Bhagwat Geeta chhata adhyay , or mahatm. - MANTRAMOL

Bhagwat Geeta chhata adhyay , or mahatm.

श्रीमद्भगवद्गीता छठवां अध्याय ।। Bhagwat Geeta chhata adhyay

 

पाठकों आप सब के लिए प्रस्तुत है। “Bhagwat Geeta chhata adhyay”; श्रीमद्भगवद्गीता का छठवां व महात्म्य हिन्दी मे अर्थ सहित।

Bhagwat Geeta chhata adhyay , or mahatm.

श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्यायका माहात्म्य

श्रीभगवान् कहते है-सुमुखि ! अब मैं छठे अध्यायका माहात्म्य बतलाता हूँ, जिसे सुननेवाले मनुष्योंके लिये मुक्ति करतलगत हो जाती है।गोदावरी नदीके तटपर प्रतिष्ठानपुर (पैठण) नामक एक विशाल नगर है, जहाँ मैं पिप्पलेशके नामसे विख्यात होकर रहता हूँ। उस नगरमें जानश्रुति नामक एक राजा रहते थे, जो भूमण्डलकी प्रजाको अत्यन्त प्रिय थे। उनका प्रताप मार्तण्ड-मण्डलके प्रचण्ड तेजके समान जान पड़ता था। प्रतिदिन होनेवाले उनके यज्ञके धुएँसे नन्दनवनके कल्पवृक्ष इस प्रकार काले पड़ गये थे, मानो राजाकी असाधारण दानशीलता देखकर वे लज्जित हो गये हों। उनके यज्ञमें प्राप्त पुरोडाशके रसास्वादनमें सदा आसक्त होनेके कारण देवतालोग कभी प्रतिष्ठानपुरको छोड़कर बाहर नहीं जाते थे। उनके दानके समय छोड़े हुए जलकी धारा, प्रतापरूपी तेज और यज्ञके धूमोंसे पुष्ट होकर मेघ ठीक समय पर वर्षा करते थे।

उस राजा के शासन काल में ईतियों (खेती में होने वाले छः प्रकार के उप द्रवों) के लिये कहीं थोड़ा भी स्थान नहीं मिलता था और अच्छी नीतियों का सर्वत्र प्रसार होता था। वे बावली, कुएँ और पोखरे खुदवाने के बहाने मानो प्रतिदिन पृथ्वी के भीतर की निधियों का अवलोकन करते थे। एक समय राजा के दान, तप, यज्ञ और प्रजा पालन से संतुष्ट होकर स्वर्ग के देवता उन्हें वर देनेके लिये आये । वे कमलनाल के समान उज्ज्वल हंसों का रूप धारणकर अपनी पाँखें हिलाते हुए आकाशमार्गसे चलने लगे। बड़ी उतावलीके साथ उड़ते हुए वे सभी हंस परस्पर बातचीत भी करते जाते थे। उनमें से भद्राश्व आदि दो-तीन हंस वेगसे उड़कर आगे निकल गये। तब पीछे वाले हंसोंने आगे जानेवालों को सम्बोधित करके कहा-‘अरे भाई भद्राश्व ! तुमलोग वेगसे चलकर आगे क्यों हो गये ? यह मार्ग बड़ा दुर्गम है; इसमें हम सबको साथ मिलकर चलना चाहिये।

Bhagwat Geeta chhata adhyay

क्या तुम्हें दिखायी नहीं देता, यह सामने ही पुण्यमूर्ति महाराज जानश्रुति का तेजःपुञ्ज अत्यन्त स्पष्टरूप से प्रकाश मान हो रहा है। [ उस तेजसे भस्म होनेकी आशङ्का है, अतः सावधान होकर चलना चाहिये ]’ पीछेवाले हंसोंके ये वचन सुनकर आगेवाले हंस हँस पड़े और उच्च स्वरसे उनकी बातोंकी अवहेलना करते हुए बोले-‘अरे भाई ! क्या इस राजा जानश्रुतिका तेज ब्रह्मवादी महात्मा रैक्वके तेजसे भी अधिक तीव्र है?’
हंसोंकी ये बातें सुनकर राजा जानश्रुति अपने ऊँचे महलकी छतसे उतर गये और सुखपूर्वक आसनपर विराजमान हो अपने सारथिको
बुलाकर बोले-‘जाओ, महात्मा रैक्वको यहाँ ले आओ।’ राजाका यह अमृतके समान वचन सुनकर मह नामक सारथि प्रसन्नता प्रकट करता
हुआ नगरसे बाहर निकला। सबसे पहले उसने मुक्तिदायिनी काशीपुरीकी यात्रा की, जहाँ जगतके स्वामी भगवान् विश्वनाथ मनुष्योंको उपदेश दिया करते हैं।

उसके बाद वह गयाक्षेत्रमें पहुँचा, जहाँ प्रफुल्ल नेत्रोंवाले भगवान् गदाधर सम्पूर्ण लोकोंका उद्धार करनेके लिये निवास करते हैं।
तदनन्तर नाना तीर्थोंमें भ्रमण करता हुआ सारथि पापनाशिनी मथुरापुरीमें गया; यह भगवान् श्रीकृष्णका आदि स्थान है, जो परम
महान् एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है। वेद और शास्त्रोंमें वह तीर्थ त्रिभुवनपति भगवान् गोविन्दके अवतारस्थानके नामसे प्रसिद्ध है। नाना
देवता और ब्रह्मर्षि उसका सेवन करते हैं। मथुरा नगर कालिन्दी (यमुना) के किनारे शोभा पाता है। उसकी आकृति अर्द्धचन्द्रके समान
प्रतीत होती है। वह सब तीर्थोके निवाससे परिपूर्ण है। परम आनन्द प्रदान करनेके कारण सुन्दर प्रतीत होता है। गोवर्धन पर्वतके होनेसे
मथुरामण्डलकी शोभा और भी बढ़ गयी है। वह पवित्र वृक्षों और लताओंसे आवृत है। उसमें बारह वन हैं। वह परम पुण्यमय तथा सबको
विश्राम देनेवाले श्रुतियोंके सारभूत भगवान् श्रीकृष्णकी आधारभूमि है।

Bhagwat Geeta chhata adhyay

तत्पश्चात् मथुरासे पश्चिम और उत्तर दिशाकी ओर बहुत दूरतक जानेपर सारथिको काश्मीर नामक नगर दिखायी दिया, जहाँ शङ्खके
समान उज्ज्वल गगनचुम्बी महलों की पंक्तियाँ भगवान् शङ्करके अट्टहासकी भाँति शोभा पाती हैं। जहाँ ब्राह्मणोंके शास्त्रीय आलाप सुनकर मूक मनुष्य भी सुन्दर वाणी और पदोंका उच्चारण करते देवताके समान हो जाते हैं। जहाँ निरन्तर होनेवाले यज्ञ-धूमसे व्याप्त होनेके कारण आकाश-मण्डल मेघोंसे धुलते रहनेपर भी अपनी कालिमा नहीं छोड़ता। जहाँ उपाध्याय के पास आकर छात्र जन्मकालीन अभ्यास से ही सम्पूर्ण कलाएँ स्वतः पढ़ लेते हैं तथा जहाँ माणि केश्वर नामसे प्रसिद्ध भगवान् चन्द्रशेखर देहधारियों को वरदान देने के लिये नित्य निवास करते हैं। काश्मीरके राजा माणिक्येशने दिग्विजयमें समस्त राजाओंको जीतकर भगवान् शिवका पूजन किया था, तभीसे उनका नाम माणिक्येश्वर हो गया था। उन्हींके मन्दिरके दरवाजेपर महात्मा रैक्च एक छोटी-सी गाड़ीपर बैठे अपने अङ्गोंको खुजलाते हुए वृक्षकी छायाका सेवन कर रहे थे। इसी अवस्थामें सारथिने उन्हें देखा ।

राजा के बताये भिन्न -भिन्न चिह्नों से उसने शीघ्र ही रैक्वको पहचान लिया और उनके चरणों में प्रणाम करके कहा- ‘ब्रह्मन् ! आप किस स्थान पर रहते हैं ? आपका पूरा नाम क्या है ? आप तो सदा स्वच्छन्द विचरनेवाले हैं, फिर यहाँ किस लिये ठहरे हैं ? इस समय आपका क्या करने का विचार है ?’ सारथि के ये वचन सुनकर परम आनन्द में निमग्न महात्मा रैक्वने कुछ सोच कर उससे कहा-‘यद्यपि हम पूर्ण काम हैं-हमें किसी वस्तुकी आवश्यकता नहीं है, तथापि कोई भी हमारी मनोवृत्तिके अनुसार परिचर्या कर सकता है।’ रैक्वके हार्दिक अभिप्रायको आदरपूर्वक ग्रहण करके सारथि धीरेसे राजाके पास चल दिया। वहाँ पहुँचकर राजाको प्रणाम करके उसने हाथ जोड़ सारा समाचार निवेदन किया। उस समय स्वामीके दर्शनसे उसके मनमें बड़ी प्रसन्नता थी। सारथिके वचन सुनकर राजाके नेत्र आश्चर्यसे चकित हो उठे। उनके हृदयमें रैक्वका सत्कार करनेकी श्रद्धा जाग्रत् हुई।

Bhagwat Geeta chhata adhyay

उन्होंने दो खच्चरियोंसे जुती हुई एक गाड़ी लेकर यात्रा की। साथ ही मोतीके हार, अच्छे-अच्छे वस्त्र और एक सहस्र
गौएँ भी ले लीं। काश्मीर-मण्डलमें महात्मा रैक्व जहाँ रहते थे उस स्थानपर पहुँचकर राजाने सारी वस्तुएँ उनके आगे निवेदन कर दी और
पृथ्वीपर पड़कर साष्टाङ्ग प्रणाम किया। महात्मा रैक्व अत्यन्त भक्तिके साथ चरणोंमें पड़े हुए राजा जानश्रुतिपर कुपित हो उठे और बोले-‘रे
शूद्र ! तू दुष्ट राजा है । क्या तू मेरा वृत्तान्त नहीं जानता? यह खच्चरियों से जुती हुई अपनी ऊँची गाड़ी ले जा । ये वस्त्र, ये मोतियों के हार और ये दूध देनेवाली गौएँ भी स्वयं ही ले जा।’ इस तरह आज्ञा देकर रैक्वने राजाके मनमें भय उत्पन्न कर दिया। तब राजाने शापके भयसे महात्मा रैकके दोनों चरण पकड़ लिये और भक्ति पूर्वक कहा-‘ब्रह्मन् ! मुझ पर प्रसन्न होइये । भगवन् ! आपमें यह अद्भुत माहात्म्य कैसे आया ?

प्रसन्न होकर मुझे ठीक-ठीक बताइये।’ रैक्कने कहा–राजन् ! मैं प्रतिदिन गीताके छठे अध्यायका जप करता हूँ, इसीसे मेरी तेजोराशि देवताओंके लिये भी दुःसह है। तदनन्तर परम बुद्धिमान् राजा जानश्रुतिने यत्नपूर्वक महात्मा रैक्से गीता के छठे अध्यायका अभ्यास किया। इससे उन्हें मोक्षकी प्राप्ति हुई। इधर रैक भी भगवान् माणिक्येश्वरके समीप मोक्षदायक गीताके छठे अध्यायका जप करते हुए सुखसे रहने लगे। हंसका रूप धारण करके वरदान देनेके लिये आये हुए देवता भी विस्मित होकर स्वेच्छानुसार चले गये । जो मनुष्य सदा इस एक ही अध्यायका जप करता है, वह भी भगवान् विष्णुके ही स्वरूपको प्राप्त होता है-इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

श्रीपरमात्मने नमः

अथ षष्ठोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

अनाश्रितः कर्मफलं कार्य कर्म करोति यः । स सन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः। १ ।
यं सत्र्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन । २ ।
आरुरुक्षोर्मुनयोगं कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते। ३ ।
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषजते । सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते। ४ ।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः। ५ ।
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्। ६ ।
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः। ७ ।
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्या कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः। ८।
सुहृन्मित्रायुदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते। १ ।
योगी युनीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः । १०॥
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् । ११ ।

यदा तत्रैकानं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युज्याद्योगमात्मविशुद्धये । १२ ।
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्। १३ ।
प्रशान्तात्मा विगतभीब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मञ्चित्तो युक्त आसीत मत्परः । १४ ।
युञ्जनेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः । शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति । १५ ।
नात्यश्चतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन । १६ ।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा। १७ ।
विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा । १८।

श्रीभगवानुवाच

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः । १९ ।
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति । २०।
सुखमात्यन्तिकं यत्तबुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः । २१ ।
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिस्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते । २२।
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोग योगसज्जितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा । २३ ।
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । मनसैवेन्द्रियग्राम विनियम्य समन्ततः । २४।
शनैः शनैरूपरमेदबुद्ध्या धृतिगृहीतया। आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् । २५।
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलपस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् । २६ ।

प्रशान्तमनसं होनं योगिनं सुखमुत्तमम् । उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्। २७।
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते । २८।
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः । २९ ।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति । ३० ।
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते। ३१ ।
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः । ३२।

अर्जुन उवाच

योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थिति स्थिराम्। ३३ ।
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्धृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् । ३४ ।

श्रीभगवानुवाच

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते। ३५ ॥
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः । ३६

अर्जुन उवाच

अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति । ३७
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि । ३८

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते । ३९ ।

श्रीभगवानुवाच

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति । ४० ।
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते । ४१ ।
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् । ४२ ।
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन । ४३।
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते । ४४ ।
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्। ४५ ।
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन । ४६।
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना । श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः । ४७ ।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६॥

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

छठा अध्याय ( हिन्दी में )

उसके उपरान्त श्रीकृष्ण महाराज बोले, हे अर्जुन ! जो पुरुष कर्मके फलको न चाहता हुआ करनेयोग्य कर्म करता है वह संन्यासी और
योगी है और केवल अग्निको त्यागनेवाला संन्यासी, योगी नहीं है, तथा केवल क्रियाओंको त्यागनेवाला भी संन्यासी, योगी नहीं है।१।

इसलिये हे अर्जुन ! जिसको संन्यास* ऐसा कहते हैं उसी को तू योग जान, क्योंकि संकल्पों को न त्यागनेवाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता। २ ।

समत्व-बुद्धिरूप योगमें आरूढ़ होनेकी इच्छावाले मननशील पुरुषके लिये योगकी प्राप्तिमें निष्कामभावसे कर्म करना ही हेतु कहा है
और योगारूढ़ हो जानेपर उस योगारूढ़ पुरुषके लिये सर्वसंकल्पोंका भाव ही कल्याणमें हेतु कहा है। ३।

जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में आसक्त होता है तथा न कोंमें ही आसक्त होता है, उस कालमें सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है। ४।

Shrimad bhagwat geeta katha || श्रीमद्भगवद्गीता प्रथम अध्याय।

यह योगारूढ़ता कल्याणमें हेतु कही है, इसलिये मनुष्यको चाहिये कि अपने द्वारा अपना संसार-समुद्रसे उद्धार करे और अपने आत्माको
अधोगतिमें न पहुँचावे, क्योंकि यह जीवात्मा आप ही तो अपना मित्र है, और आप ही अपना शत्रु है अर्थात् और कोई दूसरा शत्रु या मित्र नहीं
है। ५ ।

Bhagwat Geeta chhata adhyay

उस जीवात्माका तो वह आप ही मित्र है कि जिस जीवात्माद्वारा मन और इन्द्रियोंसहित शरीर जीता हुआ है और जिसके द्वारा मन और
इन्द्रियोंसहित शरीर नहीं जीता गया है उसका वह आप ही शत्रुके सदृश शत्रुतामें बर्तता है। ६।

हे अर्जुन ! सर्दी, गर्मी और सुख, दुःखादिकोंमें तथा मान और अपमानमें जिसके अन्तःकरणकी वृत्तियाँ अच्छी प्रकार  शान्त हैं, अर्थात् विकाररहित हैं ऐसे स्वाधीन आत्मावाले पुरुषके ज्ञानमें सच्चिदानन्दघन परमात्मा सम्यक् प्रकारसे स्थित है, अर्थात् उसके ज्ञानमें परमात्माके सिवा अन्य कुछ है ही नहीं। ७।

ज्ञान-विज्ञानसे तृप्त है अन्तःकरण जिसका तथा विकाररहित है स्थिति जिसकी और अच्छी प्रकार जीती हुई हैं इन्द्रियाँ जिसकी तथा समान है मिट्टी, पस्थर और सुवर्ण जिसके, वह योगी युक्त अर्थात् भगवत्की प्राप्तिवाला है, ऐसे कहा जाता है। ८ ।

जो पुरुष सुहृद्* , मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ , द्वेषी और बन्धुगणों में तथा धर्मात्माओं में और पापियोंमें भी समान भाववाला है वह अति श्रेष्ठ है । ९ ।

Bhagwat Geeta dwitiya adhyay ।। श्रीमद्भगवद्गीता महत्तव

इसलिये उचित है कि जिसका मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, ऐसा वासनारहित और संग्रहरहित योगी अकेला ही एकान्त स्थान में स्थित हुआ निरन्तर आत्माको परमेश्वरके ध्यानमें लगावे। १० ।

शुद्ध भूमिमें कुशा, मृगछाला और वस्त्र हैं उपरोपरि जिसके ऐसे अपने आसनको न अति ऊँचा और न अति नीचा स्थिर स्थापन करके। ११।

और उस आसनपर बैठकर तथा मनको एकाग्र करके चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको वशमें किया हुआ अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास करे। १२ ।

Bhagwat Geeta chhata adhyay

उसकी विधि इस प्रकार है कि काया, सिर और ग्रीवा को समान और अचल धारण किये हुए दृढ़ होकर अपनी नासिकाके अग्रभाग को देखकर, अन्य दिशाओंको न देखता हुआ। १३ ।

और ब्रह्मचर्यके व्रतमें स्थित रहता हुआ भयरहित तथा अच्छी प्रकार शान्त अन्तःकरणवाला और सावधान होकर मनको वशमें करके, मेरेमें लगे हुए चित्तवाला और मेरे परायण हुआ स्थित होवे। १४ ।

Bhagwat Geeta third adhayay ।। mahatmy

इस प्रकार आत्माको निरन्तर परमेश्वरके स्वरूपमें लगाता हुआ स्वाधीन पनवाला योगी मेरेमें स्थितिरूप परमानन्द पराकाष्ठावाली शान्तिको प्राप्त होता है। १५।

परंतु हे अर्जुन ! यह योग न तो बहुत खानेवालेका सिद्ध होता है और न बिलकुल न खानेवालेका तथा न अति शयन करनेके स्वभाववाले का और न अत्यन्त जागनेवालेका ही सिद्ध होता है । १६ ।

यह दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका तथा कर्मोमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका और यथायोग्य शयन करने तथा जागनेवालेका ही सिद्ध होता है। १७।

इस प्रकार योगके अभ्याससे अत्यन्त वशमें किया हुआ चित्त जिस कालमें परमात्मामें ही भली प्रकार स्थित हो जाता है उस कालमें सम्पूर्ण
कामनाओंसे स्पृहारहित हुआ पुरुष योगयुक्त ऐसा कहा जाता है। १८ ।

छठा अध्याय ( हिन्दी में )

जिस प्रकार वायुरहित स्थानमें स्थित दीपक चलायमान नहीं होता है, वैसी ही उपमा परमात्माके ध्यानमें लगे हुए योगीके जीते चित्तकी
कही गयी है। १९ ।

हे अर्जुन ! जिस अवस्थामें योगके अभ्याससे निरुद्ध हुआ चित्त उपराम हो जाता है और जिस अवस्थामें परमेश्वरके ध्यानसे शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिद्वारा परमात्माको साक्षात् करता हुआ सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही संतुष्ट होता है । २० ।

तथा इन्द्रियोंसे अतीत केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिद्वारा ग्रहण करनेयोग्य जो अनन्त आनन्द है उसको जिस अवस्थामें अनुभव करता है और जिस अवस्थामें स्थित हुआ यह योगी भगवत्स्वरूपसे नहीं चलायमान होता है। २१ ।

Bhagwat geeta chautha adhyay, in hindi

और परमेश्वरकी प्राप्तिरूप जिस लाभको प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता है और भगवत्-प्राप्तिरूप जिस अवस्थामें स्थित हुआ योगी बड़े भारी दुःखसे भी चलायमान नहीं होता है। २२ ।

जो दुःखरूप संसारके संयोगसे रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिये, वह योग न उकताये हुए चित्तसे अर्थात् तत्पर
हुए चित्तसे निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है। २३ ।

Bhagwat Geeta chhata adhyay

इसलिये मनुष्य को चाहिये कि संकल्प से उत्पन्न होने वाली सम्पूर्ण कामनाओंको निःशेषतासे अर्थात् वासना और आसक्ति सहित त्यागकर और मनके द्वारा इन्द्रियोंकेसमुदायको सब ओरसे ही अच्छी प्रकार वशमें करके । २४ ।

क्रम- क्रम से अभ्यास करता हुआ उपरामता को प्राप्त होवे तथा धैर्ययुक्त बुद्धिद्वारा मनको परमात्मामें स्थित करके परमात्माके सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे। २५ ।

परंतु जिसका मन वशमें नहीं हुआ हो उसको चाहिये कि यह स्थिर न रहनेवाला और चञ्चल मन जिस-जिस कारणसे सांसारिक पदार्थों में विचरता है उस-उससे रोककर बारम्बार परमात्मामें ही निरोध करे। २६ ।

Bhagwat Geeta panchwa adhyay, or mahatm

क्योंकि जिसका मन अच्छी प्रकार शान्त है और जो पापसे रहित है और जिसका रजोगुण शान्त हो गया है, ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ब्रह्मके साथ एकीभाव हुए योगीको अति उत्तम आनन्द प्राप्त होता है। २७ ।

वह पापरहित योगी इस प्रकार निरन्तर आत्माको परमात्मामें लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप अनन्त आनन्द को अनुभव करता है। २८।

हे अर्जुन ! सर्वव्यापी अनन्त चेतनमें एकीभावसे स्थितिरूप योगसे युक्त हुए आत्मावाल तथा सबमें समभावसे देखनेवाला योगी आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें बर्फमें जलके सदृश व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें देखता है अर्थात् जैसे स्वप्नसे जगा हुआ पुरुष स्वप्नके संसारको अपने अन्तर्गत संकल्पके आधार देखता है, वैसे ही वह पुरुष सम्पूर्ण भूतोंको अपने सर्वव्यापी अनन्त चेतन आत्माके अन्तर्गत संकल्पके आधार देखता है। २९ ।

जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेवको ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतोंको मुझ वासुदेवके अन्तर्गत * देखता है उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता है, क्योंकि वह मेरेमें एकीभावसे स्थित है। ३० ।

Bhagwat Geeta chhata adhyay

इस प्रकार जो पुरुष एकीभाव में स्थित हुआ सम्पूर्ण भूतोंमें आत्मरूपसे स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेवको भजता है, वह योगी सब प्रकारसे बर्तता हुआ भी मेरे में ही बर्तता है, क्योंकि उसके अनुभवमें मेरे सिवा अन्य कुछ है ही नहीं। ३१ ।

हे अर्जुन ! जो योगी अपनी सादृश्यतासे* सम्पूर्ण भूतोंमें सम देखता है और सुख अथवा दुःखको भी सबमें सम देखता है, वहयोगी परमश्रेष्ठ माना गया है। ३२ ।

इस प्रकार भगवानके वाक्योंको सुनकर अर्जुन बोले, हे मधुसूदन ! जो यह ध्यानयोग आपने समत्वभावसे कहा है, इसकी मैं मनके चञ्चल होनेसे बहुत कालतक ठहरनेवाली स्थितिको नहीं देखता हूँ। ३३।

क्योंकि हे कृष्ण ! यह मन बड़ा चञ्चल और प्रमथन स्वभाववाला है तथा बड़ा दृढ़ और बलवान् है इसलिये इसका वशमें करना मैं वायुकी भाँति अति दुष्कर मानता हूँ । ३४ ।

इस प्रकार अर्जुनके पूछनेपर श्रीकृष्णभगवान् बोले, हे महाबाहो ! निःसंदेह मन चञ्चल और कठिनतासे वशमें होनेवाला है, परंतु हे कुन्तीपुत्र अर्जुन !अभ्यास* अर्थात् स्थितिके लिये बारम्बार यत्न करनेसे और वैराग्यसे वशमें होता है, इसलिये इसको अवश्य वशमें करना चाहिये । ३५।

क्योंकि मनको वशमें न करनेवाले पुरुषद्वारा योग दुष्प्राप्य है अर्थात् प्राप्त होना कठिन है और स्वाधीन मनवाले प्रयत्नशील पुरुषद्वारा साधन
करनेसे प्राप्त होना सहज है, यह मेरा मत है। ३६ ।

इसपर अर्जुन बोले, हे कृष्ण ! योगसे चलायमान हो गया है मन जिसका, ऐसा शिथिल यत्नवाला श्रद्धायुक्त पुरुष योगकी सिद्धिको अर्थात् भगवत्-साक्षात्कारताको न प्राप्त होकर किस गतिको प्राप्त होता । ३७।

हे महाबाहो ! क्या वह भगवत्प्राप्तिके मार्ग में मोहित हुआ आश्रयरहित पुरुष छिन्न-भिन्न बादलकी भाँति दोनों ओरसे अर्थात् भगवत्प्राप्ति और सांसारिक भोगोंसे भ्रष्ट हुआ नष्ट तो नहीं हो जाता है ? । ३८ ।

हे कृष्ण ! मेरे इस संशयको सम्पूर्णतासे छेदन करनेके लिये आप ही योग्य हैं, क्योंकि आपके सिवा दूसरा इस संशयका छेदन करनेवाला मिलना सम्भव नहीं है। ३९ ।

Bhagwat Geeta chhata adhyay

इस प्रकार अर्जुनके पूछनेपर श्रीकृष्णभगवान् बोले, हे पार्थ ! उस पुरुष का न तो इस लोकमें और न परलोक में ही नाश होता है, क्योंकि
हे प्यारे ! कोई भी शुभकर्म करनेवाला अर्थात् भगवत्-अर्थ कर्म करने- वाला दुर्गतिको नहीं प्राप्त होता । ४०।

किंतु वह योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानोंके लोकोंको अर्थात् स्वर्गादिक उत्तम लोकोंको प्राप्त होकर, उनमें बहुत वर्षोंतक वास करके शुद्ध आचरणवाले श्रीमान् पुरुषोंके घरमें जन्म लेता है। ४१ ।

अथवा वैराग्यवान् पुरुष उन लोकोंमें न जाकर ज्ञानवान् योगियोंके ही कुलमें जन्म लेता है, परंतु इस प्रकारका जो यह जन्म है, सो संसारमें निःसंदेह अति दुर्लभ है। ४२ ।

वह पुरुष वहाँ उस पहिले शरीरमें साधन किये हुए बुद्धिके संयोगको अर्थात् समत्वबुद्धि- योगके संस्कारोंको अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे कुरुनन्दन ! उसके प्रभावसे फिर अच्छी प्रकार भगवत्प्राप्तिके निमित्त यत्न करता है। ४३।

वह* विषयोंके वशमें हुआ भी उस पहिलेके अभ्याससे ही निःसंदेह भगवत्की ओर आकर्षित किया जाता है तथा समत्वबुद्धिरूप योगका जिज्ञासु भी वेदमें कहे हुए सकाम कर्मोके फलको उल्लङ्घन कर जाता है। ४४ ।

जब कि इस प्रकार मन्द प्रयत्न करनेवाला योगी भी परमगति को प्राप्त हो जाता है, तब क्या कहना है कि अनेक जन्मोंसे अन्तःकरण की शुद्धिरूप सिद्धिको प्राप्त हुआ और अति प्रयत्नसे अभ्यास करनेवाला योगी सम्पूर्ण पापोंसे अच्छी प्रकार शुद्ध होकर, उस साधनके  प्रभावसे परमगतिको प्राप्त होता है, अर्थात् परमात्माको प्राप्त होता है। ४५ ।

क्योंकि योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है और शास्त्रके ज्ञानवालों से भी श्रेष्ठ माना गया है तथा सकाम कर्म करने वालोंसे भी योगी श्रेष्ठ है, इससे हे अर्जुन ! तू योगी हो। ४६।

हे प्यारे ! सम्पूर्ण योगियोंमें भी जो श्रद्धावान् योगी मेरेमें लगे हुए अन्तरात्मासे मेरेको निरन्तर भजता है, वह योगी मुझे परमश्रेष्ठ मान्य है। ४७ ।

इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुनकेसंवाद में “आत्मसंयमयोग” नामक छठा अध्याय ॥६॥

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