रीभगवानुवाचा

सन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते। २।
ज्ञेयः स नित्यसन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्गति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते । ३।
साङ्ख्ययोगौर पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोविन्दते फलम्।४।
यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते । एकं साङ्ख्यंचयोगच यः पश्यति सपश्यति। ५।
सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः । योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ।। योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते । ७॥

नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् । पश्यशृण्वन्स्पृशक्षिघ्रन्नश्ननगच्छन्स्वपश्वसन् । ८।
प्रलपन्विसृजनगृह्णन्नुन्मिपन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ।९।
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा । १०।
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये । ११ ।
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् । अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते । १२ ।
सर्वकर्माणि मनसा सन्यस्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन कारयन् । १३ ।
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः। न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते । १४ ।
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः । १५।
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः । तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्। १६ ।

तबुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्ति ज्ञाननि तकल्मषाः । १७ ।
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः । १८ ।
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः । निदोष हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः । १९ ।
न प्रहष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् । स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः । २० ।
बाह्यस्पर्शेवसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्। स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते । २१ ।
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः । २२ ।
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् । कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः । २३ ।
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तज्योतिरेव यः। स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति । २४ ।

श्रीभगवानुवाचा

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः । छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः । २५ ।
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् । अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्। २६।
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे ध्रुवोः । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ। २७ ।
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः । विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः । २८॥
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति । २९ ।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
कर्मसन्यासयोगो नाम पञ्चमोऽध्यायः ।। ५॥

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः । छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः । २५ ।
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् । अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्। २६।
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे ध्रुवोः । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ। २७ ।
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः । विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः । २८॥
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति । २९ ।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
कर्मसन्यासयोगो नाम पञ्चमोऽध्यायः ।। ५॥

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

पाँचवाँ अध्याय ( हिन्दी में )

उसके उपरान्त अर्जुन ने पूछा-हे कृष्ण ! आप कर्मों के संन्यास की और फिर निष्काम कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं, इसलिये इन दोनों में एक जो निश्चय किया हुआ कल्याणकारक होवे, उसको मेरे लिये कहिये। १।

इस प्रकार अर्जुन के पूछने पर श्रीकृष्ण महाराज बोले, अर्जुन ! कर्मों का संन्यास (अर्थात् मन, इन्द्रियों और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग) और निष्काम कर्मयोग (अर्थात् समत्व-बुद्धि से भगवदर्थ कर्मो का करना) ये दोनों ही परम कल्याण के करने वाले हैं, परंतु उन दोनों में भी कर्मो के संन्याससे निष्काम कर्म योग साधन में सुगम होनेसे श्रेष्ठ है। २।

इसलिये हे अर्जुन ! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकाङ्क्षा करता है, वह निष्काम कर्मयोगी सदा संन्यासी ही समझने योग्य है, क्योंकि राग-द्वेषादि द्वन्द्वों से रहित हुआ पुरुष सुखपूर्वक संसार रूप बन्धन से मुक्त हो जाता है। ३ ।

हे अर्जुन ! ऊपर कहे हुए संन्यास और निष्काम कर्मयोग को मूर्ख- लोग अलग-अलग फल वाले कहते हैं न कि पण्डितजन; क्योंकि दोनों में से एक में भी अच्छी प्रकार स्थित हुआ पुरुष दोनों के फलरूप परमात्मा को प्राप्त होता है। ४।

ज्ञानयोगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, निष्काम कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है, इसलिये जो पुरुष ज्ञानयोग और निष्काम कर्मयोग को फलरूप से एक देखता है, वह ही यथार्थ देखता है। ५।

Shrimad bhagwat geeta katha || श्रीमद्भगवद्गीता प्रथम अध्याय।

परंतु हे अर्जुन ! निष्काम कर्मयोग के बिना संन्यास अर्थात् मन, इन्द्रियों और शरीर द्वारा होनेवाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग प्राप्त होना कठिन है और भगवत्स्वरूप को मनन करने वाला निष्काम कर्मयोगी परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है।६।

Bhagwat Geeta panchwa adhyay

वशमें किया हुआ है शरीर जिसके ऐसा जितेन्द्रिय और विशुद्ध अन्तःकरण वाला एवं सम्पूर्ण प्राणियों के आत्मरूप परमात्मा में एकीभाव हुआ निष्काम कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी लिपाय मान नहीं होता। ७ ।

हे अर्जुन ! तत्त्वको जानने वाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखोंको खोलता और मीचता हुआ भी सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों में बर्त रही हैं, इस प्रकार समझता हुआ निःसंदेह ऐसे माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ। ८-९।

परंतु हे अर्जुन ! देहाभिमानियों द्वारा यह साधन होना कठिन है और निष्काम कर्मयोग सुगम है, क्योंकि जो पुरुष सब कर्मोंको

परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है, वह पुरुष जलसे कमलके पत्ते के सदृश पाप से लिपाय मान

नहीं होता। १० ।

इसलिये निष्काम कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्यागकर अन्तःकरणकी

शुद्धिके लिये कर्म करते हैं। ११।

इसीसे निष्काम कर्मयोगी कर्मो के फल को परमेश्वर के अर्पण करके भगवत्प्राप्ति- रूप शान्तिको प्राप्त होता है और सकामी पुरुष

फलमें आसक्त हुआ कामना के द्वारा बँधता है, इसलिये निष्काम कर्मयोग उत्तम है। १२ ।

हे अर्जुन ! वशमें है अन्तःकरण जिसके ऐसा सांख्ययोग का आचरण करने वाला पुरुष तो निःसंदेह न करता हुआ और न

करवाता हुआ नौ द्वारों वाले शरीर रूप घरमें सब कर्मो को मनसे त्यागकर अर्थात् इन्द्रियाँ इन्द्रियों के अर्थोंमे बर्तती हैं, ऐसे मानता हुआ आनन्दपूर्वक सच्चिदानन्दघन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है। १३ ।

परमेश्वर भी भूतप्राणियों के न कर्तापन को और न कर्मो को तथा न कर्मो के फल के संयोग को वास्तव में रचता है, किंतु परमात्मा के सकाश से प्रकृति ही बर्तती है अर्थात् गुण ही गुणोंमें बर्त रहे हैं। १४ ।

Bhagwat Geeta panchwa adhyay

सर्वव्यापी परमात्मा न किसी के पापकर्म को और न किसी के शुभकर्म को भी ग्रहण करता है, किंतु मायाके द्वारा ज्ञान ढका हुआ है,

इससे सब जीव मोहित हो रहे हैं। १५ ।

परंतु जिनका वह अन्तःकरण का अज्ञान आत्मज्ञान द्वारा नाश हो गया है, उनका वह ज्ञान सूर्यके सदृश उस सच्चिदानन्दघन

परमात्मा को प्रकाशता है (अर्थात् परमात्माके स्वरूप को साक्षात् कराता है)।१६।

हे अर्जुन ! तद्रूप है बुद्धि जिनकी तथा तद्रूप है मन जिनका और उस सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही है निरन्तर एकीभावसे स्थिति

जिनकी, ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञानके द्वारा पापरहित हुए अपुनरावृत्तिको अर्थात् परम गति को प्राप्त होते हैं। १७।

Bhagwat Geeta dwitiya adhyay ।। श्रीमद्भगवद्गीता महत्तव

ऐसे वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समभाव से देखने वाले* ही होते हैं। १८ ।

इसलिये जिनका मन समत्वभाव में स्थित है उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया (अर्थात् वे जीते हुए ही संसारसे मुक्त हैं), क्योंकि सच्चिदानन्दघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही स्थित हैं। १९ ।

जो पुरुष प्रिय को अर्थात् जिस को लोग प्रिय समझते हैं, उसको प्राप्त होकर हर्षित नहीं हो और अप्रिय को अर्थात् जिसको लोग अप्रिय समझते हैं उसको प्राप्त होकर उद्वेगवान् न हो, ऐसा स्थिर बुद्धि, संशय रहित, ब्रह्मवेत्ता पुरुष सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा में
एकीभावसे नित्य स्थित है। २० ।

बाहरके विषयों में अर्थात् सांसारिक भोगों में आसक्ति रहित अन्तःकरण वाला पुरुष अन्तःकरण में जो भगवत्- ध्यानजनित आनन्द है,

उसको प्राप्त होता है, और वह पुरुष सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मारूप योगमें एकीभावसे स्थित हुआ अक्षय आनन्दको अनुभव

करता है। २१ ।

Bhagwat Geeta panchwa adhyay

जो यह इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब भोग हैं, वे यद्यपि विषयी पुरुषों को सुखरूप भासते हैं, तो भी

निःसंदेह दुःख के ही हेतु हैं और आदि-अन्तवाले अर्थात् अनित्य हैं, इसलिये हे अर्जुन ! बुद्धिमान, विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता । २२ ।

जो मनुष्य शरीर के नाश होनेसे पहिले ही काम और क्रोध से उत्पन्न हुए वेग को सहन करने में समर्थ है अर्थात् काम-क्रोध को

जिसने सदाके लिये जीत लिया है, वह मनुष्य इस लोकमें योगी है और वही सुखी है। २३ ।

Bhagwat Geeta third adhayay ।। mahatmy

जो पुरुष निश्चय करके अन्तरात्मा में ही सुख वाला है और आत्मा में ही आराम वाला है तथा जो आत्मा में ही ज्ञानवाला है, ऐसा वह

सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माके साथ एकीभाव हुआ सांख्य योगी शान्त ब्रह्मको प्राप्त होता है। २४ ।

नाश हो गये हैं सब पाप जिनके तथा ज्ञान करके निवृत्त हो गया है संशय जिनका और सम्पूर्ण भूयाणियों के हित में है रति जिनकी,

एकाग्र हुआ है भगवान के ध्यान में चित्त जिनका ऐसे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शान्त परब्रह्मको प्राप्त होते हैं। २५ ।

काम-क्रोध से रहित जीते हुए चित्त वाले, परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार किये हुए ज्ञानी पुरुषों के लिये सब ओर से शान्त परब्रह्म

परमात्मा ही प्राप्त है : ।२६ ।

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

हे अर्जुन ! बाहर के विषयभोगो को न चिन्तन कस्ता हुआ बाहर त्यागकर और नेत्रों की दृष्टिको भृकुटी के बीच में स्थित करके

तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायुको सम करके । २७ ।

जीती हुई हैं इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि जिसकी ऐसा जो मोक्षपरायण मुनि इच्छा, भय और क्रोध से रहित है वह सदा मुक्त ही है। २८।

Bhagwat geeta chautha adhyay, in hindi

और हे अर्जुन ! मेरा भक्त मेरे को यज्ञ और तपोंका भोगने वाला और सम्पूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर तथा सम्पूर्ण भूतप्राणियों

का अर्थात् स्वार्थ रहित प्रेमी, ऐसा तत्त्व से जानकर शान्ति को प्राप्त होता है और सच्चिदानन्दघन परिपूर्ण शान्त ब्रह्म के सिवा

उसकी दृष्टि में और कुछ भी नहीं रहता, केवल वासुदेव-ही-वासुदेव रह जाता है। २९ ।

इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और संवादमें “कर्मसंन्यासयोग” नामक

पाँचवाँ अध्याय ।। ५॥

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