भगवान शिव तांडव स्त्रोत्र हिन्दी अर्थ सहित ।। Shiv tandav stotram.
आज हम आपको “Shiv tandav stotram”, ! को हिन्दी अर्थ सहित बताने वाले है।
शिव तांडव स्त्रोत का निर्माण कैसे हुआ था ? इसका निर्माण किसने किया था ?
इसकी पूरी कहानी हम आपको बताने वाले है।

शिव तांडव स्त्रोत्र निर्माण, shiv tandav stotram
पाठको़ शिव तांडव स्त्रोत्र का निर्माण रावन द्वारा हुआ था। एक समय की बात है। रावण आखेट करते हुए। भगवान शिव के निवास स्थान कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास करते है। यह कार्य रावण अपनी शक्तियों के मद् मे चूर होकर करते है। उन्हें अपनी शक्तियों पर बहुत अभिमान होता है। रावण को लगता था की उसने शक्तिशाली इस संसार मे कोई नही। किंतु भगवान शिव रावण का घमंड शीध्र ही तोड़ देते है।
जब रावण कैलाश पर्वत को उठाने लगता है। तो भगवान शिव कैलाश पर्वत पर अपना पांव रख वजन बड़ देते है। रावन के दोनो हाथ कैलाश पर्वत के निचे दब जाते है। तब रावण पीड़ा से रूधन करते है। और भगवान शिव से क्षमा मांगते है। उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करते है। तब रावण शिव तांडव स्त्रोत्र बोलना आरम्भ करते है। भगवान शिव रावण पर प्रसन्न हो उन्हें मुक्त कर देते है। और वरदान स्वरूप चंद्रहास तलवार प्रदान करते है।
शिव तांडव स्त्रोत्र हिन्दी अर्थ सहित
जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं चकार चंडतांडवंत नोतु नः शिवः शिवम ?
अर्थ – उनके बालों से बहने वाले जल से उनका कंठ पवित्र है ! और उनके गले में सांप है
जो हार की तरह लटका है ! और डमरू से डमट् डमट् डमट् की ध्वनि निकल रही है !
भगवान शिव शुभ तांडव नृत्य कर रहे हैं, वे हम सबको संपन्नता प्रदान करें।
जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी। विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ?
अर्थ – मेरी शिव में गहरी रुचि है ! जिनका सिर अलौकिक गंगा नदी की बहती लहरों
की धाराओं से सुशोभित है ! जो उनकी बालों की उलझी जटाओं की गहराई में उमड़
रही हैं ! जिनके मस्तक की सतह पर चमकदार अग्नि प्रज्वलित है ! और जो अपने सिर
पर अर्ध-चंद्र का आभूषण पहने हैं।
धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे।
कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदिक वचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ?
अर्थ – मेरा मन भगवान शिव में अपनी खुशी खोजे ! अद्भुत ब्रह्माण्ड के सारे प्राणी जिनके
मन में मौजूद हैं ! जिनकी अर्धांगिनी पर्वतराज की पुत्री पार्वती हैं ! जो अपनी करुणा दृष्टि से
असाधारण आपदा को नियंत्रित करते हैं ! जो सर्वत्र व्याप्त है, और जो दिव्य लोकों को अपनी
पोशाक की तरह धारण करते हैं।
जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे।
मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरेमनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ?
अर्थ – मुझे भगवान शिव में अनोखा सुख मिले, जो सारे जीवन के रक्षक हैं, उनके रेंगते
हुए सांप का फन लाल-भूरा है और मणि चमक रही है, ये दिशाओं की देवियों के सुंदर
चेहरों पर विभिन्न रंग बिखेर रहा है, जो विशाल मदमस्त हाथी की खाल से बने जगमगाते
दुशाले से ढंका है।
सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः।
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ?
सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ?
धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक- प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ?
निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ?
प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा-विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ?
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ?

धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल-ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ?
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः। समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ?
कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्कदा सुखी भवाम्यहम् ?
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ?
प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम् ?
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ?
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ?



