Sankalp kya hota hai ।। संकल्प कैसे करते है।

Sankalp kya hota hai ।। संकल्प कैसे करते है। साधना से पहले संकल्प करना क्यों जरुरी होता है।

 

आज हम आपको बताने वाले है। “sankalp kya hota hai”, इसे हमे क्या लाभ होता है ? संकल्प कैसे करते है ? आखिर क्यों किसी भी धार्मिक कार्य, पूजा, जाप, हवन, पाठ, मे संकल्प पहले किया जाता है ? संकल्प कितने प्रकार का‌ होता है ? इसे करने की सही विधि क्या है ? इसका पौराणिक इतिहास क्या है। अगर संकल्प न करे तो क्या होता है ? आज हम आपको‌ पूरी‌‌ जानकारी देने वाले है।

Sankalp kya hota hai

संकल्प क्या होता है ?

किसी भी कार्य को करने के लिए ! दृढ़ निश्चय कर लेना, ही संकल्प कहलाता है ! हमारे सनातन धर्म मे कोई भी धार्मिक कार्य से पहले, जैसे पाठ-पूजा, जप-अनुष्ठान, व साधनाओ आदि मे संकल्प करना, अति आवश्यक माना जाता है ! और बिना संकल्प के पूजा अधूरी मानी जाती है।

संकल्प का पौराणिक इतिहास

शास्त्रों के अनुसार कहा जाता है ! कि देवराज इन्द्र को हमेशा भय रहता था ! कि उन‌‌से कोई उनका आसन न छीन ले ! इस कारण बिना “संकल्प”, की गई पूजा का सारा फल देवराज इन्द्र ले जाता है ! जिसके कारण हमारे पूजा सफल नही होती।

संकल्प कितने प्रकार के होते है ?

पाठकों संकल्प दो प्रकार के होतो है। साधारण व विषेश।

  1. साधारण संकल्प – जिस भी देवी-देवता की पूजा करनी होती है। उनकी प्रतिमा के सामने बैठकर, हाथ मे चावल या पानी लेकर, उनका ध्यान करते हुए बोलते है, कि हे देव मै आपकी पूजा मेरी विभिन्न इच्छा की पूर्ति के लिए कर रहा हूँ। अपना नाम, गौत्र, पिता का नाम व ग्राम (city) बोले। और जल या चावल को जिनकी पूजा कर रहे है। उनके चरणो मे चढ़ा दे। इस तरह से आपका साधारण संकल्प हो जाता है।

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  1. विषेश संकल्प – इसमे आपको मौली व सुपारी से एक गणेश निर्मित करना होता है। इसके अतिरिक्त आप गणेश भगवान की प्रतिमा भी ले सकते है। यह संकल्प आपको ब्राह्मण करवाते है। क्योंकि विशेष संकल्प मंत्रो के द्वारा किया जाता है। और गणेश भगवान को साक्षी मानकर किया जाता है। इस संकल्प को करने के लिए, हाथ मे जल, पुष्प, चावल व दक्षिणा लेकर किया जाता है। और यह बोला जाता है। गणेश भगवान जी मै विभिन्न देवता का पूजन करना चाहता हूँ। और आपको साक्षी बनाकर कर रहा हूँ। आप मेरी पूजा को बिना किसी विध्न के सफल बनाए। संकल्प का मंत्र हम आपको नीचे दे रहे है।

संकल्प मत्र – ॐ विष्णवे नम:, ॐ विष्णवे नम:, ॐ विष्णवे नम:। ॐ अध्य ब्रह्मणोह्रि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे ,वैवस्वतमन्वन्तरेष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे बौध्दावतारे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे ….क्षेत्रे, नगरे, ग्रामे….नाम-संवत्सरे….मासे (शुक्ल-कृष्ण) पक्षे…., तिथौ…., गोत्र:…., गुप्तोहम् प्रात: (मध्य-सायं) सर्वकर्मसु शुध्दयर्थ श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं श्रीभगवत्प्रीत्यर्थ च अमुक कर्म करिष्ये।

संकल्प का अर्थ

पाठकों संकल्प लेने का अर्थ होता है। कि हम अपने कुल देवी-देवता, इष्ट देवता, वह स्वयं को साक्षी मानकर, यह पूजन कर्म हम विभिन्न इच्छाओं की पूर्ति के लिए कर रहे है। और हम संकल्प को अवश्य पूर्ण करेंगे। ऎसा करने से हमारी कार्य करने की शक्ति दृढ़ होती है।

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संकल्प करने के लाभ

किसी भी पूजा-पाठ, व धार्मिक कार्य मे संकल्प करने से शीध्र सफलता मिलती है। आपको अपने व्रत व जाप का पूर्ण फल प्राप्त होता है। क्योंकि जिस भी भगवान को हम साक्षी मानकर संकल्प लेते है, वह हमारी पूजा के साक्षी होते है। संकल्प एक लाइसेंस की तरह काम करता है। इस लिए कोई भी पूजा करने से पहले संकल्प अवश्य करें।

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महत्वपूर्ण जानकारी

पाठकों उपर संकल्प मंत्र मे जो कुछ स्थान आते है। जैसे क्षेत्रे, नगरे इनके स्थान पर अप अपने शहर या गांव का नाम ले। और जो भी स्थान दिये गये है। वहाँ भी आपको मास के स्थान पर कौन सा महीना चल रहा है। पक्ष के स्थान पर जैसे शुक्ल पक्ष व कृष्ण पक्ष जो भी पक्ष हो वह बोले। तिथौ के स्थान पर कौन सी तिथि है। गोत्र के स्थान पर अमना गोत्र बताए। और जहाँ अमुक है। वहाँ जिस भी देव की पूजा व साधना कर रहे है। उनकस नाम ले। आदेश।

पाठकों यदि आपको कुछ समझने मे परेशानी हो रही है। तो आप हमे comments करके पूछ सकते है। ताकि हम आपकी पूरी सहायता कर सके।

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