Bhagwat Geeta navam adhyay, or mahatm

श्रीमद्भगवद्गीता नवम अध्याय व माहात्म्य ।। Bhagwat geeta navam adhyay

पाठकों आप सब के लिए प्रस्तुत है। ” Bhagwat Geeta navam adhyay ” श्रीमद्भगवद्गीता नवम‌ अध्याय व माहात्म्य हिन्दी में।

 

Bhagwat Geeta navam adhyay, or mahatm

 

श्रीमद्भगवद्गीताके नवें अध्यायका माहात्म्य

महादेव जी कहते हैं-पार्वती ! अब मैं आदर पूर्वक नवम अध्याय के माहात्म्य का वर्णन करूँगा, तुम स्थिर होकर सुनो। नर्मदा के तटपर माहिष्मती नाम की एक नगरी है। वहाँ माधव नाम के एक ब्राह्मण रहते थे, जो वेद-वेदाङ्गों के तत्त्वज्ञ और समय-समय पर आने वाले अतिथि यों के प्रेमी थे। उन्होंने विद्या के द्वारा बहुत धन कमा कर एक महान् यज्ञ का अनुष्ठान आरम्भ किया । उस यज्ञ में बलि देने के लिये एक बकरा मँगाया गया। जब उसके शरीर की पूजा हो गयी, तब सब को आश्चर्य में डालते हुए उस बकरे ने हँसकर उच्च स्वर से कहा-‘ब्रह्मन् ! इन बहुत-से यज्ञों द्वारा क्या लाभ है।

इनका फल तो नष्ट हो जाने वाला है तथा ये जन्म, जरा और मृत्यु के भी कारण हैं। यह सब करने पर भी मेरी जो वर्तमान दशा है, इसे देख लो।’ बकरे के इस अत्यन्त कौतूहल जनक वचन को सुनकर यज्ञमण्डप में रहने वाले सभी लोग बहुत ही विस्मित हुए। यजमान ब्राह्मण हाथ जोड़ अपलक नेत्रों से देखते हुए बकरे को प्रणाम करके श्रद्धा और आदर के साथ पूछने लगे। ब्राह्मण बोले-आप किस जाति के थे? आप का स्वभाव और आचरण कैसा था ? तथा किस कर्म से आपको बकरे की योनि प्राप्त हुई ? यह सब मुझे बताइये।

बकरा बोला-ब्रह्मन् ! मैं पूर्वजन्म में ब्राह्मणों के अत्यन्त निर्मल कुल में उत्पन्न हुआ था। समस्त यज्ञों का अनुष्ठान करने वाला और वेद-विद्या में
प्रवीण था। एक दिन मेरी स्त्रीने भगवती दुर्गा की भक्ति से विनम्र होकर अपने बालक के रोग की शान्ति के लिये बलि देने के निमित्त मुझसे एक बकरा माँगा। तत्पश्चात् जब चण्डिका के मन्दिर में वह बकरा मारा जाने लगा, उस समय उसकी माता ने मुझे शाप दिया-‘ओ ब्राह्मणों में नीच, पापी ! तू मेरे बच्चे का वध करना चाहता है; इसलिये तू भी बकरे की योनिमें  जन्म लेगा।

Bhagwat Geeta navam adhyay or mahatm

द्विजश्रेष्ठ ! तब काल वश मृत्यु को प्राप्त होकर मैं बकरा हुआ। यद्यपि मैं पशु-योनि में पड़ा हूँ, तो भी मुझे अपने पूर्वजन्मों का स्मरण बना हुआ है। ब्रह्मन् ! यदि आपको सुनने की उत्कण्ठा हो, तो मैं एक और भी आश्चर्य की बात बताता हूँ। कुरुक्षेत्र नाम का एक नगर है, जो मोक्ष प्रदान करने वाला है। वहाँ चन्द्र शर्मा नामक एक सूर्यवंशी राजा राज्य करते थे। एक समय जब कि सूर्यग्रहण लगा था, राजा ने बड़ी श्रद्धा के साथ काल पुरुष का दान करने की तैयारी की। उन्होंने वेद-वेदाङ्गों के पारगामी एक विद्वान् ब्राह्मण को बुलवाया और पुरोहित के साथ वे तीर्थ के पावन जल से स्नान करने को चले।

तीर्थ के पास पहुँचकर राजा ने स्नान किया और दो वस्त्र धारण किये फिर पवित्र एवं प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने श्वेत चन्दन लगाया और बगल में खड़े हुए पुरोहित का हाथ पकड़ कर तत्कालोचित मनुष्यों से घिरे हुए अपने स्थानपर लौट आये। आने पर राजा ने यथोचित विधि से भक्ति पूर्वक ब्राह्मण को काल पुरुष का दान किया। तब काल पुरुष का हृदय चीरकर उसमें से एक पापात्मा चाण्डाल प्रकट हुआ। फिर थोड़ी देर के बाद निन्दा भी चाण्डाली का रूप धारण करके कालपुरुष के शरीर से निकली और ब्राह्मण के पास आ गयी।

इस प्रकार चाण्डालों की वह जोड़ी आँखें लाल किये निकली और ब्राह्मण के शरीर में हठात् प्रवेश करने लगी। ब्राह्मण मन-ही-मन गीता के नवम अध्याय का जप करते और राजा चुपचाप यह सब कौतुक देखने लगे। ब्राह्मण के अन्तःकरण में भगवान् गोविन्द शयन करते थे। वे उन्हीं का ध्यान करने लगे। ब्राह्मण ने [ जब गीता के नवम अध्याय का जप करते हुए ] अपने आश्रयभूत भगवान का ध्यान किया, उस समय गीता के अक्षरों से प्रकट हुए विष्णुदूतों द्वारा पीड़ित होकर वे दोनों चाण्डाल भाग चले।

Bhagwat Geeta navam adhyay or mahatm

उनका उद्योग निष्फल हो गया। इस प्रकार इस घटना को प्रत्यक्ष देख कर राजा के नेत्र आश्चर्य से चकित हो उठे। उन्होंने ब्राह्मण से पूछा-‘विप्रवर ! इस महाभयंकर आपत्ति को आपने कैसे पार किया ? आप किस मन्त्र का जप तथा किस देवता का स्मरण कर रहे थे? वह पुरुष तथा वह स्त्री कौन थी? वे दोनों कैसे उपस्थित हए? फिर वे शान्त कैसे हो गये? यह सब मुझे बतलाइये।’ राजन् ! चाण्डाल का रूप धारण करके भयंकर पाप ही ब्राह्मण ने कहा- प्रकट हुआ था तथा वह स्त्री निन्दा की साक्षात् मूर्ति थी। मैं इन दोनों को ऐसा ही समझता हूँ। उस समय मैं गीता के नवें अध्याय के मन्त्रों की माला जपता था। उसी का माहात्म्य है कि सारा संकट दूर हो गया।

महीपते ! मैं नित्य ही गीता के नवम अध्याय का जप करता हूँ उसी के प्रभाव से प्रतिग्रहजनित आपत्तियों के पार हो सका हूँ। यह सुनकर राजा ने उसी ब्राह्मण से गीता के नवम अध्याय का अभ्यास किया, फिर वे दोनों ही परमशान्ति (मोक्ष) को प्राप्त हो गये। [यह कथा सुनकर ब्राह्मण ने बकरे को बन्धन से मुक्त कर दिया और गीता के नवें अध्याय के अभ्यास से परमगति को प्राप्त किया।]

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

अथ नवमोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे। ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्। १ ।
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं धर्म्य सुसुखं कर्तुमव्ययम्। २ ।
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य मया परन्तप । अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि। ३ ।
ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः। ४ ।
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः। ५ ।
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय। ६ ।

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृति यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्। ७ ।
प्रकृति स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्। ८ ।
न च मा तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय । उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु। ९ ।
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते । १०।
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्। ११ ।
पोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृति मोहिनीं श्रिताः । १२ ।

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवी प्रकृतिमाश्रिताः । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्। १३ ।
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते। १४ ।
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्।१५।
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्।१६।
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च । १७ ।
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहत् । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्। १८।
तपाम्यहमहं वर्ष निगृह्णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन । १९ ।

श्रीभगवानुवाच

विद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्। २०।
तेतं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते। २१ ।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्। २२ ।
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् । २३ ।
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते । २४ ।
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्। २५ ।

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः । २६।
यत्करोषि यदनासि यजुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्। २७ ।
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः । सन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि । २८ ।
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्। २९ ।
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः । ३०।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति । ३१ ।
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् । ३२।
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्। ३३ ।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः । ३४ ।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्याया योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९॥

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

नवाँ अध्याय

उसके उपरान्त श्रीकृष्ण भगवान् बोले, हे अर्जुन ! तुझ दोषदृष्टि रहित भक्त के लिये इस परम गोपनीय ज्ञान को रहस्य के सहित

कहूँगा कि जिसको जानकर तू दुःखरूप संसार से मुक्त हो जायगा। १।

यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा तथा सब गोपनीयों का भी राजा एवं अति पवित्र, उत्तम, प्रत्यक्ष फल वाला और धर्मयुक्त है,

साधन करने को बड़ा सुगम और अविनाशी है। २ ।

हे परंतप ! इस तत्त्वज्ञान रूप धर्म में श्रद्धा रहित पुरुष मेरे को न प्राप्त होकर मृत्यु रूप संसार चक्रमें भ्रमण करते हैं। ३ ।

हे अर्जुन ! मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा से यह सब जगत् जल से बर्फ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अन्तर्गत संकल्प के

आधार स्थित हैं इसलिये वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ। ४।

Shrimad bhagwat geeta katha || श्रीमद्भगवद्गीता प्रथम अध्याय।

और वे सब भूत मेरे में स्थित नहीं हैं, किंतु मेरी योग माया और प्रभाव को देख कि भूतों का धारण-पोषण करने वाला और भूतों

को उत्पन्न करने वाला भी मेरा आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है। ५।

क्योंकि जैसे आकाश से उत्पन्न हुआ, सर्वत्र विचरने वाला महान् वायु सदा ही आकाश में स्थित है, वैसे ही मेरे संकल्प द्वारा उत्पत्ति

वाले होने से सम्पूर्ण भूत मेरे में स्थित हैं, ऐसे जान।६।

हे अर्जुन ! कल्प के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात् प्रकृति में लय होते हैं और कल्पके आदि में उनको मैं फिर

रचता हूँ। ७ ।

Bhagwat Geeta navam adhyay

कैसे कि अपनी त्रिगुणमयी माया को अङ्गीकार करके, स्वभाव के वश‌ से परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण भूतसमुदाय को बारम्बार

उनके कर्मो के अनुसार रचता हूँ। ८।

हे अर्जुन ! उन कों में आसक्ति रहित और उदासीन के सदृश* स्थित हुए मुझ परमात्मा को वे कर्म नहीं बाँधते हैं। ९ ।

हे अर्जुन ! मुझ अधिष्ठाता के सकाश से यह मेरी माया चराचर- सहित सर्व जगत को रचती है और इस ऊपर कहे हुए हेतु से ही

यह संसार आवागमन रूप चक्र में घूमता है। १० ।

ऐसा होने पर भी सम्पूर्ण भूतों के महान् ईश्वर रूप मेरे परम भाव को* न जानने वाले मूढलोग मनुष्य का शरीर धारण करने वाले

मुझ परमात्मा को तुच्छ समझते हैं अर्थात् अपनी योग माया से संसार के उद्धार के लिये मनुष्य रूप में विचरते हुए को साधारण मनुष्य

मानते हैं। ११ ।

Bhagwat Geeta dwitiya adhyay ।। श्रीमद्भगवद्गीता महत्तव

जो कि वृथा आशा, वृथा कर्म और वृथा ज्ञान‌ वाले अज्ञानीजन राक्षसों के और असुरों के-जैसे मोहित करने वाले तामसी स्वभाव को

ही धारण किये हुए हैं। १२ ।

परंतु हे कुन्तीपुत्र ! दैवी प्रकृति के आश्रित हुए जो महात्माजन हैं, वे तो मेरे को सब भूतों‌ का सनातन कारण और नाश रहित अक्षरस्व

रूप जानकर अनन्यमन से युक्त निरन्तर भजते हैं। १३ ।

वे दृढ़ निश्चय वाले भक्तजन निरन्तर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिये यत्न करते हुए और मेरे को

बारम्बार प्रणाम करते हुए, सदा मेरे ध्यान में युक्त हुए अनन्य भक्ति से मुझे उपासते हैं। १४ ।

उनमें कोई तो मुझ विराट्स्वरूप परमात्मा को ज्ञानयज्ञ के द्वारा पूजन करते हुए एकत्वभाव से अर्थात् जो कुछ है, सब वासुदेव ही है,

इस भावसे उपासते हैं और दूसरे पृथक्त्वभाव से अर्थात् स्वामी-सेवक भाव से और कोई-कोई बहुत प्रकार से भी उपासते हैं । १५ ।

Bhagwat Geeta navam adhyay

क्योंकि क्रतु अर्थात् श्रौतकर्म मैं हूँ, यज्ञ अर्थात् पञ्चमहायज्ञादिक स्मार्क कर्म मैं हूँ, स्वधा अर्थात् पितरों के निमित्त दिया जाने वाला

अन्न मैं हूँ, ओषधि अर्थात् सब वनस्पतियाँ मैं हूँ, एवं मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं ही हूँ। १६ ।

हे अर्जुन ! मैं ही इस सम्पूर्ण जगत्का धाता अर्थात् धारण-पोषण करने वाला एवं कर्मो के फल को देने वाला तथा पिता, माता और

पितामह हूँ और जानने योग्य पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। १७। हे

अर्जुन ! प्राप्त होने योग्य तथा भरण-पोषण करने वाला, सबका स्वामी, शुभाशुभ का देखने वाला, सबका वासस्थान और शरण लेने

योग्य तथा प्रति-उपकार न चाहकर हित करने वाला और उत्पत्ति, प्रलयरूप तथा सबका आधार, निधान और अविनाशी कारण भी मैं

ही हूँ। १८ ।

मैं ही सूर्यरूप हुआ तपता हूँ तथा वर्षा को आकर्षण करता हूँ और वर्षाता हूँ और हे अर्जुन ! मैं ही अमृत और मृत्यु एवं सत् असत् भी

सब कुछ मैं ही हूँ। १९॥

परंतु जो तीनों वेदोंमें विधान किये हुए सकाम कर्मो को करने वाले और सोमरस को पीने वाले एवं पापों से पवित्र हुए पुरुष* मेरे

को यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति को चाहते हैं, वे पुरुष अपने पुण्यों के फलरूप इन्द्रलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य

देवताओं के भोगों को भोगते हैं। २० ।

वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्यु- लोक को प्राप्त होते हैं, इस प्रकार स्वर्ग के साधनरूप तीनों वेदों में

कहे हुए नकाम कर्म के शरण हुए और भोगों की कामना वाले पुरुष बारम्बार जाने- भाने को प्राप्त होते हैं अर्थात् पुण्य के प्रभाव

से स्वर्ग में जाते हैं और पुण्य नीण होने से मृत्युलोक में आते हैं। २१ ।

Bhagwat Geeta navam adhyay

जो अनन्य भाव से मेरे में स्थित ए भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते निष्काम भाव से जते हैं उन नित्य एकीभाव से मेरे

में स्थिति वाले पुरुषों का योग क्षेम। मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ। २२ ।

हे अर्जुन ! यद्यपि श्रद्धा से युक्त हुए जो सकामी भक्त दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी मेरे को ही पूजते हैं, किंतु उनका वह पूजना

अविधि पूर्वक है अर्थात् अज्ञान पूर्वक है। २३ ।

क्योंकि सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ, परंतु वे अधियज्ञ स्वरूप परमेश्वर को तत्त्व से नहीं जानते हैं, इसी से गिरते हैं

अर्थात् पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं। २४ ।

Bhagwat Geeta third adhayay ।। mahatmy

कारण, यह नियम है कि देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को

पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मेरे को ही प्राप्त होते हैं, इसीलिये मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता * । २५।

हे अर्जुन ! मेरे पूजन में यह सुगमता भी है कि पत्र, पुष्प, फल, जल इत्यादि जो कोई भक्त मेरे लिये प्रेम से अर्पण करता है, उस

शुद्ध-बुद्धि, निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेम पूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादिक मैं सगुण रूपसे प्रकट होकर प्रीतिसहित खाता

हूँ। २६।

इसलिये हे अर्जुन ! तू जो कुछ कर्म करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ हवन करता है, जो कुछ दान देता है, जो कुछ स्वधर्मा चरण

रूप तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर । २७।

Bhagwat Geeta navam adhyay

इस प्रकार कर्मो को मेरे अर्पण करने रूप संन्यास योग से युक्त हुए मनवाला तू शुभाशुभ फलरूप कर्मबन्धन से मुक्त हो जायगा और

उनसे मुक्त हुआ मेरे को ही प्राप्त होवेगा। २८ ।

Bhagwat geeta chautha adhyay, in hindi

यद्यपि मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ, न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है, परंतु जो भक्त मेरे को प्रेम से भजते हैं, वे मेरे में

और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ* । २९ ।

मेरी भक्ति का और भी प्रभाव सुन, यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त हुआ मेरे को निरन्तर भजता है,

वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चयवाला है अर्थात् उसने भली प्रकार निश्चय कर लिया है कि परमेश्वर के भजन

के समान अन्य कुछ भी नहीं है। ३० ।

 

इसलिये वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली परमशान्ति को प्राप्त होता है, हे अर्जुन ! तू निश्चय पूर्वक सत्य जान कि

मेरा भक्त नष्ट नहीं होता। ३१ ।

क्योंकि हे अर्जुन ! स्त्री, वैश्य और शूद्रादिक तथा पापयोनि वाले भी जो कोई होवें वे भी मेरे शरण होकर तो परमगति को ही प्राप्त

होते हैं। ३२ ।

Bhagwat Geeta panchwa adhyay, or mahatm

फिर क्या कहना है कि पुण्यशील ब्राह्मणजन तथा राजर्षि भक्तजन परमगति को प्राप्त होते हैं, इसलिये तू सुख रहित और क्षणभङ्गुर

इस मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर निरन्तर मेरा ही भजन कर अर्थात् मनुष्य-शरीर बड़ा दुर्लभ है, परंतु है नाशवान् और सुख रहित,

इसलिये कालका भरोसा न करके तथा अज्ञान से सुखरूप भासने वाले विषय-भोगों में न फँसकर निरन्तर मेरा ही भजन कर। ३३ ।

Bhagwat Geeta chhata adhyay , or mahatm.

नवाँ अध्याय हिन्दी में 

केवल मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेव परमात्मा में ही अनन्य प्रेम से नित्य, निरन्तर अचल मनवाला हो और मुझ परमेश्वर को ही

श्रद्धा-प्रेमसहित, निष्काम भाव से नाम, गुण और प्रभाव के श्रवण, कीर्तन, मनन और पठन-पाठन द्वारा निरन्तर भजने वाला हो तथा

मुझ शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म और किरीट, कुण्डल आदि भूषणों से युक्त पीताम्बर, वनमाला और कौस्तुभमणिधारी विष्णुका मन, वाणी

Bhagwat Geeta saptam adhyay , or mahatm

और शरीर के द्वारा सर्वस्व अर्पण करके अतिशय श्रद्धा, भक्ति और प्रेम से विह्वलतापूर्वक पूजन करने वाला हो और मुझ सर्वशक्ति

मान्, विभूति, बल, ऐश्वर्य, माधुर्य, गम्भीरता, उदारता, वात्सल्य और सुहृदता आदि गुणों से सम्पन्न, सबके आश्रयरूप वासुदेव

को विनयभावपूर्वक, भक्तिसहित, साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम कर, इस प्रकार मेरे शरण हुआ तू आत्मा को मेरे में एकीभाव कर के मेरे

को ही प्राप्त होवेगा। ३४।

Bhagwat Geeta ashtam adhyay, or mahatm

इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें “राजविद्याराजगुह्ययोग” नामक

नवाँ अध्याय ।। ९ ॥

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